Monday, July 27, 2020

चंद्रशेखर आजाद

 किसी अंग्रेज ने अपनी मां का इतना दूध नहीं पिया है कि मुझे गिरफ्तार कर सके- चंद्रशेखर आजाद। 
दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे। 
आजाद थे, आजाद हैं, आजाद रहेंगे।। - चंद्रशेखर आजाद 
आजादी मांगने से नहीं मिलती है। इसे अधिकारपूर्वक छीनना पड़ता है। - आजाद। 
आज़ाद का जन्म 1906 में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर भानवाड़ा गाँव मे हुआ था। बचपन से ही वे निडर और बहुत बहादुर थे। बचपन ले ही उन्हें तीरंदाजी का शौक़ था और वे अचूक निशाना लगाते थे। बचपन मे ही एक बार वे घर से भागकर एक व्यापारी के साथ मुंबई जा पहुँचे। वहाँ कुछ दिन इधर उधर काम करने के बाद वे वाराणसी जा पहुँचे और एक संस्कृत पाठशाला मे अध्ययन करने लगे। वहाँ एक दिन वे आज़ादी के लिए निकलने वाले जुलूस मे शामिल हुए और उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत ले जाया गया। जज ने उनसे नाम और पता पूछा तो उन्होंने अपना नाम आजाद,पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना घर बताया। जज ने उन्हें बेंतों से पिटाई की सदा सुनाई ,हर मार के साथ उनके मुँह से भारत माता की जय का नारा निकलता। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया।इससे क्रांतिकारियों मे उनकी ख्याति फैल गई और वे क्रांतिकारियों से जुड़ गए। एक सार्वजनिक सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि "अब कोई अंग्रेज़ मुझे पकड़ नहीं सकेगा , मैं आजाद हूँ और सदैव आजाद रहूँगा।" इसके बाद उनका नाम आजाद पड़ गया।
एक दिन उनके संगठन ने पुलिस कोतवाली में एक क्रांतिकारी पोस्टर चिपकाने की योजना बनाई पर इसे करने को कोई तैयार नहीं हुआ। तब आजाद ने यह करने का बीड़ा उठाया और पोस्टर को गोंद से अपनी पीठ पर चिपकाकर कोतवाली गए और सबके सामने दीवाल से पीठ टिकाकर पोस्टर चिपका दिया। फिर मौका देखकर चुपचाप चले गए। बाद में कोतवाली में हड़कंप मच गया पर कोई न जान सका कि यह कब और किसने किया? 
संगठन की गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता होने पर राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां और राजेंद्र लाहिड़ी आदि ने ट्रेन से सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई और काकोरी से पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए। स्टेशन से कुछ दूर बढ़ते ही जंजीर खींचकर रोका और उसमे जा रहा खजाना लूट लिया। 
इस घटना के महीने भर बाद आजाद के अलावा सभी पकड़े गए और सबको अंग्रेजी सरकार ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद आजाद झांसी के पास एक गांव धीमारपुर मे एक हनुमान मंदिर में सन्यासी के रूप में रहने लगे। गांव के मुखिया ने उनसे पाठशाला में बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। एक दिन मंदिर पर पुलिस का सिपाही उनसे आजाद के संदेह मे पूछताछ करने आया जिसे उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से भयभीत कर भगा दिया। उस गांव में रहते हुए आजाद अपने क्रांतिकारी साथियों को ओरछा के गहन जंगलों में फायरिंग का प्रशिक्षण भी देते रहे। फिर वह धीमारपुर से झांसी चले आए और वहां पर हरिशंकर के नाम से एक गाड़ी की दूकान मे गाडिय़ां बनाने और चलाने की नौकरी करने लगे। किसी को उन पर शक नहीं हुआ। कुछ समय बाद वहां से वे कानपुर गए और वहाँ पर सरदार भगत सिंह ने उनके संगठन की सदस्यता ग्रहण किया। 
उसी समय साइमन कमीशन इंग्लैंड से भारत आया और हिंदू मुसलमानों मे फूट डालने के लिए तमाम कार्य करने लगा। इसके चलते साइमन कमीशन का घनघोर विरोध होने लगा। लाहौर मे एक शांतिपूर्ण विरोध मार्च में अंग्रेजों ने लाला लाजपत राय नामक कांग्रेसी नेता को इतना पीटा कि उनकी मृत्यु हो गई। इससे क्रुद्ध होकर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल ने अंग्रेज अधिकारी स्काट जिसने लाजपत राय पर लाठी चार्ज का आदेश दिया था को मारने की योजना बनाई। वे कानपुर से लाहौर पहुंचे और स्काट को मारने की योजना बनाई। योजनानुसार जय गोपाल ने स्काट के थाने से बुलेट पर निकलने की सूचना भगत सिंह और राजगुरु को दिया। भगत सिंह और राजगुरु ने किसी अंग्रेज अधिकारी को बुलेट से आते देखा और गोलियों से भूनकर मार डाला। एक सिपाही ने दोनों को पकड़ने का प्रयास किया तो आजाद की पिस्तौल ने उस पर अपना मुंह खोल दिया। धमाके के साथ लपलपाती मौत निकली और उसे समाप्त कर दिया। इसके बाद तीनों अपनी साईकिलों पर सवार होकर भाग निकले। बाद में उन्हें पता चला कि उन्होंने स्काट के बजाय साण्डर्स को मार डाला है लेकिन उन्हें संतोष था क्योंकि लाजपत राय पर लाठी चार्ज करने वाली टीम मे वह भी शामिल था। इस घटना के बाद देशवासियों मे उत्साह की लहर दौड़ गई और सब लाला लाजपत राय का बदला लेने की खुशी मनाने लगे। इसके बाद जब वहां धरपकड़ तेज हो गई तो भगत सिंह और राजगुरु वहां से वेश बदलकर कलकत्ता चले गए। भगत सिंह वहां पर जतिन दास नामक क्रांतिकारी से मिले और उनकी मदद से आगरा में बम बनाने की फैक्ट्री संचालित करने लगे। 
इसके बाद भगत सिंह और राजगुरु ने अदालत में बम फेंककर साम्राज्यवाद का नाश हो और भारत माता की जय के नारे लगाए, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आजाद ने उनसे लाख कहा कि वे उन्हें सुरक्षित निकाल लेंगे पर भगत सिंह और राजगुरु ने आत्मबलिदान देने का निर्णय कर लिया था और कहा कि इससे बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी। इसके बाद आजाद ने वायसराय इरविन को मारने के लिए ट्रेन में बम रखा पर समय के हेरफेर के कारण वह बच गया।  इसके बाद आजाद कानपुर और दिल्ली में बम बनाने की फैक्ट्री का संचालन करते रहे। इसी बीच भगत सिंह को मृत्युदंड दिया गया। (23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी गई थी।) 
इसके बाद आजाद ने अपना मुख्यालय इलाहाबाद में स्थानांतरित कर लिया और वहाँ से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगे। लेकिन उनके दल मे से कुछ लोग अंग्रेजों से मिल गए। 27 फरवरी 1931 को जब आजाद अपने मित्र सुखदेवराज के साथ मूर कालेज से अल्फ्रेड पार्क से होकर जा रहे थे किसी भितरघाती गद्दार ने पुलिस को सूचना दे दी। तत्काल चार जीपों सहित लगभग 100 पुलिस वालों ने पार्क को घेर लिया और आजाद पर फायरिंग करने लगे। घंटाघर गोलीबारी होती रही आजाद ने अपने अचूक निशाने से बहुतों को नरक का रास्ता दिखाया ।लेकिन शीघ्र ही उनके पास गोलियां समाप्त हो गईं। उन्होंने सुखदेवराज को वहां से निकल जाने को कहा और स्वयं अंग्रेजों से लड़ते रहे। तभी उनके दाहिने हाथ में गोली लग गयी तब उन्होंने बांयें हाथ से दुश्मनों पर फायरिंग करके अंग्रेजों को भी अपनी प्रशंसा करने पर विवश कर दिया। जब उनके पास सिर्फ एक गोली बची तो उन्होंने कनपटी से पिस्तौल सटाकर भारत मां के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। उनके वीरगति के बाद भी भयभीत अंग्रेज घंटों उनके पास जाने से डरते रहे और उनके मृत शरीर पर हजारों गोलियां दाग कर यह सुनिश्चित किया कि वे वाकई मर चुके हैं। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 25 वर्ष थी। इस तरह से एक अध्याय का अंत हुआ। 
हां आजाद अंग्रेजों के लिए मर चुके थे पर वे हमारे हृदय मे सदैव जीवित रहेंगे। वे सदैव आजाद थे और आजाद ही रहे। इस घटना के लगभग 16 वर्षों बाद देश आजाद हुआ लेकिन भारत ने अपना सबसे तेजस्वी पुत्र को खो दिया था। 
जय हिंद। वंदे मातरम। 

तुलसीदास



तुलसीदास का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन संवत 1554 मे सोरों गाँव मे हुआ था- इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था और माँ का हुलसी । जन्म के समय ही माँ की और उसके कुछ दिनों बाद पिता की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद दासी चुनिया ने उनको पाला लेकिन कुछ दिनों बाद वह भी साँप के डँसने से मृत्यु को प्राप्त हो गयी। बेचारा बालक अनाथों की तरह भटकता हुआ गाँव के मंदिर मे पहुँचा।जहाँ उनकी भेंट बाबा नरहरिदास जी से हुई। बाबा बालक को अपनी कुटिया मे ले गए और उसे भगवान राम की कथाएँ सुनाने लगे। बालक बड़े मनोरोग से सुनता रहा । बाबा ने उसका नाम रामबोला रख दिया। उच्च शिक्षा के लिए बाबा नरहरिदास रामबोला को वाराणसी के आचार्य शेष सनातन के पास ले गए। वहाँ उन्होंने समस्त साहित्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया। शिक्षा के बाद रामबोला गुरू की आज्ञा से सोरों लौट गए और रामकथा का गान करने लगे। इससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी और लोगों ने उन्हें तुलसीदास कहना शुरू कर दिया। फिर बद्री गाँव के दीनबंधु पाठक की सुंदरी पुत्री रत्नावली से उनका विवाह हो गया। तुलसीदास रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे और उसके बिना थोड़ी देर मे ही अधीर हो जाते थे।एक दिन उनकी अनुपस्थिति में रत्नावली के मायके से बुलावा आया तो उसने तुलसीदास के सूचना लिए भाई दूज के अवसर पर कुछ दिनों के लिए मायके जाने की बात एक पत्र मे लिखकर रख दिया और मायके चली गयी। तुलसीदास ने वापस लौटकर पत्र पढ़ा किंतु रत्नावली का वियोग सहन न कर सके और आँधी पानी के बीच अपनी ससुराल के लिए निकल पड़े। तूफ़ान मे एक शव को नौका समझकर उसपर सवार होकर उफनती नदी पार कियाऔर आधी रात को ससुराल जा पहुँचे। सबको सोता देख घर के पीछे गए और लटकते साँप को रस्सी समझकर उसकी सहायता से चढ़कर अनुमान से रत्नावली के कक्ष मे जा पहुँचे। रत्नावली को उन्हें उस हाल मे आया देखकर बडी ग्लानि हुई और उसने तुलसीदास को फटकारते हुए कहा-“ आपको जितना प्रेम मेरे हाड़ माँस के इस शरीर से है इसका एकांत भी प्रभु राम से होता तो आप भवसागर से मुक्त हो गए होते।” तुलसीदास ग्लानि से जैसे ज़मीन में धँस गए और जैसे आए थे उसी रास्ते से वापस लौट गए। इसके बाद वह प्रयागराज पहुंचे और सन्यास लेकर अवधी भाषा मे रामकथा कहने लगे।

गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीराम के जीवन वृत्तांत पर कालजयी महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की रचना की। यह अकबर का शासन काल था। देश और समाज में हिंदू धर्म का लोप हो रहा था। हिंदू राजा हार मानकर अकबर के अधीनस्थ राजकाज कर रहे थे। समाज में बड़ा विघटन हो रहा था। ऐसे समय में गोस्वामी जी ने इस ग्रंथ की रचना कर हिंदू धर्म को पुनर्जीवित कर दिया। 

उससे पहले तक बहुत से संतों और कवियों ने विभिन्न भाषाओं में रामकथा की रचना की थी। इनमे महर्षि वाल्मीकि विरचित रामायण नक्षत्रों के बीच पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह सुशोभित हो रहा था। बाकी सब कवियों की राम कथाएं रामायण के आगे तारिकाओं की तरह टिमटिमा रही थीं। फिर गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस रूपी सूर्य का उदय हुआ और इसके आगे पूर्व प्रचलित समस्त रामगाथाएं फीकी पड़ गईं। अब तो आज कल के ग्रामीण जनमानस से पूछने पर रामायण के रचनाकार के रूप में गोस्वामी जी को ही याद किया जाता है। गोस्वामी जी ने जनसाधारण की अवधी भाषा में इतने सुंदर और लालित्यपूर्ण ढंग से काव्य रचना की है कि वह भगवान श्रीराम के समान ही अमृतमयी बन गयी है। तुलसीदास जी ने विशेष समाधि मे भगवान शिव की प्रेरणा से लोकमानस की अवधी भाषा में श्रीराम चरित मानस की रचना की है। जिससे यह भक्ति पूर्वक पाठ करने से अत्यंत चमत्कारिक परिणाम देने वाली बन गयी है। सबसे पहले इसका पाठ करना शुरू करते ही कुछ ही दिनों में यह मन को विकारमुक्त करके निर्मल करना शुरू कर देती है। जो लोग बहुत जप तप और व्रत नियमों का पालन कर रहे हों और मन की दुर्बलता के कारण बार बार भटक कर असफल हो जा रहे हों उनके द्वारा इस ग्रंथ का पाठ करने पर मन की कलुषता मिट जाती है और साधना के वे परिणाम अनायास ही बहुत आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। 

भगवान श्री राम भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रमाणिक आधार हैं। वे धर्म के जीवंत रूप हैं। भारतीय आज भी भगवान राम को इस देश का राजा, अयोध्या को देश की राजधानी और स्वयं को उनकी प्रजा मानते हैं। भारत में समय समय पर बहुत से प्रज्ञापुरुष और ईश्वर के अवतार हुए हैं जिन्होंने असंख्य लोगों को तारा या मुक्त किया है। लेकिन उनमे भगवान श्रीराम ऐसे हैं जिन्होंने बिना किसी सचेष्ट प्रयास के ही अपने आस पास के और दूर के लोगों को तार कर मुक्त कर दिया है। आज तक लोग उनके नाम स्मरण के द्वारा ही भवबंधन काटकर मोक्ष की प्राप्ति कर रहे हैं। भगवान राम को जिसने देखा वह तर गया, जिसने सुना वह तर गया। जो उनके साथ उठा बैठा, उनके साथ चला, उनको रास्ते पर चलते देखा, उनका नाम स्मरण किया वे सब तर गए। हनुमानजी ने तो सिद्ध ही कर दिया है कि भगवान श्री राम का नाम स्वयं भगवान श्री राम से भी अधिक प्रभावशाली है। एक बार भगवान श्री राम के गुरू वशिष्ठ महर्षि किसी से नाराज हो गए और भगवान श्रीराम से उसका वध करने को कहा। भगवान राम गुरू की आज्ञा का पालन करने को तैयार हो गए । वह व्यक्ति भागकर हनुमानजी की मां अंजना के पास पहुंचा और शरणागत होकर उनसे अपनी प्राण रक्षा के लिए प्रार्थना किया। माता ने उसे प्राण रक्षा का वचन देकर हनुमान जी को बुलाया और उसे उनके सुपुर्द कर आदेश दिया -" यह मेरा शरणागत है। इसकी रक्षा करो। " 

हनुमान जी ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। बाद में जब उन्हें पता चला कि उसे भगवान श्रीराम गुरू वशिष्ठ के अपमान का दंड देना चाहते हैं तो भी वे विचलित नहीं हुए और उसे लेकर सरयू के तट पर पहुंच गए। भगवान श्री राम उसे दंड देने के लिए वहां आए। लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई कि देखें अब क्या होता है? क्या रामभक्त हनुमान अपने मां के वचन की रक्षा के लिए अपने आराध्य से युद्ध करेंगे? लेकिन हनुमान जी को बल बुद्धि की खान ऐसे ही नहीं कहा जाता। वे उस शरणागत को अपने पीछे करके भगवान का प्रहार रोकने के लिए उसके आगे खड़े हो गए। भगवान ने जब बाण छोड़ा तो हनुमानजी ने उसे प्रणाम कर जय श्री राम का उद्घोष किया और आश्चर्य! वह बाण निष्फल होकर लुप्त हो गया। भगवान ने अनेक अमोघ दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया पर सब निष्फल रहे। यह देखकर जनसमुदाय भगवान श्रीराम की जय और रामभक्त हनुमान की जय का जयघोष करने लगी। इससे प्रसन्न होकर गुरु बशिष्ठ ने अपना वचन वापस लेकर भगवान को उस व्यक्ति को छोड़ देने को कहा। क्योंकि उन्होंने उसे क्षमा कर दिया था। 
तुलसीदास ने जब घर बार त्याग दिया तो वे सन्यासियों का सा जीवन व्यतीत करते हुए भगवान श्रीराम की कथा कहने लगे। उनकी कथा इतनी मधुर होती थी कि दूर दूर से लोग उनको सुनने के लिए आने लगे। आने वाले श्रोताओं मे तुलसीदास जी ने देखा कि एक तेजस्वी वृद्ध सबसे पहले आता है और सबसे बाद में जाता है। उन्होंने पहचान लिया कि ये हनुमानजी हैं और एकदिन जब वे जाने के लिए उठे तो तुलसीदास उनके चरणों में गिर पड़े और उनकी स्तुति करने लगे। हनुमानजी जब प्रसन्न हुए और दर्शन दिया तो तुलसीदास जी ने उसने भगवान श्रीराम का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमानजी ने उन्हें चित्रकूट जाने को कहा और बताया कि वीं उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट मे जाकर कुटी बनाकर रहने लगे। एक दिन उन्होंने रास्ते में दो श्याम और गौर वर्ण के सुंदर राजकुमारों को घोड़ों पर सवार होकर जाते देखा। उन्हें देखकर वे अभिभूत हो उठे लेकिन पहचान नहीं सके। बाद में जब हनुमान जी ने आकर उन्हें बताया कि वे दोनो राजकुमार श्रीराम लक्ष्मण थे तो उन्होंने एकबार फिर दर्शन दिलाने के लिए प्रार्थना किया। कुछ दिनों के बाद तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर बैठे हुए थे कि दो सुंदर नवयुवक आए और उनसे चंदन लगाने के लिए कहने लगे। उनके सुंदर सांवले और गोरे रूप को देखकर तुलसीदास सुध बुध खो बैठे और उसी अवस्था में दोनों को तिलक लगाया। तभी हनुमानजी जो वहाँ तोते के रूप में विराजमान थे उन्होंने तुलसीदास जी को सचेत करने के लिए और भगवान की पहचान बताने के लिए एक दोहा कहा-

चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीड़। 

तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर।। 

यह सुनकर तुलसीदास जी को होश आया। जैसे वे समाधि से जगे हों लेकिन तब तक दोनों राजकुमार जा चुके थे। वे उनके पीछे रास्ते पर दौड़े पर वहाँ कोई नहीं था। लेकिन उन्होंने भगवान का दो बार दर्शन कर लिया था और एक बार तिलक लगाने के बहाने उनका स्पर्श भी किया था। भगवान राम के स्पर्श ने तुलसीदास मे जादुई परिवर्तन कर दिया और उनमे एक दिव्यता आ गई। उनकी वाणी मे सम्मोहन शक्ति सी आ गई और दिन दूनी रात चौगुनी गति से उनके श्रोताओं की संख्या बढ़ने लगी। फिर भगवान शिव की प्रेरणा से उन्होंने श्रीराम कथा की रचना आरंभ की। उनकी बढ़ती ख्याति और प्रभाव से चिंतित होकर कुछ लोगों ने सम्राट अकबर से उनकी शिकायत कर दी। अकबर ने सच्चाई का पता लगाने के लिए रहीम दास जी को भेजा और रहीम तुलसीदास जी से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने लौटकर अकबर को बताया कि तुलसीदास जी तो सिर्फ अपने प्रभु की कथा का प्रचार करते हैं बस। 
तुलसीदास जी महाराणा प्रताप के आध्यात्मिक गुरू भी थे। एकबार जब अकबर से हारकर जंगल मे भटकते हुए प्रताप और उनका परिवार घास की रोटी बना कर खाने जा रहे थे तो एक ऊदबिलाव उसे ले भागा। और लोग तो संतोष कर गए लेकिन छोटा बालक भूख से बिलख उठा। इससे राणा का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने परिवार की परेशानियों को देखते हुए अकबर से संधि करने का फैसला किया। उन्होंने अकबर के पास इस आशय का संदेशा भेजा। इसी दौरान एकदिन किसी से सुनकर वे तुलसीदास जी से मिलने गए। गोस्वामी जी ने उन्हें घबराने की बजाय अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहने को कहा और कहा कि प्रभु श्रीराम ने भी तो 14 वर्षों का वनवास झेला था। यह संकट शीघ्र दूर हो जाएगा और आपको आपका खोया हुआ राज्य और सम्मान पुनः प्राप्त होगा। नई सेना बनाओ और फिर से प्रयास करो। प्रताप वहाँ से एक नया बल लेकर लौटे। प्रभु की कृपा से उसी समय राणा प्रताप से भामाशाह मिलने गया और उन्हें नयी सेना के निर्माण के लिए अपना सारा धन अर्पित कर दिया। उसी समय अकबर के सेनापति जयसिंह तुलसीदास जी से मिलने आए तो उन्होंने उनसे राणा प्रताप के विरुध्द सेना न उतारने को कहा। गोस्वामी जी की बात मानकर जयसिंह ने अपनी सेना पीछे हटा ली। महाराणा प्रताप ने प्राप्त धन से नयी सेना बनाई और पुनः युद्ध लड़ने लगे। इस बार ईश्वर की कृपा से उन्हें सफलता मिलने लगी और धीरे-धीरे उन्होंने अपने सभी किले अकबर से वापस ले लिए। लेकिन पूरा जीवन संघर्षरत रहने और कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप के शरीर त्याग के समय तक केवल एक या दो किले ही अकबर के पास रह गए थे बाकी सब उन्होंने वापस जीत लिया था। 
तुलसीदास जी ने जब रामचरित मानस को पूरा कर लिया तो उनकी ख्याति दिन पर दिन बढ़ने लगी। साथ ही उनके विरोधियों की भी संख्या बढ़ने लगी। काशी के पंडितों ने संस्कृत के अलावा किसी भाषा में रामकथा लिखने के कारण उनका विरोध शुरू कर दिया और उनकी पांडुलिपि नष्ट करने के लिए दो चोर भेजे। चोर जब रात को रामचरित मानस की प्रति चुराने के लिए तुलसीदास की कुटिया पर पहुंचें तो उन्होंने वहां पर दो सुंदर युवकों को धनुष बाण लिए पहरा देते देखा। इसके बाद भगवान का दर्शन होने के परिणामस्वरूप चोरों की बुद्धि निर्मल हो गई, उन्होंने तुलसीदास जी से क्षमा मांगी और चोरी छोड़कर सन्यासी हो गए। 
इसपर भी तुलसीदास जी के विरोधियों को संतोष नहीं हुआ और उन्होंने भगवान विश्वनाथ से ही रामचरित मानस की परीक्षा कराने का निर्णय लिया। वेद, पुराणों और अन्य ग्रंथों के साथ सबसे नीचे रामचरित मानस को भगवान श्री विश्वनाथ के समक्ष रखकर  मंदिर मे ताला लगा दिया गया। जब सुबह ताला खोलकर देखा गया तो रामचरित मानस सबसे ऊपर रखा था और उसपर भगवान श्री विश्वनाथन का कृपा प्रसाद था। अब किसी को श्री रामचरितमानस और तुलसीदास जी पर कोई संदेह नहीं रह गया। काशी के विरोधी पंडितों ने भी अपनी गलती स्वीकार कर उनसे क्षमा मांगी। 
कहते हैं कि मीराबाई जब भगवान श्रीकृष्ण के उपासना मे मग्न होकर गीत गाकर नाचती थीं तो उनके परिवार के लोगों ने उनपर अत्याचार करने शुरू कर दिए। उनको विष दिया, सर्प से कटवाना चाहा पर ईश्वर की कृपा से वे मीराबाई का कुछ नहीं बिगाड़ सके। इसपर इन विघ्नों से परेशान होकर मीरा ने तुलसीदास जी को चिट्ठी लिखकर सलाह मांगी तो गोस्वामी जी ने उनको जवाब में यह दोहा लिखकर भेजा-

जिनके प्रिय न राम बैदेही, 

तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम स्नेही। 

और इसे पढ़कर मीराबाई ने अपना घर बार त्याग दिया और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 
तुलसीदास जी के समय मे हिंदू धर्म जगत अनावश्यक संकीर्णताओं मे बंटकर आपस में एक दूसरे से विवाद करता हुआ उलझा रहता था। कोई कृष्ण भक्ति की शाखा थी तो कोई रामभक्ति की। कहीं सगुण उपासना वाले लोग थे तो कहीं निर्गुण। तुलसीदास जी ने इन सबको एक सूत्र में पिरोने का काम किया और इनके वैचारिक वैमनस्य को दूर किया। एक बार गोस्वामी जी मथुरा श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गए। लोगों ने सोचा कि ये तो राम भक्त हैं क्या ये भगवान श्रीकृष्ण के आगे शीश झुकाएंगे और जब गोस्वामी जी ने मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे शीश झुकाया और पूजा आरती किया तो लोगो को कृष्ण की मूर्ति मे ही धनुष बाण लिए भगवान राम के भी दर्शन हुए। 
भगवान श्री राम की कथा लिखकर और उसका प्रचार प्रसार कर गोस्वामी तुलसीदास जी तर गए और आज भी लोग उनकी इस रचना का भक्तिपूर्वक पाठ कर बिना किसी अतिरिक्त श्रम या साधना के अपने मनुष्य होने की परम संभावना को प्राप्त हो रहे हैं। 
जय श्री राम, जय श्री हनुमान, जय गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज। 

Sunday, July 19, 2020

गुलवाम घाटी :भारत और चीन

चीन ने सोचा था कि वह भारत को धमकाएगा, गुलवाम मे उसकी जमीन पर बढ़ आएगा और भारत डर कर चुपचाप समझौता कर लेगा। वह चीन जैसी शक्ति से टक्कर थोड़े ही ले पाएगा। लेकिन मामला पड़ गया उल्टा। 
चीनी सैनिक कोरोना महामारी का लाभ उठाकर भारतीय क्षेत्र में घुस आते हैं। सदैव की तरह भारत चीन से बातचीत से समस्या को हल करने का प्रयास करता है जिसे चीन हमारे देश की कमजोरी समझने की भूल कर बैठा। बातचीत में तय होता है कि दोनों देशों के सैनिक अपनी पुरानी जगह पर वापस जाकर LAC का सम्मान करते हुए पूर्वस्थिति बहाल करेंगे। वार्ता के बाद भारतीय सैनिक वापस लौटे तो चीनी सैनिकों ने वापस न लौटकर अचानक पूरी तैयारी के साथ अंधेरे में भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिक ऐसी गद्दारी से अंजान थे और चीनी लोहे के कीलों वाले डंडों से सुसज्जित थे जिसके कारण 20 भारतीय सैनिक पास ही बहती नदी में गिरकर वीरगति को प्राप्त हो गए। 
इसके बाद जो हुआ उससे चीनियों की रूहें दहल उठीं। उस भारतीय सैन्य टुकड़ी के साथ मौजूद घातक सैन्य कमांडो तुरंत विद्युत गति से ( जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है) चीनी तंबुओं के पास पहुंचते हैं और ऐसी निर्दयता से चीनी सैनिकों का एकतरफा संहार करते हैं, उनके तंबू उखाड़ फेंकते है, उनका सारा सामान नष्ट कर देते हैं और उनकी सभी सामग्रियों को उठा लाते हैं जिनमे दवाइयां भी शामिल हैं और हो सकता है कि कोरोना का इलाज भी उसमे हो जो चीन दुनिया से छिपाकर प्रयोग कर रहा हो। चीनी सैनिकों के तंबुओं तक पहुंच कर उनको नरक का रास्ता दिखाने से पहले उन घातक कमांडोज ने भारतीय सैनिकों पर हमला करने आए चीनी सैनिकों की गर्दन तोड़कर उन्हें समाप्त कर देते हैं और उनके कील लगे लोहे के डंडे भी छीन लेते हैं। 
यह मारकाट इतना भयानक था कि इससे भयभीत चीनी बाद मे भारत को बताकर आश्वासन लेने के बाद ही अपने मृत सैनिकों का शव उठाने आते हैं वह भी हेलिकॉप्टरों से। चीनी सरकार इस घटना को अपने देशवासियों से छुपाते हुए अपनी इज्जत बचाते फिर रही है। इससे संबंधित सभी न्यूज स्रोतों और पोस्टों को डिलीट कर रही है। 
भारतीय सैनिकों ने चीन को ऐसा मारा है कि वे अब भयभीत हैं। भारत से अनुमति लेकर डरते डरते तो अपने सैनिकों के शव उठाने आए थे वो भी हेलीकॉप्टरों के साथ। हमारी अपनी मीडिया मे चीनी दलाल बैठे हैं। तमाम संगठनों, पार्टियों, पदों पर उनकी घुसपैठ है। यही हाल उन्होंने अमेरिका में भी किया है। यह है उनकी असली चाल और ताकत।इस बारे में सही जानकारी के लिए पाकिस्तानी चैनलों के कार्यक्रम देखिए।
बहुत सी बातें होती हैं जिन्हें करके खामोश रहा जाता है ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक लाभ लिया जा सके।
भारत ने चीन को मारा भी है और आरोप भी लगा रहा है। मतलब चीन चारो खाने चित।चीन से विवाद और उसकी दगाबाजी के बाद अब भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की लहर उठ पड़ी है जो धीरे धीरे तूफ़ान बनती जा रही है। इससे चीनी कंपनियों मे खलबली मच गई है। इस विरोध से घबराकर Zoom एप ने वक्तव्य जारी कर कहा कि "हम एक अमेरिकी कंपनी हैं और चीन से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।" चीन दुनिया भर के देशों में सस्ता, दो कौड़ी का माल, सस्ती दरों पर, बहुत बड़े पैमाने पर बेचकर लाभ कमाता है और उस देश के आधारभूत आर्थिक ढांचे को तबाह कर देता है। उसने यही चाल भारत के साथ भी चलने का प्रयास किया। इसके लिए उसनें बाकायदा हमारे देश में बहुत से मीडिया हाउसों/कर्मियों, राजनीतिज्ञों, विभिन्न पदों और संगठनों को घूस देकर अपने हित मे काम करने के लिए तैयार कर लिया है। यह आप इस समय बहुत लोगों के बयान और हरकतों से समझ सकते हैं कि कौन चीन को लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रहा है। कुछ लोग छुपे होकर भी इस काम मे लगे हैं।

भारत और विश्व :पूरब या पश्चिम

जय श्री गणेश । अहं ब्रह्मास्मि, रसो वै सः ।
संसार में दो जीवन दर्शन हैं - पूरब और पश्चिम। यह प्रमुख विभाजन है। बाकी सभी विभाजन इन दोनो के अंतर्गत आते हैं। वैसे आजकल सारे संसार में पश्चिमी जीवन दर्शन या फिलासफी की ही प्रमुखता है। पूर्वी दर्शन सिकुड़ता जा रहा है और अब तो भारत में भी यह लुप्तप्राय हो रहा है। शिक्षा, रहन सहन, सोचने विचारने का तरीका, खान पान, तीज-त्यौहार, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में भारत मे भी पश्चिमी तौर तरीकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। 
भारत की जीवन पद्धति धार्मिक है जो समष्टि को अपने मे समाहित करते हुए चलती है जबकि पश्चिमी पद्धति तथाकथित विज्ञान पर आधारित है जो सबकुछ तोड़ने और विध्वंस पर आधारित है। भारत के अनुसार मूलतत्व पांच हैं और उनकी परिभाषा का आधार दूसरा है, गुणात्मक है जबकि पश्चिमी जीवन दृष्टि के अनुसार मूल तत्व 108 के लगभग हैं और उनकी मूलतत्वों की परिभाषा के आधार भारत से ठीक उल्टे हैं। 
भारतीय चिंतन के अनुसार जो पदार्थ या वस्तुएं जीवन को संभव बनाने के मूलभूत आधार हैं वे मूलतत्व हैं, जो शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं वे मूलतत्व हैं और उनकी संख्या पांच है-आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी। ये पांच मूलतत्व इस मर्त्य शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं। जबकि पश्चिमी दृष्टि के अनुसार वे पदार्थ जिन्हें और भी ज्यादा साधारण कणों मे (दो या दो से अधिक) तोड़ा नहीं जा सकता है मूलतत्व कहलाते हैं। फिर यहां से होते हुए अणु परमाणुओं की यात्रा प्रारंभ होती है। भारत में भी इन अणु और परमाणुओं की संरचना और संभावना का ज्ञान था लेकिन इसके विनाशकारी संभावनाओं के चलते इनसे संबंधित प्रयोगों को नष्ट कर दिया गया और छुपा दिया गया। परमाणु तक की जानकारी अभी भी भारतीय पुरा साहित्यों मे खोजा जा सकता है। परमाणु से संबंधित कुछ अध्ययन या विवरण महाभारत कालीन महर्षि कणाद के कार्य के रूप में उल्लिखित हुआ है। बाकी जानकारी जानबूझकर नष्ट कर दी गई या छिपा दी गई। 
भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन को ठीक से सार्थक तरीके से जीने के चार आधार हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें मनुष्य के चार पुरुषार्थ कहते हैं। इनका मतलब है कि जीवन में धर्म पूर्वक आचरण करते हुए अर्थोपार्जन करना चाहिए और फिर उससे भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए काम का सेवन करना चाहिए। तत्पश्चात जब जीवन के सुख दुखों का सम्यक अनुभव हो जाए तो फिर संसार से उदासीन होकर या त्याग कर चरम पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। 
अब धर्म क्या है और धर्मपूर्वक आचरण क्या है? इसके ज्ञान के लिए मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों मे बांटा गया था। जीवन को 100 साल का मानते हुए 25 - 25 वर्ष के चार विभाग किए गए थे - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। सबसे पहले जीवन की तैयारी के लिए व्यक्ति को ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश मिलता था। जहाँ वह भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करता था। सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों।इस आश्रम में रहकर व्यक्ति शिक्षा के साथ साथ आगे के आश्रमों के लिए शक्ति अर्जित करता था। और शिक्षा देने का कार्य चौथे आश्रम मे पहुंचा व्यक्ति करता था जो पिछले आश्रमों मे प्रतिभाशाली रहा हो और मोक्ष प्राप्त कर लिया हो या साधना में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया हो, जिसकी सांसारिक वासनाएं क्षीण हो चुकी हों। फिर प्राप्त शिक्षा के बल पर वह व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। 
गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों के लिए आधार था और उनको संभालने, उनके पोषण का काम करता था। गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति को धर्मपूर्वक आचरण करते हुए संसार के सुख दुखों का अनुभव लेना होता था। उसे समाज मे अपना योगदान देना होता था। अर्थोपार्जन,व्यवसाय से तथा दान धर्म के द्वारा ब्रह्मचर्य आश्रम में रह रहे लोगों को और उन आश्रमों को सहारा देना होता था। युद्ध, निर्माण, व्यापार और सेवाओं के द्वारा समाज और आर्थिक गतिविधियों मे अपना योगदान देना होता था और अपनी व परिवार की आवश्यकताओं और शौक पूरे करने होते थे। इसके बाद वह समयानुसार ब्रह्मचर्य आश्रम से शिक्षित होकर आयी नयी पीढ़ी को अपने अनुभव और उत्तराधिकार सौंपकर वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था। इस तरह प्राचीन काल मे समाज और व्यक्तिगत जीवन की गति थी। समाज समृद्ध था, प्राकृतिक संसाधन बहुतायत थे। वनस्पति, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, भौतिक तत्व और मनुष्य मे एक गहरी संगति थी, एक संगीतात्मक लयबद्धता थी। मनुष्य जीवन में धर्म केंद्रीय तत्व था। 
अब आधुनिक समाज के जीवन यापन के तौर तरीकों पर नजर डालते हैं। पश्चिमी सभ्यता के जीवन में सिर्फ दो स्तंभ हैं- अर्थ और काम। पहले और चौथे चरण को उन्होंने ओल्ड फैशन या व्यर्थ कहकर बाहर कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वे जीवन में धन के अर्जन और यौन सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनके द्वारा चोरी, बेईमानी, लोगों/समाज/देशों को गुलाम बनाना आदि उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। रही सही कसर उनके आधुनिक धार्मिक विश्वास पूरी कर देते हैं जिनके अनुसार बस एक ही जीवन है और इसके साथ ही सबकुछ समाप्त हो जाएगा। तो जितना ज्यादा सुख भोग सको और इसके लिए जितना धन और सुविधाएं जुटा सको जुटाओ, जायज नाजायज हर तरीके से। तभी तो आज तमाम बड़ी-बड़ी पश्चिमी कंपनियां और संगठन जो बड़े सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन के नाम पर बनती हैं और इसके लिए काम करने का दंभ भरती हैं वे भी बाद में कुछ और ही निकलती हैं और यह सब सिर्फ उनके धन कमाने का नया तरीका ही साबित होता है। 
अब हम आधुनिक समाज व्यवस्था के कुछ प्रभागों को देखते हैं जैसे शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार। आधुनिक पश्चिमी जीवन पद्धति के अनुसार इस मिले हुए इकलौते जीवन में ज्यादा से ज्यादा सुखों को भोगना चाहिए। अब इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धन बहुत सी सुविधाओं तक आसान पहुंच बनाता है जिनसे सुख पाने मे सहायता मिलती है। और संसार में सुख सिर्फ एक ही है यौन सुख। यह मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त इकलौता सुख है। इसके बाद मनुष्य को धर्म साधना के द्वारा यौन से उच्चतर सुखों की प्राप्ति करनी होती है। यौन सुख प्रकृति प्रदत है और बहुत से बंधनों के अधीन है इसलिए हर यौन सुख मनुष्य को रिक्तता और विषाद का अनुभव कराता है। यौन प्रकृति के लिए जीवन की निरंतरता का माध्यम भी है। इसलिए प्रकृति बलपूर्वक मनुष्य को इसमे ले जाती है। इसमे जाने या न जाने के अधिकार के रूप में मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। यह एक प्राकृतिक परतंत्रता है। इसलिए यह सदैव विषाद का कारण बनता रहता है और हर यौन कृत्य मे शक्ति क्षय होती है इसलिए इसकी बारंबारता सीमित है। हर यौन कृत्य के बाद अगले के लिए और अधिक समय चाहिए उतनी शक्ति एकत्र कर तैयार हो सकने के लिए। इसके लिए सुविधा पूर्ण जीवन और पौष्टिक आहार विहार चाहिए जिसके लिए धन की आवश्यकता होती है। कुछ जानकारियां भी चाहिए लेकिन जल्दी से ज्यादा से ज्यादा सुख पाने की आशा मे पागल मनुष्य इसे नजरअंदाज करता है। अब आधुनिक मनुष्य धन की आवश्यकता के लिए व्यापार करता है या नौकरी। समाज या देश मे समृद्धि का प्रमुख स्रोत व्यापार है। अब मनुष्य व्यापार करता है और उसके लिए एक व्यवस्था है। पहले मनुष्य व्यापार करता था ताकि धन प्राप्त कर भौतिक सुखो को पा सके। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार व्यवस्था बड़ी से बड़ी होती गई। इसको जीवित रहने के लिए अधिक लोगों और संसाधनो की आवश्यकता होती गई। पहले व्यापार व्यवस्था शुरू हुई थी कि एक दिन सभी की आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी और हम आराम से बैठकर जीवन के सुखो को भोगेंगे। लेकिन अब इस वृहत व्यवस्था को चलाने के लिए मनुष्य के सुख चैन,अवकाश के समय और जीवन की ही बलि चढ़ाई जा रही है। पहले जीवन यापन करने के लिए व्यापार व्यवस्था शुरू की गई थी लेकिन आज व्यापार को चलाने के लिए जीवन यापन किया जा रहा है। जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए जिस व्यापार की शुरुआत हुई थी उसी व्यापार व्यवस्था को चलाने और बचाए रखने के लिए मनुष्य का जीवन और स्वतंत्रता स्वाहा हुआ जा रहा है। यही हाल हर एक पश्चिमी व्यवस्था का है। लोगों के स्वास्थ्य रक्षा और रोग मुक्ति के लिए आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था की नीव पड़ी थी लेकिन आज इस स्वास्थ्य व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नए नए रोगों की खोज से लेकर जैविक हथियारों के निर्माण जैसे नित नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। मनुष्य के स्वास्थ्य का चाहे जो हो पर यह चिकित्सा व्यवस्था बनी और चलती रहनी चाहिए। यही हाल आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का है। भारत में तो यह मैकाले की कुशिक्षा व्यवस्था और समय की बर्बादी ही है। पहले वैश्विक चिंतकों ने सोचा था कि सबको शिक्षित कर दें तो लोग सुखी हो जाएंगे और उनके दुख दूर हो जाएंगे। लेकिन आज शिक्षित अपराधियों और समाज के दुश्मनों की भीड़ और उनके विनाशकारी कुकृत्यों को देखकर यह भ्रम भी दूर हो गया है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पढ़े लिखे मूर्खों की फौज तैयार कर रही है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति समाज की आवश्यकताओं /चुनौतियों और जीवन की समस्याओं को हल कर पाने में असहाय नजर आता है तभी तो उच्च पदस्थ और साधन सुविधा संपन्न लोगों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। शिक्षा व्यवस्था आज अप्रासंगिक हो चुकी है। यह व्यक्ति की रचनात्मकता, कल्पना, विचारशक्ति और सृजनशीलता को नष्ट करके सिर्फ उसके दिमाग में जानकारियां ठूंसने का काम करती है। 
इस तरह हम आधुनिक जीवन पद्धति के तीन विभागों व्यापार, चिकित्सा और शिक्षा की व्यर्थता को देख चुके हैं। 
अब हम इस आधुनिक जीवन पद्धति के परिणामों को देखते हैं। इस तौर तरीके से जो लोग आधुनिक जगत में किसी तरह सफल हो पाते हैं अर्थात धनअर्जन करने मे सफल हो जाते हैं;संसाधनों, सुविधाओं का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं वे उनका उपयोग करने मे असमर्थ हो जाते हैं। उल्टे वही धन या सुविधा, संसाधन ही उनका उपयोग करने लग जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह धन या संसाधन किस लिए है? इनका क्या करना है? या कैसे इनका उपयोग किया जा सकता है? यह भयंकर विषाद को जन्म देता है और फिर वे उस धन या सुविधा, संसाधनों से दूसरों को परेशान करने लगते हैं या लोगों का वस्तुओं की तरह उपयोग करने का प्रयास करने लगते हैं। 
आने वाले भागों में हम देखेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से कैसे जिया जा सकता है? जीवन मे समस्याएं क्यों हैं और उनसे कैसे निपटा जा सकता है? आज मै प्ले स्टोर या एप स्टोर पर देखता हूंँ तो अच्छी नींद दिलाने, ठीक से जीवन यापन के तरीके सिखाने का दावा करने वाली बहुत सी एप्लीकेशन मौजूद हैं। आने वाले दिनों में हम देखेंगे कि क्या वाकई हमे उनकी आवश्यकता है? क्योंकि पश्चिमी तरीके के अनुसार तो हर चीज सिर्फ व्यापार का एक अवसर है। अपने इस चैनल/ब्लॉग के माध्यम से हम आप लोगों से जीवन यापन, सफलता और प्राप्त संसाधनों का उपयोग करने की कला के बारे में बात करेंगे। मेरा ध्येय है कि सब सुखी हों और कहीं कष्ट का नाम न हो। मेरा आदर्श वाक्य है - जीवन एक कला है। और मेरा प्रयास रहेगा कि इसमे हम निष्णात कैसे हो सकते हैं आप सबको सिखा सकूं। आपसे बात करेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से और इसका अत्यधिक आनंद लेते हुए कैसे जिया जाय?