Wednesday, October 12, 2016

रावण और भगवान श्रीराम

रावण को पूजने जैसों की मै नहीं जानता पर रावण उतना ही प्रतिष्ठित था (युद्ध और विद्वता दोनो मे) जितने स्वंय राम भी नहीं थे रावण का वध करने से पहले। रावण ने अपने समय के देव, दानव, यक्ष सबको मिलाकर एक नयी संस्कृति का विकास किया रक्ष संस्कृति। अतः रावण और उसके अनुयायी राक्षस कहलाए। उसका लक्ष्य इन सबके बीच उस समय तक चलने वाले युद्धों को समाप्त करके एकता कायम करना था। वह इतना तेजस्वी व विद्वान था कि लोग उसका सामना या शास्त्रार्थ में उसका खंडन करने मे असमर्थ होते गए और उसकी रक्ष संस्कृति स्वीकार करते गए। उसको हराने वाला बालि और सहस्रबाहु  लाख प्रयास करके भी उसे मार नही सके। अतः उससे मैत्री कर ली। और बालि के शासन में किष्किंधा रावण के उपनिवेश की तरह कार्य करता था। रावण को हराने वाले बालि को मारकर राम और रावण को हराने वाले सहस्रबाहु को मारकर परशुराम उतने प्रतिष्ठित नही हो सके जितनी प्रतिष्ठा राम को रावण वध के बाद मिली। रावण अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए बाद मे लोगो को बलपूर्वक मजबूर करने लगा। शक्ति के मद में चूर होकर स्त्रियों का हरण और दूसरों की पद्धतियों का विनाश करने लगा(आर्यों का यज्ञ ध्वंस, ऋषियों की हत्या आदि)। रावण वध से पहले तक लोगों मे राम और रावण दोनों की श्रेष्ठता मे संशय था। राम के जन्म तक परशुराम सहस्रबाहु का वध कर भगवान के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे और राम के पिता ने उन्ही के नाम पर उनका नामकरण राम किया। रावण को बहुत शाप मिले थे फिर भी सीता जैसी दिव्य सुंदरी के समक्ष संयम रखकर उससे सिर्फ विवाह के लिए डराने धमकाने व राजी करने का प्रयास करना रावण के चरित्र की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है। अन्यथा तमाम राजाओं और देवताओं, ऋषियों के उदाहरण हैं जो सबकुछ जानते हुए किसी अप्सरा, रानी, राजकुमारी के लिए अपना सबकुछ ओर जान तक गंवा बैठे थे। राम को असली प्रसिद्ध और तीनो लोको मे प्रतिष्ठा रावण वध के कारण ही मिली। रावण राम की ही तरह श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित था यह राम भी जानते थे। अतःउसकी मृत्यु के समय उन्होंने लक्ष्मण को उसके पास ज्ञान सीखने के लिए भेजा। रावण ने धर्म के स्वरूप को बदल कर रख दिया था और लोगों को धर्म का सही मर्म बतलाने के लिए उसको शास्त्रार्थ में निरुत्तर करना और युद्ध में मारना राम के लिए अनिवार्य हो गया था। अन्यथा लोगों मे रावण के बताए रास्ते को धर्म मानने की परंपरा चल पड़ी थी। उसने धर्म की गलत व्याख्या कर सबको प्रभावित करना शुरू कर दिया था। राम से मुकाबले के समय उनसे होने वाले वाद विवाद ने उसे उसकी गलती का अहसास करा दिया था। इतना कुछ होते हुए भी अपने अहंकार और अन्य दुर्गुणों के कारण रावण पूज्य बिल्कुल नहीं है। हां वह श्रेष्ठ था और ऐसा भगवान् राम भी मानते थे और मुझे नहीं लगता कि हम उनसे अधिक योग्य हैं कि उनपर प्रश्न उठा सकें। राम का व्यक्तित्व निखारने में रावण का योगदान है।