Monday, July 27, 2020

चंद्रशेखर आजाद

 किसी अंग्रेज ने अपनी मां का इतना दूध नहीं पिया है कि मुझे गिरफ्तार कर सके- चंद्रशेखर आजाद। 
दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे। 
आजाद थे, आजाद हैं, आजाद रहेंगे।। - चंद्रशेखर आजाद 
आजादी मांगने से नहीं मिलती है। इसे अधिकारपूर्वक छीनना पड़ता है। - आजाद। 
आज़ाद का जन्म 1906 में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर भानवाड़ा गाँव मे हुआ था। बचपन से ही वे निडर और बहुत बहादुर थे। बचपन ले ही उन्हें तीरंदाजी का शौक़ था और वे अचूक निशाना लगाते थे। बचपन मे ही एक बार वे घर से भागकर एक व्यापारी के साथ मुंबई जा पहुँचे। वहाँ कुछ दिन इधर उधर काम करने के बाद वे वाराणसी जा पहुँचे और एक संस्कृत पाठशाला मे अध्ययन करने लगे। वहाँ एक दिन वे आज़ादी के लिए निकलने वाले जुलूस मे शामिल हुए और उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत ले जाया गया। जज ने उनसे नाम और पता पूछा तो उन्होंने अपना नाम आजाद,पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना घर बताया। जज ने उन्हें बेंतों से पिटाई की सदा सुनाई ,हर मार के साथ उनके मुँह से भारत माता की जय का नारा निकलता। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया।इससे क्रांतिकारियों मे उनकी ख्याति फैल गई और वे क्रांतिकारियों से जुड़ गए। एक सार्वजनिक सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि "अब कोई अंग्रेज़ मुझे पकड़ नहीं सकेगा , मैं आजाद हूँ और सदैव आजाद रहूँगा।" इसके बाद उनका नाम आजाद पड़ गया।
एक दिन उनके संगठन ने पुलिस कोतवाली में एक क्रांतिकारी पोस्टर चिपकाने की योजना बनाई पर इसे करने को कोई तैयार नहीं हुआ। तब आजाद ने यह करने का बीड़ा उठाया और पोस्टर को गोंद से अपनी पीठ पर चिपकाकर कोतवाली गए और सबके सामने दीवाल से पीठ टिकाकर पोस्टर चिपका दिया। फिर मौका देखकर चुपचाप चले गए। बाद में कोतवाली में हड़कंप मच गया पर कोई न जान सका कि यह कब और किसने किया? 
संगठन की गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता होने पर राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां और राजेंद्र लाहिड़ी आदि ने ट्रेन से सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई और काकोरी से पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए। स्टेशन से कुछ दूर बढ़ते ही जंजीर खींचकर रोका और उसमे जा रहा खजाना लूट लिया। 
इस घटना के महीने भर बाद आजाद के अलावा सभी पकड़े गए और सबको अंग्रेजी सरकार ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद आजाद झांसी के पास एक गांव धीमारपुर मे एक हनुमान मंदिर में सन्यासी के रूप में रहने लगे। गांव के मुखिया ने उनसे पाठशाला में बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। एक दिन मंदिर पर पुलिस का सिपाही उनसे आजाद के संदेह मे पूछताछ करने आया जिसे उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से भयभीत कर भगा दिया। उस गांव में रहते हुए आजाद अपने क्रांतिकारी साथियों को ओरछा के गहन जंगलों में फायरिंग का प्रशिक्षण भी देते रहे। फिर वह धीमारपुर से झांसी चले आए और वहां पर हरिशंकर के नाम से एक गाड़ी की दूकान मे गाडिय़ां बनाने और चलाने की नौकरी करने लगे। किसी को उन पर शक नहीं हुआ। कुछ समय बाद वहां से वे कानपुर गए और वहाँ पर सरदार भगत सिंह ने उनके संगठन की सदस्यता ग्रहण किया। 
उसी समय साइमन कमीशन इंग्लैंड से भारत आया और हिंदू मुसलमानों मे फूट डालने के लिए तमाम कार्य करने लगा। इसके चलते साइमन कमीशन का घनघोर विरोध होने लगा। लाहौर मे एक शांतिपूर्ण विरोध मार्च में अंग्रेजों ने लाला लाजपत राय नामक कांग्रेसी नेता को इतना पीटा कि उनकी मृत्यु हो गई। इससे क्रुद्ध होकर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल ने अंग्रेज अधिकारी स्काट जिसने लाजपत राय पर लाठी चार्ज का आदेश दिया था को मारने की योजना बनाई। वे कानपुर से लाहौर पहुंचे और स्काट को मारने की योजना बनाई। योजनानुसार जय गोपाल ने स्काट के थाने से बुलेट पर निकलने की सूचना भगत सिंह और राजगुरु को दिया। भगत सिंह और राजगुरु ने किसी अंग्रेज अधिकारी को बुलेट से आते देखा और गोलियों से भूनकर मार डाला। एक सिपाही ने दोनों को पकड़ने का प्रयास किया तो आजाद की पिस्तौल ने उस पर अपना मुंह खोल दिया। धमाके के साथ लपलपाती मौत निकली और उसे समाप्त कर दिया। इसके बाद तीनों अपनी साईकिलों पर सवार होकर भाग निकले। बाद में उन्हें पता चला कि उन्होंने स्काट के बजाय साण्डर्स को मार डाला है लेकिन उन्हें संतोष था क्योंकि लाजपत राय पर लाठी चार्ज करने वाली टीम मे वह भी शामिल था। इस घटना के बाद देशवासियों मे उत्साह की लहर दौड़ गई और सब लाला लाजपत राय का बदला लेने की खुशी मनाने लगे। इसके बाद जब वहां धरपकड़ तेज हो गई तो भगत सिंह और राजगुरु वहां से वेश बदलकर कलकत्ता चले गए। भगत सिंह वहां पर जतिन दास नामक क्रांतिकारी से मिले और उनकी मदद से आगरा में बम बनाने की फैक्ट्री संचालित करने लगे। 
इसके बाद भगत सिंह और राजगुरु ने अदालत में बम फेंककर साम्राज्यवाद का नाश हो और भारत माता की जय के नारे लगाए, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आजाद ने उनसे लाख कहा कि वे उन्हें सुरक्षित निकाल लेंगे पर भगत सिंह और राजगुरु ने आत्मबलिदान देने का निर्णय कर लिया था और कहा कि इससे बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी। इसके बाद आजाद ने वायसराय इरविन को मारने के लिए ट्रेन में बम रखा पर समय के हेरफेर के कारण वह बच गया।  इसके बाद आजाद कानपुर और दिल्ली में बम बनाने की फैक्ट्री का संचालन करते रहे। इसी बीच भगत सिंह को मृत्युदंड दिया गया। (23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी गई थी।) 
इसके बाद आजाद ने अपना मुख्यालय इलाहाबाद में स्थानांतरित कर लिया और वहाँ से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगे। लेकिन उनके दल मे से कुछ लोग अंग्रेजों से मिल गए। 27 फरवरी 1931 को जब आजाद अपने मित्र सुखदेवराज के साथ मूर कालेज से अल्फ्रेड पार्क से होकर जा रहे थे किसी भितरघाती गद्दार ने पुलिस को सूचना दे दी। तत्काल चार जीपों सहित लगभग 100 पुलिस वालों ने पार्क को घेर लिया और आजाद पर फायरिंग करने लगे। घंटाघर गोलीबारी होती रही आजाद ने अपने अचूक निशाने से बहुतों को नरक का रास्ता दिखाया ।लेकिन शीघ्र ही उनके पास गोलियां समाप्त हो गईं। उन्होंने सुखदेवराज को वहां से निकल जाने को कहा और स्वयं अंग्रेजों से लड़ते रहे। तभी उनके दाहिने हाथ में गोली लग गयी तब उन्होंने बांयें हाथ से दुश्मनों पर फायरिंग करके अंग्रेजों को भी अपनी प्रशंसा करने पर विवश कर दिया। जब उनके पास सिर्फ एक गोली बची तो उन्होंने कनपटी से पिस्तौल सटाकर भारत मां के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। उनके वीरगति के बाद भी भयभीत अंग्रेज घंटों उनके पास जाने से डरते रहे और उनके मृत शरीर पर हजारों गोलियां दाग कर यह सुनिश्चित किया कि वे वाकई मर चुके हैं। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 25 वर्ष थी। इस तरह से एक अध्याय का अंत हुआ। 
हां आजाद अंग्रेजों के लिए मर चुके थे पर वे हमारे हृदय मे सदैव जीवित रहेंगे। वे सदैव आजाद थे और आजाद ही रहे। इस घटना के लगभग 16 वर्षों बाद देश आजाद हुआ लेकिन भारत ने अपना सबसे तेजस्वी पुत्र को खो दिया था। 
जय हिंद। वंदे मातरम। 

तुलसीदास



तुलसीदास का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन संवत 1554 मे सोरों गाँव मे हुआ था- इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था और माँ का हुलसी । जन्म के समय ही माँ की और उसके कुछ दिनों बाद पिता की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद दासी चुनिया ने उनको पाला लेकिन कुछ दिनों बाद वह भी साँप के डँसने से मृत्यु को प्राप्त हो गयी। बेचारा बालक अनाथों की तरह भटकता हुआ गाँव के मंदिर मे पहुँचा।जहाँ उनकी भेंट बाबा नरहरिदास जी से हुई। बाबा बालक को अपनी कुटिया मे ले गए और उसे भगवान राम की कथाएँ सुनाने लगे। बालक बड़े मनोरोग से सुनता रहा । बाबा ने उसका नाम रामबोला रख दिया। उच्च शिक्षा के लिए बाबा नरहरिदास रामबोला को वाराणसी के आचार्य शेष सनातन के पास ले गए। वहाँ उन्होंने समस्त साहित्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया। शिक्षा के बाद रामबोला गुरू की आज्ञा से सोरों लौट गए और रामकथा का गान करने लगे। इससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी और लोगों ने उन्हें तुलसीदास कहना शुरू कर दिया। फिर बद्री गाँव के दीनबंधु पाठक की सुंदरी पुत्री रत्नावली से उनका विवाह हो गया। तुलसीदास रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे और उसके बिना थोड़ी देर मे ही अधीर हो जाते थे।एक दिन उनकी अनुपस्थिति में रत्नावली के मायके से बुलावा आया तो उसने तुलसीदास के सूचना लिए भाई दूज के अवसर पर कुछ दिनों के लिए मायके जाने की बात एक पत्र मे लिखकर रख दिया और मायके चली गयी। तुलसीदास ने वापस लौटकर पत्र पढ़ा किंतु रत्नावली का वियोग सहन न कर सके और आँधी पानी के बीच अपनी ससुराल के लिए निकल पड़े। तूफ़ान मे एक शव को नौका समझकर उसपर सवार होकर उफनती नदी पार कियाऔर आधी रात को ससुराल जा पहुँचे। सबको सोता देख घर के पीछे गए और लटकते साँप को रस्सी समझकर उसकी सहायता से चढ़कर अनुमान से रत्नावली के कक्ष मे जा पहुँचे। रत्नावली को उन्हें उस हाल मे आया देखकर बडी ग्लानि हुई और उसने तुलसीदास को फटकारते हुए कहा-“ आपको जितना प्रेम मेरे हाड़ माँस के इस शरीर से है इसका एकांत भी प्रभु राम से होता तो आप भवसागर से मुक्त हो गए होते।” तुलसीदास ग्लानि से जैसे ज़मीन में धँस गए और जैसे आए थे उसी रास्ते से वापस लौट गए। इसके बाद वह प्रयागराज पहुंचे और सन्यास लेकर अवधी भाषा मे रामकथा कहने लगे।

गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीराम के जीवन वृत्तांत पर कालजयी महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की रचना की। यह अकबर का शासन काल था। देश और समाज में हिंदू धर्म का लोप हो रहा था। हिंदू राजा हार मानकर अकबर के अधीनस्थ राजकाज कर रहे थे। समाज में बड़ा विघटन हो रहा था। ऐसे समय में गोस्वामी जी ने इस ग्रंथ की रचना कर हिंदू धर्म को पुनर्जीवित कर दिया। 

उससे पहले तक बहुत से संतों और कवियों ने विभिन्न भाषाओं में रामकथा की रचना की थी। इनमे महर्षि वाल्मीकि विरचित रामायण नक्षत्रों के बीच पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह सुशोभित हो रहा था। बाकी सब कवियों की राम कथाएं रामायण के आगे तारिकाओं की तरह टिमटिमा रही थीं। फिर गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस रूपी सूर्य का उदय हुआ और इसके आगे पूर्व प्रचलित समस्त रामगाथाएं फीकी पड़ गईं। अब तो आज कल के ग्रामीण जनमानस से पूछने पर रामायण के रचनाकार के रूप में गोस्वामी जी को ही याद किया जाता है। गोस्वामी जी ने जनसाधारण की अवधी भाषा में इतने सुंदर और लालित्यपूर्ण ढंग से काव्य रचना की है कि वह भगवान श्रीराम के समान ही अमृतमयी बन गयी है। तुलसीदास जी ने विशेष समाधि मे भगवान शिव की प्रेरणा से लोकमानस की अवधी भाषा में श्रीराम चरित मानस की रचना की है। जिससे यह भक्ति पूर्वक पाठ करने से अत्यंत चमत्कारिक परिणाम देने वाली बन गयी है। सबसे पहले इसका पाठ करना शुरू करते ही कुछ ही दिनों में यह मन को विकारमुक्त करके निर्मल करना शुरू कर देती है। जो लोग बहुत जप तप और व्रत नियमों का पालन कर रहे हों और मन की दुर्बलता के कारण बार बार भटक कर असफल हो जा रहे हों उनके द्वारा इस ग्रंथ का पाठ करने पर मन की कलुषता मिट जाती है और साधना के वे परिणाम अनायास ही बहुत आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। 

भगवान श्री राम भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रमाणिक आधार हैं। वे धर्म के जीवंत रूप हैं। भारतीय आज भी भगवान राम को इस देश का राजा, अयोध्या को देश की राजधानी और स्वयं को उनकी प्रजा मानते हैं। भारत में समय समय पर बहुत से प्रज्ञापुरुष और ईश्वर के अवतार हुए हैं जिन्होंने असंख्य लोगों को तारा या मुक्त किया है। लेकिन उनमे भगवान श्रीराम ऐसे हैं जिन्होंने बिना किसी सचेष्ट प्रयास के ही अपने आस पास के और दूर के लोगों को तार कर मुक्त कर दिया है। आज तक लोग उनके नाम स्मरण के द्वारा ही भवबंधन काटकर मोक्ष की प्राप्ति कर रहे हैं। भगवान राम को जिसने देखा वह तर गया, जिसने सुना वह तर गया। जो उनके साथ उठा बैठा, उनके साथ चला, उनको रास्ते पर चलते देखा, उनका नाम स्मरण किया वे सब तर गए। हनुमानजी ने तो सिद्ध ही कर दिया है कि भगवान श्री राम का नाम स्वयं भगवान श्री राम से भी अधिक प्रभावशाली है। एक बार भगवान श्री राम के गुरू वशिष्ठ महर्षि किसी से नाराज हो गए और भगवान श्रीराम से उसका वध करने को कहा। भगवान राम गुरू की आज्ञा का पालन करने को तैयार हो गए । वह व्यक्ति भागकर हनुमानजी की मां अंजना के पास पहुंचा और शरणागत होकर उनसे अपनी प्राण रक्षा के लिए प्रार्थना किया। माता ने उसे प्राण रक्षा का वचन देकर हनुमान जी को बुलाया और उसे उनके सुपुर्द कर आदेश दिया -" यह मेरा शरणागत है। इसकी रक्षा करो। " 

हनुमान जी ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। बाद में जब उन्हें पता चला कि उसे भगवान श्रीराम गुरू वशिष्ठ के अपमान का दंड देना चाहते हैं तो भी वे विचलित नहीं हुए और उसे लेकर सरयू के तट पर पहुंच गए। भगवान श्री राम उसे दंड देने के लिए वहां आए। लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई कि देखें अब क्या होता है? क्या रामभक्त हनुमान अपने मां के वचन की रक्षा के लिए अपने आराध्य से युद्ध करेंगे? लेकिन हनुमान जी को बल बुद्धि की खान ऐसे ही नहीं कहा जाता। वे उस शरणागत को अपने पीछे करके भगवान का प्रहार रोकने के लिए उसके आगे खड़े हो गए। भगवान ने जब बाण छोड़ा तो हनुमानजी ने उसे प्रणाम कर जय श्री राम का उद्घोष किया और आश्चर्य! वह बाण निष्फल होकर लुप्त हो गया। भगवान ने अनेक अमोघ दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया पर सब निष्फल रहे। यह देखकर जनसमुदाय भगवान श्रीराम की जय और रामभक्त हनुमान की जय का जयघोष करने लगी। इससे प्रसन्न होकर गुरु बशिष्ठ ने अपना वचन वापस लेकर भगवान को उस व्यक्ति को छोड़ देने को कहा। क्योंकि उन्होंने उसे क्षमा कर दिया था। 
तुलसीदास ने जब घर बार त्याग दिया तो वे सन्यासियों का सा जीवन व्यतीत करते हुए भगवान श्रीराम की कथा कहने लगे। उनकी कथा इतनी मधुर होती थी कि दूर दूर से लोग उनको सुनने के लिए आने लगे। आने वाले श्रोताओं मे तुलसीदास जी ने देखा कि एक तेजस्वी वृद्ध सबसे पहले आता है और सबसे बाद में जाता है। उन्होंने पहचान लिया कि ये हनुमानजी हैं और एकदिन जब वे जाने के लिए उठे तो तुलसीदास उनके चरणों में गिर पड़े और उनकी स्तुति करने लगे। हनुमानजी जब प्रसन्न हुए और दर्शन दिया तो तुलसीदास जी ने उसने भगवान श्रीराम का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमानजी ने उन्हें चित्रकूट जाने को कहा और बताया कि वीं उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट मे जाकर कुटी बनाकर रहने लगे। एक दिन उन्होंने रास्ते में दो श्याम और गौर वर्ण के सुंदर राजकुमारों को घोड़ों पर सवार होकर जाते देखा। उन्हें देखकर वे अभिभूत हो उठे लेकिन पहचान नहीं सके। बाद में जब हनुमान जी ने आकर उन्हें बताया कि वे दोनो राजकुमार श्रीराम लक्ष्मण थे तो उन्होंने एकबार फिर दर्शन दिलाने के लिए प्रार्थना किया। कुछ दिनों के बाद तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर बैठे हुए थे कि दो सुंदर नवयुवक आए और उनसे चंदन लगाने के लिए कहने लगे। उनके सुंदर सांवले और गोरे रूप को देखकर तुलसीदास सुध बुध खो बैठे और उसी अवस्था में दोनों को तिलक लगाया। तभी हनुमानजी जो वहाँ तोते के रूप में विराजमान थे उन्होंने तुलसीदास जी को सचेत करने के लिए और भगवान की पहचान बताने के लिए एक दोहा कहा-

चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीड़। 

तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर।। 

यह सुनकर तुलसीदास जी को होश आया। जैसे वे समाधि से जगे हों लेकिन तब तक दोनों राजकुमार जा चुके थे। वे उनके पीछे रास्ते पर दौड़े पर वहाँ कोई नहीं था। लेकिन उन्होंने भगवान का दो बार दर्शन कर लिया था और एक बार तिलक लगाने के बहाने उनका स्पर्श भी किया था। भगवान राम के स्पर्श ने तुलसीदास मे जादुई परिवर्तन कर दिया और उनमे एक दिव्यता आ गई। उनकी वाणी मे सम्मोहन शक्ति सी आ गई और दिन दूनी रात चौगुनी गति से उनके श्रोताओं की संख्या बढ़ने लगी। फिर भगवान शिव की प्रेरणा से उन्होंने श्रीराम कथा की रचना आरंभ की। उनकी बढ़ती ख्याति और प्रभाव से चिंतित होकर कुछ लोगों ने सम्राट अकबर से उनकी शिकायत कर दी। अकबर ने सच्चाई का पता लगाने के लिए रहीम दास जी को भेजा और रहीम तुलसीदास जी से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने लौटकर अकबर को बताया कि तुलसीदास जी तो सिर्फ अपने प्रभु की कथा का प्रचार करते हैं बस। 
तुलसीदास जी महाराणा प्रताप के आध्यात्मिक गुरू भी थे। एकबार जब अकबर से हारकर जंगल मे भटकते हुए प्रताप और उनका परिवार घास की रोटी बना कर खाने जा रहे थे तो एक ऊदबिलाव उसे ले भागा। और लोग तो संतोष कर गए लेकिन छोटा बालक भूख से बिलख उठा। इससे राणा का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने परिवार की परेशानियों को देखते हुए अकबर से संधि करने का फैसला किया। उन्होंने अकबर के पास इस आशय का संदेशा भेजा। इसी दौरान एकदिन किसी से सुनकर वे तुलसीदास जी से मिलने गए। गोस्वामी जी ने उन्हें घबराने की बजाय अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहने को कहा और कहा कि प्रभु श्रीराम ने भी तो 14 वर्षों का वनवास झेला था। यह संकट शीघ्र दूर हो जाएगा और आपको आपका खोया हुआ राज्य और सम्मान पुनः प्राप्त होगा। नई सेना बनाओ और फिर से प्रयास करो। प्रताप वहाँ से एक नया बल लेकर लौटे। प्रभु की कृपा से उसी समय राणा प्रताप से भामाशाह मिलने गया और उन्हें नयी सेना के निर्माण के लिए अपना सारा धन अर्पित कर दिया। उसी समय अकबर के सेनापति जयसिंह तुलसीदास जी से मिलने आए तो उन्होंने उनसे राणा प्रताप के विरुध्द सेना न उतारने को कहा। गोस्वामी जी की बात मानकर जयसिंह ने अपनी सेना पीछे हटा ली। महाराणा प्रताप ने प्राप्त धन से नयी सेना बनाई और पुनः युद्ध लड़ने लगे। इस बार ईश्वर की कृपा से उन्हें सफलता मिलने लगी और धीरे-धीरे उन्होंने अपने सभी किले अकबर से वापस ले लिए। लेकिन पूरा जीवन संघर्षरत रहने और कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप के शरीर त्याग के समय तक केवल एक या दो किले ही अकबर के पास रह गए थे बाकी सब उन्होंने वापस जीत लिया था। 
तुलसीदास जी ने जब रामचरित मानस को पूरा कर लिया तो उनकी ख्याति दिन पर दिन बढ़ने लगी। साथ ही उनके विरोधियों की भी संख्या बढ़ने लगी। काशी के पंडितों ने संस्कृत के अलावा किसी भाषा में रामकथा लिखने के कारण उनका विरोध शुरू कर दिया और उनकी पांडुलिपि नष्ट करने के लिए दो चोर भेजे। चोर जब रात को रामचरित मानस की प्रति चुराने के लिए तुलसीदास की कुटिया पर पहुंचें तो उन्होंने वहां पर दो सुंदर युवकों को धनुष बाण लिए पहरा देते देखा। इसके बाद भगवान का दर्शन होने के परिणामस्वरूप चोरों की बुद्धि निर्मल हो गई, उन्होंने तुलसीदास जी से क्षमा मांगी और चोरी छोड़कर सन्यासी हो गए। 
इसपर भी तुलसीदास जी के विरोधियों को संतोष नहीं हुआ और उन्होंने भगवान विश्वनाथ से ही रामचरित मानस की परीक्षा कराने का निर्णय लिया। वेद, पुराणों और अन्य ग्रंथों के साथ सबसे नीचे रामचरित मानस को भगवान श्री विश्वनाथ के समक्ष रखकर  मंदिर मे ताला लगा दिया गया। जब सुबह ताला खोलकर देखा गया तो रामचरित मानस सबसे ऊपर रखा था और उसपर भगवान श्री विश्वनाथन का कृपा प्रसाद था। अब किसी को श्री रामचरितमानस और तुलसीदास जी पर कोई संदेह नहीं रह गया। काशी के विरोधी पंडितों ने भी अपनी गलती स्वीकार कर उनसे क्षमा मांगी। 
कहते हैं कि मीराबाई जब भगवान श्रीकृष्ण के उपासना मे मग्न होकर गीत गाकर नाचती थीं तो उनके परिवार के लोगों ने उनपर अत्याचार करने शुरू कर दिए। उनको विष दिया, सर्प से कटवाना चाहा पर ईश्वर की कृपा से वे मीराबाई का कुछ नहीं बिगाड़ सके। इसपर इन विघ्नों से परेशान होकर मीरा ने तुलसीदास जी को चिट्ठी लिखकर सलाह मांगी तो गोस्वामी जी ने उनको जवाब में यह दोहा लिखकर भेजा-

जिनके प्रिय न राम बैदेही, 

तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम स्नेही। 

और इसे पढ़कर मीराबाई ने अपना घर बार त्याग दिया और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 
तुलसीदास जी के समय मे हिंदू धर्म जगत अनावश्यक संकीर्णताओं मे बंटकर आपस में एक दूसरे से विवाद करता हुआ उलझा रहता था। कोई कृष्ण भक्ति की शाखा थी तो कोई रामभक्ति की। कहीं सगुण उपासना वाले लोग थे तो कहीं निर्गुण। तुलसीदास जी ने इन सबको एक सूत्र में पिरोने का काम किया और इनके वैचारिक वैमनस्य को दूर किया। एक बार गोस्वामी जी मथुरा श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गए। लोगों ने सोचा कि ये तो राम भक्त हैं क्या ये भगवान श्रीकृष्ण के आगे शीश झुकाएंगे और जब गोस्वामी जी ने मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे शीश झुकाया और पूजा आरती किया तो लोगो को कृष्ण की मूर्ति मे ही धनुष बाण लिए भगवान राम के भी दर्शन हुए। 
भगवान श्री राम की कथा लिखकर और उसका प्रचार प्रसार कर गोस्वामी तुलसीदास जी तर गए और आज भी लोग उनकी इस रचना का भक्तिपूर्वक पाठ कर बिना किसी अतिरिक्त श्रम या साधना के अपने मनुष्य होने की परम संभावना को प्राप्त हो रहे हैं। 
जय श्री राम, जय श्री हनुमान, जय गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज। 

Sunday, July 19, 2020

गुलवाम घाटी :भारत और चीन

चीन ने सोचा था कि वह भारत को धमकाएगा, गुलवाम मे उसकी जमीन पर बढ़ आएगा और भारत डर कर चुपचाप समझौता कर लेगा। वह चीन जैसी शक्ति से टक्कर थोड़े ही ले पाएगा। लेकिन मामला पड़ गया उल्टा। 
चीनी सैनिक कोरोना महामारी का लाभ उठाकर भारतीय क्षेत्र में घुस आते हैं। सदैव की तरह भारत चीन से बातचीत से समस्या को हल करने का प्रयास करता है जिसे चीन हमारे देश की कमजोरी समझने की भूल कर बैठा। बातचीत में तय होता है कि दोनों देशों के सैनिक अपनी पुरानी जगह पर वापस जाकर LAC का सम्मान करते हुए पूर्वस्थिति बहाल करेंगे। वार्ता के बाद भारतीय सैनिक वापस लौटे तो चीनी सैनिकों ने वापस न लौटकर अचानक पूरी तैयारी के साथ अंधेरे में भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिक ऐसी गद्दारी से अंजान थे और चीनी लोहे के कीलों वाले डंडों से सुसज्जित थे जिसके कारण 20 भारतीय सैनिक पास ही बहती नदी में गिरकर वीरगति को प्राप्त हो गए। 
इसके बाद जो हुआ उससे चीनियों की रूहें दहल उठीं। उस भारतीय सैन्य टुकड़ी के साथ मौजूद घातक सैन्य कमांडो तुरंत विद्युत गति से ( जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है) चीनी तंबुओं के पास पहुंचते हैं और ऐसी निर्दयता से चीनी सैनिकों का एकतरफा संहार करते हैं, उनके तंबू उखाड़ फेंकते है, उनका सारा सामान नष्ट कर देते हैं और उनकी सभी सामग्रियों को उठा लाते हैं जिनमे दवाइयां भी शामिल हैं और हो सकता है कि कोरोना का इलाज भी उसमे हो जो चीन दुनिया से छिपाकर प्रयोग कर रहा हो। चीनी सैनिकों के तंबुओं तक पहुंच कर उनको नरक का रास्ता दिखाने से पहले उन घातक कमांडोज ने भारतीय सैनिकों पर हमला करने आए चीनी सैनिकों की गर्दन तोड़कर उन्हें समाप्त कर देते हैं और उनके कील लगे लोहे के डंडे भी छीन लेते हैं। 
यह मारकाट इतना भयानक था कि इससे भयभीत चीनी बाद मे भारत को बताकर आश्वासन लेने के बाद ही अपने मृत सैनिकों का शव उठाने आते हैं वह भी हेलिकॉप्टरों से। चीनी सरकार इस घटना को अपने देशवासियों से छुपाते हुए अपनी इज्जत बचाते फिर रही है। इससे संबंधित सभी न्यूज स्रोतों और पोस्टों को डिलीट कर रही है। 
भारतीय सैनिकों ने चीन को ऐसा मारा है कि वे अब भयभीत हैं। भारत से अनुमति लेकर डरते डरते तो अपने सैनिकों के शव उठाने आए थे वो भी हेलीकॉप्टरों के साथ। हमारी अपनी मीडिया मे चीनी दलाल बैठे हैं। तमाम संगठनों, पार्टियों, पदों पर उनकी घुसपैठ है। यही हाल उन्होंने अमेरिका में भी किया है। यह है उनकी असली चाल और ताकत।इस बारे में सही जानकारी के लिए पाकिस्तानी चैनलों के कार्यक्रम देखिए।
बहुत सी बातें होती हैं जिन्हें करके खामोश रहा जाता है ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक लाभ लिया जा सके।
भारत ने चीन को मारा भी है और आरोप भी लगा रहा है। मतलब चीन चारो खाने चित।चीन से विवाद और उसकी दगाबाजी के बाद अब भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की लहर उठ पड़ी है जो धीरे धीरे तूफ़ान बनती जा रही है। इससे चीनी कंपनियों मे खलबली मच गई है। इस विरोध से घबराकर Zoom एप ने वक्तव्य जारी कर कहा कि "हम एक अमेरिकी कंपनी हैं और चीन से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।" चीन दुनिया भर के देशों में सस्ता, दो कौड़ी का माल, सस्ती दरों पर, बहुत बड़े पैमाने पर बेचकर लाभ कमाता है और उस देश के आधारभूत आर्थिक ढांचे को तबाह कर देता है। उसने यही चाल भारत के साथ भी चलने का प्रयास किया। इसके लिए उसनें बाकायदा हमारे देश में बहुत से मीडिया हाउसों/कर्मियों, राजनीतिज्ञों, विभिन्न पदों और संगठनों को घूस देकर अपने हित मे काम करने के लिए तैयार कर लिया है। यह आप इस समय बहुत लोगों के बयान और हरकतों से समझ सकते हैं कि कौन चीन को लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रहा है। कुछ लोग छुपे होकर भी इस काम मे लगे हैं।

भारत और विश्व :पूरब या पश्चिम

जय श्री गणेश । अहं ब्रह्मास्मि, रसो वै सः ।
संसार में दो जीवन दर्शन हैं - पूरब और पश्चिम। यह प्रमुख विभाजन है। बाकी सभी विभाजन इन दोनो के अंतर्गत आते हैं। वैसे आजकल सारे संसार में पश्चिमी जीवन दर्शन या फिलासफी की ही प्रमुखता है। पूर्वी दर्शन सिकुड़ता जा रहा है और अब तो भारत में भी यह लुप्तप्राय हो रहा है। शिक्षा, रहन सहन, सोचने विचारने का तरीका, खान पान, तीज-त्यौहार, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में भारत मे भी पश्चिमी तौर तरीकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। 
भारत की जीवन पद्धति धार्मिक है जो समष्टि को अपने मे समाहित करते हुए चलती है जबकि पश्चिमी पद्धति तथाकथित विज्ञान पर आधारित है जो सबकुछ तोड़ने और विध्वंस पर आधारित है। भारत के अनुसार मूलतत्व पांच हैं और उनकी परिभाषा का आधार दूसरा है, गुणात्मक है जबकि पश्चिमी जीवन दृष्टि के अनुसार मूल तत्व 108 के लगभग हैं और उनकी मूलतत्वों की परिभाषा के आधार भारत से ठीक उल्टे हैं। 
भारतीय चिंतन के अनुसार जो पदार्थ या वस्तुएं जीवन को संभव बनाने के मूलभूत आधार हैं वे मूलतत्व हैं, जो शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं वे मूलतत्व हैं और उनकी संख्या पांच है-आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी। ये पांच मूलतत्व इस मर्त्य शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं। जबकि पश्चिमी दृष्टि के अनुसार वे पदार्थ जिन्हें और भी ज्यादा साधारण कणों मे (दो या दो से अधिक) तोड़ा नहीं जा सकता है मूलतत्व कहलाते हैं। फिर यहां से होते हुए अणु परमाणुओं की यात्रा प्रारंभ होती है। भारत में भी इन अणु और परमाणुओं की संरचना और संभावना का ज्ञान था लेकिन इसके विनाशकारी संभावनाओं के चलते इनसे संबंधित प्रयोगों को नष्ट कर दिया गया और छुपा दिया गया। परमाणु तक की जानकारी अभी भी भारतीय पुरा साहित्यों मे खोजा जा सकता है। परमाणु से संबंधित कुछ अध्ययन या विवरण महाभारत कालीन महर्षि कणाद के कार्य के रूप में उल्लिखित हुआ है। बाकी जानकारी जानबूझकर नष्ट कर दी गई या छिपा दी गई। 
भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन को ठीक से सार्थक तरीके से जीने के चार आधार हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें मनुष्य के चार पुरुषार्थ कहते हैं। इनका मतलब है कि जीवन में धर्म पूर्वक आचरण करते हुए अर्थोपार्जन करना चाहिए और फिर उससे भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए काम का सेवन करना चाहिए। तत्पश्चात जब जीवन के सुख दुखों का सम्यक अनुभव हो जाए तो फिर संसार से उदासीन होकर या त्याग कर चरम पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। 
अब धर्म क्या है और धर्मपूर्वक आचरण क्या है? इसके ज्ञान के लिए मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों मे बांटा गया था। जीवन को 100 साल का मानते हुए 25 - 25 वर्ष के चार विभाग किए गए थे - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। सबसे पहले जीवन की तैयारी के लिए व्यक्ति को ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश मिलता था। जहाँ वह भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करता था। सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों।इस आश्रम में रहकर व्यक्ति शिक्षा के साथ साथ आगे के आश्रमों के लिए शक्ति अर्जित करता था। और शिक्षा देने का कार्य चौथे आश्रम मे पहुंचा व्यक्ति करता था जो पिछले आश्रमों मे प्रतिभाशाली रहा हो और मोक्ष प्राप्त कर लिया हो या साधना में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया हो, जिसकी सांसारिक वासनाएं क्षीण हो चुकी हों। फिर प्राप्त शिक्षा के बल पर वह व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। 
गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों के लिए आधार था और उनको संभालने, उनके पोषण का काम करता था। गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति को धर्मपूर्वक आचरण करते हुए संसार के सुख दुखों का अनुभव लेना होता था। उसे समाज मे अपना योगदान देना होता था। अर्थोपार्जन,व्यवसाय से तथा दान धर्म के द्वारा ब्रह्मचर्य आश्रम में रह रहे लोगों को और उन आश्रमों को सहारा देना होता था। युद्ध, निर्माण, व्यापार और सेवाओं के द्वारा समाज और आर्थिक गतिविधियों मे अपना योगदान देना होता था और अपनी व परिवार की आवश्यकताओं और शौक पूरे करने होते थे। इसके बाद वह समयानुसार ब्रह्मचर्य आश्रम से शिक्षित होकर आयी नयी पीढ़ी को अपने अनुभव और उत्तराधिकार सौंपकर वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था। इस तरह प्राचीन काल मे समाज और व्यक्तिगत जीवन की गति थी। समाज समृद्ध था, प्राकृतिक संसाधन बहुतायत थे। वनस्पति, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, भौतिक तत्व और मनुष्य मे एक गहरी संगति थी, एक संगीतात्मक लयबद्धता थी। मनुष्य जीवन में धर्म केंद्रीय तत्व था। 
अब आधुनिक समाज के जीवन यापन के तौर तरीकों पर नजर डालते हैं। पश्चिमी सभ्यता के जीवन में सिर्फ दो स्तंभ हैं- अर्थ और काम। पहले और चौथे चरण को उन्होंने ओल्ड फैशन या व्यर्थ कहकर बाहर कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वे जीवन में धन के अर्जन और यौन सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनके द्वारा चोरी, बेईमानी, लोगों/समाज/देशों को गुलाम बनाना आदि उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। रही सही कसर उनके आधुनिक धार्मिक विश्वास पूरी कर देते हैं जिनके अनुसार बस एक ही जीवन है और इसके साथ ही सबकुछ समाप्त हो जाएगा। तो जितना ज्यादा सुख भोग सको और इसके लिए जितना धन और सुविधाएं जुटा सको जुटाओ, जायज नाजायज हर तरीके से। तभी तो आज तमाम बड़ी-बड़ी पश्चिमी कंपनियां और संगठन जो बड़े सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन के नाम पर बनती हैं और इसके लिए काम करने का दंभ भरती हैं वे भी बाद में कुछ और ही निकलती हैं और यह सब सिर्फ उनके धन कमाने का नया तरीका ही साबित होता है। 
अब हम आधुनिक समाज व्यवस्था के कुछ प्रभागों को देखते हैं जैसे शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार। आधुनिक पश्चिमी जीवन पद्धति के अनुसार इस मिले हुए इकलौते जीवन में ज्यादा से ज्यादा सुखों को भोगना चाहिए। अब इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धन बहुत सी सुविधाओं तक आसान पहुंच बनाता है जिनसे सुख पाने मे सहायता मिलती है। और संसार में सुख सिर्फ एक ही है यौन सुख। यह मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त इकलौता सुख है। इसके बाद मनुष्य को धर्म साधना के द्वारा यौन से उच्चतर सुखों की प्राप्ति करनी होती है। यौन सुख प्रकृति प्रदत है और बहुत से बंधनों के अधीन है इसलिए हर यौन सुख मनुष्य को रिक्तता और विषाद का अनुभव कराता है। यौन प्रकृति के लिए जीवन की निरंतरता का माध्यम भी है। इसलिए प्रकृति बलपूर्वक मनुष्य को इसमे ले जाती है। इसमे जाने या न जाने के अधिकार के रूप में मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। यह एक प्राकृतिक परतंत्रता है। इसलिए यह सदैव विषाद का कारण बनता रहता है और हर यौन कृत्य मे शक्ति क्षय होती है इसलिए इसकी बारंबारता सीमित है। हर यौन कृत्य के बाद अगले के लिए और अधिक समय चाहिए उतनी शक्ति एकत्र कर तैयार हो सकने के लिए। इसके लिए सुविधा पूर्ण जीवन और पौष्टिक आहार विहार चाहिए जिसके लिए धन की आवश्यकता होती है। कुछ जानकारियां भी चाहिए लेकिन जल्दी से ज्यादा से ज्यादा सुख पाने की आशा मे पागल मनुष्य इसे नजरअंदाज करता है। अब आधुनिक मनुष्य धन की आवश्यकता के लिए व्यापार करता है या नौकरी। समाज या देश मे समृद्धि का प्रमुख स्रोत व्यापार है। अब मनुष्य व्यापार करता है और उसके लिए एक व्यवस्था है। पहले मनुष्य व्यापार करता था ताकि धन प्राप्त कर भौतिक सुखो को पा सके। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार व्यवस्था बड़ी से बड़ी होती गई। इसको जीवित रहने के लिए अधिक लोगों और संसाधनो की आवश्यकता होती गई। पहले व्यापार व्यवस्था शुरू हुई थी कि एक दिन सभी की आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी और हम आराम से बैठकर जीवन के सुखो को भोगेंगे। लेकिन अब इस वृहत व्यवस्था को चलाने के लिए मनुष्य के सुख चैन,अवकाश के समय और जीवन की ही बलि चढ़ाई जा रही है। पहले जीवन यापन करने के लिए व्यापार व्यवस्था शुरू की गई थी लेकिन आज व्यापार को चलाने के लिए जीवन यापन किया जा रहा है। जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए जिस व्यापार की शुरुआत हुई थी उसी व्यापार व्यवस्था को चलाने और बचाए रखने के लिए मनुष्य का जीवन और स्वतंत्रता स्वाहा हुआ जा रहा है। यही हाल हर एक पश्चिमी व्यवस्था का है। लोगों के स्वास्थ्य रक्षा और रोग मुक्ति के लिए आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था की नीव पड़ी थी लेकिन आज इस स्वास्थ्य व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नए नए रोगों की खोज से लेकर जैविक हथियारों के निर्माण जैसे नित नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। मनुष्य के स्वास्थ्य का चाहे जो हो पर यह चिकित्सा व्यवस्था बनी और चलती रहनी चाहिए। यही हाल आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का है। भारत में तो यह मैकाले की कुशिक्षा व्यवस्था और समय की बर्बादी ही है। पहले वैश्विक चिंतकों ने सोचा था कि सबको शिक्षित कर दें तो लोग सुखी हो जाएंगे और उनके दुख दूर हो जाएंगे। लेकिन आज शिक्षित अपराधियों और समाज के दुश्मनों की भीड़ और उनके विनाशकारी कुकृत्यों को देखकर यह भ्रम भी दूर हो गया है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पढ़े लिखे मूर्खों की फौज तैयार कर रही है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति समाज की आवश्यकताओं /चुनौतियों और जीवन की समस्याओं को हल कर पाने में असहाय नजर आता है तभी तो उच्च पदस्थ और साधन सुविधा संपन्न लोगों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। शिक्षा व्यवस्था आज अप्रासंगिक हो चुकी है। यह व्यक्ति की रचनात्मकता, कल्पना, विचारशक्ति और सृजनशीलता को नष्ट करके सिर्फ उसके दिमाग में जानकारियां ठूंसने का काम करती है। 
इस तरह हम आधुनिक जीवन पद्धति के तीन विभागों व्यापार, चिकित्सा और शिक्षा की व्यर्थता को देख चुके हैं। 
अब हम इस आधुनिक जीवन पद्धति के परिणामों को देखते हैं। इस तौर तरीके से जो लोग आधुनिक जगत में किसी तरह सफल हो पाते हैं अर्थात धनअर्जन करने मे सफल हो जाते हैं;संसाधनों, सुविधाओं का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं वे उनका उपयोग करने मे असमर्थ हो जाते हैं। उल्टे वही धन या सुविधा, संसाधन ही उनका उपयोग करने लग जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह धन या संसाधन किस लिए है? इनका क्या करना है? या कैसे इनका उपयोग किया जा सकता है? यह भयंकर विषाद को जन्म देता है और फिर वे उस धन या सुविधा, संसाधनों से दूसरों को परेशान करने लगते हैं या लोगों का वस्तुओं की तरह उपयोग करने का प्रयास करने लगते हैं। 
आने वाले भागों में हम देखेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से कैसे जिया जा सकता है? जीवन मे समस्याएं क्यों हैं और उनसे कैसे निपटा जा सकता है? आज मै प्ले स्टोर या एप स्टोर पर देखता हूंँ तो अच्छी नींद दिलाने, ठीक से जीवन यापन के तरीके सिखाने का दावा करने वाली बहुत सी एप्लीकेशन मौजूद हैं। आने वाले दिनों में हम देखेंगे कि क्या वाकई हमे उनकी आवश्यकता है? क्योंकि पश्चिमी तरीके के अनुसार तो हर चीज सिर्फ व्यापार का एक अवसर है। अपने इस चैनल/ब्लॉग के माध्यम से हम आप लोगों से जीवन यापन, सफलता और प्राप्त संसाधनों का उपयोग करने की कला के बारे में बात करेंगे। मेरा ध्येय है कि सब सुखी हों और कहीं कष्ट का नाम न हो। मेरा आदर्श वाक्य है - जीवन एक कला है। और मेरा प्रयास रहेगा कि इसमे हम निष्णात कैसे हो सकते हैं आप सबको सिखा सकूं। आपसे बात करेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से और इसका अत्यधिक आनंद लेते हुए कैसे जिया जाय? 

Friday, June 5, 2020

चीन की एप रणनीति : भारतीय शेयरचैट बनाम चीनी टिकटाक

चीन कोई भी उत्पाद/चीज या एप असली नहीं बनाता। उनका हर उत्पाद या एप किसी न किसी पूर्व प्रचलित उत्पाद का नकल होता है। नकल करने मे वे बेजोड़ हैं और अपनी सारी अकल इसी मे लगाते हैं। सबसे पहले वे किसी देश में प्रचलित लोकप्रिय उत्पाद के लिए सर्वे करते हैं। पता लगाते हैं कि कौन सा एप या उत्पाद लोगों के बीच अत्यधिक प्रचलित है और आगे उसका क्या स्कोप है। उसके माध्यम से लोगों की सूचनाएं एकत्र करने और चुराने की क्या संभावनाएं हैं? जैसे कीबोर्ड एप जिसमे समस्त टंकित सामग्री को पढ़ने और संग्रहीत करने की कानूनी सहूलियत होती है। स्कैनर एप, सेल्फी और मेकअप एप आदि इसी श्रेणी में आते हैं। 
सन 2014 मे भारत का एक स्टार्ट अप एप 'शेयर चैट' लोगों के बीच बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा था।
चीन के एप निर्माताओं ने भारतीय बाजार का सर्वेक्षण किया और 'शेयर चैट' की खूबियों, खामियों व अग्रिम संभावनाओं का अध्ययन किया। फिर सन 2015 में उसके मूल कांसेप्ट मे कुछ और फीचर जोड़ कर एक नया एप टिकटाक लांच किया।
इसका बहुत तगड़े से विज्ञापन किया और इसमे बहुत बड़ा निवेश किया। इस तरह से इनका टिकटाक हमारे उभरते शेयरचैट को पछाड़ता हुआ तेजी से लोकप्रिय होता गया और हमारा स्टार्ट अप कहीं खो गया। इस तरह शेयर चैट के पूरे मार्केट को चीनी टिकटाक ने रणनीति के तहत हथिया लिया। उसी समय हमारा स्वदेशी 'म्यूजिकली' नामक एप भी कुछ उन्हीं खूबियों के साथ भारतीय और विश्व बाजार में छाता जा रहा था। यह एप चीनी टिकटाक के लिए कड़ा प्रतिस्पर्धी साबित हो सकता था। अतः टिकटाक ओनर चीनी 'बाइटडांस' ने म्यूजिकली को खरीदकर उसे टिकटाक मे मर्ज कर लिया। इस तरह चीन 'लघु चलचित्र शेयरिंग' या 'शार्ट वीडियो शेयरिंग' आधारित सोशल मीडिया का एकछत्र बादशाह बन गया। अब इस एप के माध्यम से चीनी निर्माता एप उपयोग कर्ताओं की निजी जानकारियां, (विज्ञापन के लिए डाटा कलेक्शन पालिसी के तहत) रुचियां और भी बहुत कुछ एकत्र करके उनका अध्ययन करते हैं कि किस सूचना या सामग्री पर उस देश के लोग कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। इन जानकारियों का उपयोग कई तरह से किया जा सकता है, दंगा फसाद कराने के लिए भी। टिकटाक द्वारा हमारे देश मे कुछ एकाउंट द्वारा रेप को उकसाने /बढ़ावा देने वाली और एसिड अटैक को प्रोत्साहित करने वाले वीडियो बनाने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई न करना इसका प्रमुख उदाहरण है। शायद बाद में कानूनी समस्या से बचने के लिए उनको हटा दिया था। कुछ समाचार चैनलों और स्रोतों के अनुसार अमेरिका दंगों में चीनी टिकटाक की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। तब तो मुझे भारत के दिल्ली दंगों मे भी इस सोशल मीडिया पर संदेह होता है। क्योंकि ऐसी कई आपत्तिजनक टिकटाक वीडियो ट्विटर और व्हाट्सअप /फेसबुक पर देखने को मिल रही थीं। जिनमे इस्लामिक कट्टरपंथी काफिरों की लाशें बिछाने वाला कोई गाना गा रहे थे। 

Wednesday, January 29, 2020

देवी भाग 1

डान साहब की आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था। उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए घुस गया। थांगल उसे रोकने के लिए कहता हुआ सीढ़ियों पर लड़खड़ाया और नीचे गिर कर बेहोश हो गया। मंदिर में डान साहब पागलों की तरह भटकता हुआ देवी की प्रतिमा के समक्ष पहुंचा। अष्टधातु की प्रतिमा अत्यंत सुंदर व दिव्य थी। डान साहब को लगा जैसे कोई उसे पकड़ कर उस प्रतिमा के समक्ष सिर झुकाने को विवश कर रहा है। लेकिन उसने आंख मूदकर जी कड़ा करके हाथ बढ़ाया और प्रतिमा को उठाकर बाहर भागा। अंधेरी रात में तत्काल घनघोर विद्युत कड़की और सभी अंग्रेज भय से जड़ हो गए।बिजली की चमक मे उन्होने आसमान में बहुत विशाल पक्षी को उड़ते देखा जिसकी आंखें आग जैसी दहक रही थीं और चोंच मे विशाल सांप को पकड़ रखा था। जिसकी फुसकार से पूरा वातावरण भयावना हो रहा था। सब डर गए। डान साहब तेजी से मंदिर के बाहर निकला और सबको वापस चलने का इशारा करते हुए भागा। सब मंदिर के साथ बनी ऊबड़ खाबड़ सीढ़ी जैसे रास्ते से अपने कैंप की ओर दौड़ पड़े। तेज हवा चलने लगी थी और कोई पक्षी बार बार अपने पंख फड़फड़ाते हुए उनके ऊपर आसमान में उड़ रहा था जो थोड़ी थोड़ी देर मे बार बार बहुत तेज आवाज में बोल रहा था। जिसके साथ ही विषधर सांप की भयंकर फुसफुसाहट गूंज रही थी। टार्च की रोशनी मे अंग्रेज भागते हुए अपने डेरे पर पहुंचे तो देखा कि उनके कई टेंट जल रहे हैं। सब आतंकित हो गए। डान साहब तेजी से अपने निजी टेंट की ओर लपका जिसमे उसकी बीबी मार्ग्रेट सो रही थी। अचानक मार्ग्रेट की तेज चीख गूंज उठी और टेंट के दरवाजे से वही विशाल पक्षी उड़ा, डान साहब भय से चीखकर गिर पड़ा।जलते टेंटों की आग की रोशनी में डान साहब ने देखा कि उस पक्षी ने अपनी चोंच मे एक सांप को पकड़ रखा था, जिसने ऊपर उठते हुए अपने फन से आग उगल कर डान साहब के टेंट में भी आग लगा दिया। तब कुछ अंग्रेजों ने उस पक्षी को निशाना साधते हुए गोली चला दिया। लेकिन उसपर कुछ असर नहीं हुआ और वैसे ही भयानक आवाज में शोरमचाता हुआ फुफकारते सांप को लेकर अंधेरे में उड़ गया। 
डान साहब तेजी से मार्ग्रेट को पुकारता हुआ टेंट में दाखिल हुआ। उसने देखा कि जलते टेंट में अभी भी आग मार्ग्रेट के बिस्तर तक नहीं पहुंची है और वह बेसुध सो रही है। देवी की मूर्ति को एक तरफ फेंककर डान साहब ने मार्ग्रेट को उठाया और जलते टेंट से बाहर ले आया। तबतक सारे टेंट जलकर खाक हो चुके थे। बाहर आते ही पादरी भी पास आ गया और डान साहब की बाहों में मार्ग्रेट को ध्यान से देखते हुए बोला '' उफ यह तो मर चुकी है '' '' नो। '' डान साहब चीखा और उसने ध्यान से मार्ग्रेट को देखा। उसका शरीर नीला पड़ गया था। सर्पदंश। कहीं उसी सांप ने तो नहीं जिसे पक्षी अपने चोंच मे पकड़कर उड़ रहा था और जिसने टेंटों में आग लगाया था। 
तबतक शोरगुल और गोलियों की आवाज से जागकर ग्रामीण भी मशालें लिए हुए अपने मुखिया टेकेंद्रजीत के नेतृत्व में लाठी, भाले, तलवार, धनुष आदि लिए हुए वहाँ आ पहुंचे। तब तक केवल कुछ जलते टेंटों के अवशेष ही रह गए थे जो धीमे धीमे बुझते हुए जल रहे थे। 
"क्या हो रहा है यहाँ? इतना शोरगुल और लड़ाई झगड़ा कैसा?" मुखिया टेकेंद्रजीत ने डान साहब को वहां उसकी बाहों में थमी निर्जीव मार्ग्रेट को घूरते हुए पूछा। "कुछ नहीं! टुम सब यहाँ से भाग जाओ।" डान साहब गुर्राया। इसपर मुखिया के साथ आए सभी ग्रामीण योद्धाओं ने अंग्रेजों पर अपने अपने तीर धनुष, भाले - तलवार आदि तान लिए। तब पादरी ने डान साहब को आंखों से इशारा करता हुआ उसे मार्ग्रेट को जीप में रखने को कहा और खुद ग्रामीणों से बोला" हमपर मुसीबट आया है। हमारे साहब की बीबी को सांप ने काट लिया है और हमारे सारे टेंट आग में जल गए।" तब तक सिर पर कपड़ा बांधे पुजारी थांगल भी वहां आ गया और आते ही चीखकर कहा "तुम फिरंगियों ने हमारी देवी की प्रतिमा को चुराया है और अब तुम पर देवी का कहर टूटा है। तुम सब मारे जाओगे। कोई नहीं बचेगा। "
यह सुनते ही गांव वाले और मुखिया क्रोध से कांपने लगे और मुखिया सब अंग्रेजों को मारने का आदेश देने ही वाला था कि पुजारी उसे रोकते हुए बोला" मुखिया जी! इन्हें मारने की जरुरत नहीं, ये सब देवी के प्रकोप से स्वतः मारे जाएंगे। बस इनसे हमें हमारी देवी की प्रतिमा वापस चाहिए और ये तत्काल यहाँ से भाग जाएं। अन्यथा हम इन्हें मार देंगे।" तब तक डान साहब मार्ग्रेट के मृत शरीर को जीप में रखकर वापस आ गया। वह बहुत दुखी था क्योंकि उसके दल मे कोई डाक्टर नहीं था और अब तक तो उसकी पत्नी निःसंदेह मर चुकी थी। उसने आंसुओं से भीगे हुए स्वर मे कहा" हमने गलट किया। हम टुम्हारा अपराधी है। हम टुम्हारा देवी को वापस दे देगा और यहाँ से हमेशा के लिए चला जाएगा। पर हम लड़ाई झगड़ा नहीं चाहता। हमारा बीबी मर गया। उसे सांप ने काट लिया है। उसने हमे यह सब करने से रोका था, पर हम नही माना।" और डान साहब रोने लगा। 
यह सुनकर पुजारी थांगल बोला" हमारी देवी मां शक्ति की प्रतिमा को वापस दे दो गोरे फिरंगी। तुम पर देवी का कहर शुरू हो गया है। पर हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हारी मेम को जीवित कर देंगे। लेकिन उसके तुरंत बाद तुम यहाँ से भाग जाओगे। "
पादरी ने गुस्से से विरोध में कुछ कहना चाहा तो डान साहब ने उसे रोक कर पुजारी थांगल से सहमति मे सिर झुकाकर बोला" जैसा टुम कहो पुजारी जी"
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ब्रिटिश भारत। मणिपुर के हरे भरे प्रदेश में बसा एक गांव विष्णुपुर। अंग्रेज़ों ने मणिपुर को कब्जे में कर लिया था और धीरे धीरे अपना प्रशासन आदि फैला रहे थे, व्यवस्थित कर रहे थे। अपना प्रशासन फैलाने के साथ ही साथ अंग्रेज अपनी समझ से तुच्छ व पिछड़े हुए मणिपुरी लोगों मे इसाई धर्म का प्रचार भी करने का प्रयास कर रहे थे। 
इसी सिलसिले में विष्णुपुर गांव में भी इसाई धर्म का प्रचार करने के लिए डान साहब अपने लाव लश्कर के साथ आया। उसकी टीम में कुछ बग्घी गाड़ियां, घोड़े - खच्चर, 20 - 30 सैनिक, कुछ औरतें और पादरी थे। वे सब पूरे गांव में घूमते घामते गांव के बाहर मैदान में नदी और झरने के सुंदर दृश्यों के बीच डेरा डाला। पूरा गांव उन्हें अचरज, घृणा और क्रोध से देख रहा था। कुछ देर बाद डान साहब के निर्देश पर पादरी अपने कुछ साथियों और गोरी औरतों के साथ गांव वालों से मिलने गया। जब उसने गांव वालों से बात करना चाहा तो लोग उसे हिकारत से देखकर भाग खड़े हुए। लोगों ने उसकी बातों मे उत्सुकता दिखाने के बजाय घृणा और भय प्रकट किया और उससे दूर भाग गए। पादरी "टुम हमसे बाट करेगा टो यीशू टुमारा पाप माफ कर देगा" कहता हुआ पूरा दिन गांव भर मे घूमता रहा पर उसकी दाल नहीं गली। हां कुछ मनचले लोग उसकी गोरी औरतों मे जरूर दिलचस्पी लेते दिख रहे थे पर जब पादरी या उसके साथ की गोरी औरतें उनकों पुकारतीं तो वे भाग जाते थे। सब उन्हें अजीब सी निगाहों से देख रहे थे। 
अंत में डान साहब ने पादरी की असफलता से परेशान होकर गांव के मुखिया टेकेंद्रजीत से बात करने का निश्चय किया। अपने साथ दो सैनिकों, रेडियो और अन्य आकर्षक वस्तुओं कपड़ों को लेकर डान साहब उसी दिन शाम को मुखिया के घर गया। घर परंपरागत तरीके से बांस इत्यादि से बना था और बेहद सुंदर था। गांव के सभी घर ऐसे ही बांसों और लकड़ियों इत्यादि से बने थे। मुखिया ने डान साहब का स्वागत करते हुए सम्मान से उसे बैठने को आसन दिया और खुद उसके सामने ऊंचे आसन पर बैठकर उससे बातचीत करने लगा। डान साहब ने मुखिया को रेडियो प्रदान किया और बोला "हम टुमारे लोगों की भलाई चाहता है। हम तुम लोंगों को अच्छी चीज़ें और सुविधाएं देगा।" उसकी बात सुनकर मुखिया के घर के और आस-पड़ोस के बच्चे जो कौतूहल वश वहां इकट्ठे हो गए थे, हंसने लगे। मुखिया टेकेंद्रजीत ने बच्चों को डाँटकर चुप कराया हालाँकि वह भी बमुश्किल अपनी हंसी रोक पा रहा था। पर संस्कारवश उसने अपनी हंसीं दबा ली। डान साहब ने मुखिया से कहा " टुमारा गांव बहुत सुंदर है।टुम हमारी बाट मानेगा टो हम टुम लोगों को बहुत अच्छी चीज़ें देगा और ऐसा कहकर जान साहब ने मुखिया के हाथ से रेडियो ले लिया जिसे वह बहुत आश्चर्य से उलट पलट कर देख रहा था। फिर डान साहब ने एक बटन घुमाया और कुछ खरखराहट के साथ रेडियो से आवाज आने लगी।सब लोग डरकर पीछे हट गए सिवाय मुखिया के जो अब और आश्चर्य से डान साहब के हाथ में थमे उस डब्बे को देख रहा था जो बोल रहा था।डान साहब ने कहा "डरो मट!यह रेडियो है।इसमें गाने समाचार आदि सुन सकटे हो।" और उसने कई स्टेशन बदलकर गानें तथा तमाम कार्यक्रम सुनाए। फिर वह बाक़ी तमाम आकर्षक वस्तुएं, खिलौने इत्यादि और रेडियो मुखिया को देकर और उपयोग करने का तरीका बताकर बाद में आने का वादा करके चला गया। तबतक अंधेरा घिरने लगा था। 
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अगले दिन डान साहब को पादरी ने प्रातः ही जगाया। डान साहब भुनभुनाते हुए उठा और बोला "क्या बाट है? टुम हमको सुबह सुबह क्यों डिस्टर्ब कर रहा है? जबाब मे पादरी ने अपने कानों पर हाथ लगाकर डान साहब को गांव से आती वाद्य यंत्रों की ध्वनि को सुनने का इशारा किया और अपने साथ आने को कहा। डान साहब पलभर मे तैयार होकर अपने दो सहयोगियों को लेकर पादरी के साथ ध्वनि संगीत की दिशा में चल पड़ा। संगीत की आवाज गांव से आ रही थी। गांव में पहुंच कर देखा कि हर एक घर से युवक, बच्चे व औरतें परंपरागत वेशभूषा में निकलकर पूजा का थाल व सामग्री लिए कहीं जा रहेथे। डान साहब ने चुपचाप सबको अपने पीछे आने का इशारा किया और उस समूह के पीछे पीछे जाने लगा। उनके पीछे चलते हुए डान साहब और पादरी गांव के पीछे काफी दूर एक पहाड़ी झुरमुट में बने प्राचीन मंदिर तक जा पहुंचे। सब गांव वासी मंदिर के बाहर मैदान में इकट्ठे हो गए और पूजा प्रारंभ हो गई। मंदिर के अंदर से पुजारी का कंठस्वर गूंज उठा। वह मंत्रोच्चार कर रहा था और कुछ लोग वाद्य यंत्र बजा रहे थे। लगभग घंटेभर मंत्रों और वाद्य यंत्रों की आवाज से वातावरण गूंजता रहा। डान साहब को भी कुछ अलौकिक सा एहसास हो रहा था पर पादरी के कारण उसने अपनी अकड़ बनाए रखा। फिर मुख्य पूजा कार्यक्रम समाप्त हो गया और जनसमुदाय नृत्य करने लगा।परंपरागत मणिपुरी नृत्य ने उस सुरम्य घाटों में अलौकिक छटा उपस्थित कर दी।यह सब देखकर डान साहब अभिभूत हो गया। अंत में प्रसाद वितरण किया गया और सब धीरे-धीरे वापस जाने लगे।तभी मुखिया ने दूर खड़े डान साहब और उसके साथियों को देखा तथा एक व्यक्ति को इशारा किया तो उसने डान साहब व उसके साथियों को भी प्रसाद दिया। दिव्य सुगंधित और अत्यंत स्वादिष्ट प्रसाद खाकर वे फ़िरंगी अभिभूत हो उठे।फिर वे सब मुखिया के साथ साथ वापस लौटने लगे।जान साहब ने पूछा" यह टुम सब क्या करता?" मुखिया ने साथ चल रहे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए हंसते हुए कहा "यह देवी मां शक्ति का मंदिर है। हमलोग प्रत्येक शुक्रवार को इनकी आराधना करतें हैं। इनकी कृपा से हम सब गांववाले प्रसन्न और खुशहाल हैं।" जान साहब बोला "ओह आइ सी! टुम सब देवी मां की पूजा करटा है।" मुखिया-"हां" और फिर मुखिया ने रास्ते में खड़े माला तिलक लगाए,गेरूवा वस्त्र पहने चोटीधारी व्यक्ति की ओर इशारा करके, जो उन्हीं की ओर अजीब सी भेदती नजरों से देख रहा था, कहा"यह हैं मंदिर के पुजारी श्री थांगल।हमारे गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति। "उस व्यक्ति की ओर और उसकी दमकती आंखों को देखकर डान साहब को झुरझुरी और रोमांच हो आया। पुजारी उनसे कुछ नहीं बोला।मुखिया ने आगे बढ़कर उसका चरण स्पर्श किया तो वह उसे आशीर्वाद देकर तेजी से मंदिर की ओर चला गया। मुखिया अपने कुछ आदमियों जो लाठी, तलवार व भालों से लैस थे और डान साहब के साथ वापस गांव में अपने घर की ओर चला। डान साहब भी मुखिया से विदा लेकर अपने डेरे की ओर कूच किया। 
डेरे पर पहुंचा तो वहां अंग्रेजों का एक दल और आया था। उसमें डान साहब की गोरी बीबी और कुछ उच्च अधिकारी थे जो उच्च पादरी का संदेश लाए थे। संदेश में डान साहब की ड्यूटी अर्थात गांव वालों का ईसाई में धर्मांतरण के बारे में निर्देश और प्रगति के बारे मे पूछा गया था और उसे खूब खरी खोटी सुनाई गई थी। उसको पहले के कई अभियानों में मिली असफ़लता और उसके द्वारा ब्रिटिश सरकार के फूंके गए अपार धन के बारे में चेतावनी देते हुए कहा गया था कि अगर अबकी बार वह असफल होता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संदेश में बताया गया था कि यह काम अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस गांव के बाद उसे आस पास के सब गांवों का जल्द से जल्द धर्मांतरण करना है। इसके लिए चाहे जो करना पड़े और जो भी रुकावट हो उसे हटा दे।संदेश पढ़कर डान साहब पसीने पसीने हो उठा।उसने पादरी को भी संदेश पढ़ने को दिया। पादरी भी परेशान हो गया। 
यह दल इंफाल से ब्रिटिश प्रशासन और इंफाल के मुख्य चर्च की ओर से आया था। अब तक सुबह के 10 -11 बज चुके थे और सुनहरी धूप हर तरफ फैल रही थी। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट को चूमते लिपटाते अपने निजी टेंट में जाते हुए पादरी से बोला"आज शाम को हम मुखिया से बाट करेगा।पूरी तैयारी से चलना।"
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मणिपुर का नाम यों ही मणिपुर नहीं रखा गया था। यह प्रदेश अत्यंत हरा भरा, सुंदर और मनोरम है। यहाँ चार बेहद सुंदर डेल्टा हैं। और भी तमाम झरने, घाटियों व हरीतिमा से यह प्रदेश विभूषित है। अंग्रेज़ों की टोली यहाँ पर जैसे स्वर्ग में आ गई हो और वे पार्टी करने में व्यस्त हो गए। कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। पादरी तैयार होकर अपने साथ दो सुंदर गोरियों को भी ले चला जो नन थीं। उसे देखकर डान साहब ने पार्टी रोक दिया और तत्काल तैयार होकर अपनी गोरी बीबी मार्ग्रेट के साथ बग्घी गाड़ी में चल दिया। साथ में दो चार पैदल सैनिक और दो घुड़सवार भी थे। पादरी अलग घोड़े पर सवार था और दोनों नन भी एक अलग बग्घी में थीं। गोरों का काफिला पतले रास्ते पर घने जंगल जैसे बगीचे से दौड़ता हुआ मुखिया के घर के सामने जाकर रुका। उस दिन वहां ढेर सारे लोग पुजारी थांगल के साथ आए थे। पुजारी मुखिया टेकेंद्रजीत से कुछ बात कर रहा था और गोरों को देखते ही मुखिया से विदा लेकर अपने लोगों के साथ चला गया। पुजारी को चरण स्पर्श कर विदा करने के बाद मुखिया गोरों की ओर मुड़ा। जान साहब अपने लाव लश्कर को लेकर मुखिया के घर के सामने द्वार पर बैठ गया।गांव वाले कुछ दूर होकर कौतूहल से इन्हें देख रहे थे। गांव की स्त्रियाँ गोरी मेमों को देखकर नाक भौं सिकोड़ रही थीं-कैसे कपड़े पहनती हैं, कितनी बेशर्म हैं,हमारे मुखिया जी से कैसे नयन मटक्का कर रही हैं इत्यादि। फिर डान साहब मुखिया से बात करने लगा। बातों बातों में उसने अपने धर्म और ईसा मसीह के बारें में बताया। उसने कहा अगर मुखिया अपने लोगों के साथ इसाई धर्म अपनाता है तो उसे बहुत सुविधाएं दी जाएंगी और यीशू उनके सारे पाप क्षमा कर देंगे। मुखिया क्रोध से आग बबूला हो गया पर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला- "पहली बात तो हमने क़ोई पाप नहीं किया है गोरा साहब। दूसरी आप के धर्म के बारें में हम कुछ जानते नहीं हैं। " डान साहब और पादरी को मुखिया से धर्म परिवर्तन की बात पर भड़क उठने की उम्मीद थी ।उन्हें किसी जिज्ञासु प्रश्न की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। इस प्रश्न ने डान साहब और पादरी का उत्साह बढ़ा दिया।उन्हें लगा कि उनका काम हो जाएगा। पादरी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा " हमारा धर्म बहुत अच्छा है और हमारे यीशू सबके पापों को क्षमा कर देते हैं। वह टुमारे पापों को भी क्षमा कर देंगे। " मुखिया -"तुम्हारे यीशु क्या कहते हैं? तुम्हारे धर्म की क्या शिक्षाएं हैं?" पादरी-" हमारा इसाई धर्म चीज शिक्षाएं हैं -झूठ मत बोलो। व्यभिचार मत करो। पाप मत करो। हिंसा मत करो। कोई तुमको एक थप्पड़ मारे तो उसे क्षमा कर दो और अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो। यीशु उसका ह्रदय परिवर्तन कर देंगे।" यह सब सुनकर मुखिया मन ही मन हंस पड़ा। और उसने उनकी शिक्षाओं को तत्काल परखने का निर्णय लिया। " तो हमारे पुजारी जी की शंका सही थी। तुम्हारा यहां आने का प्रमुख उद्देश्य हमारा धर्म भ्रष्ट करना है। " मुखिया ने क्रोध से डान साहब और पादरी को देखते हुए कहा। पादरी और डान साहब को काटो तो जैसे खून ही नहीं। वे मुखिया की इस बात पर चौंक गए। डान साहब और पादरी ने सफाई देते हुए कुछ कहना चाहा पर मुखिया ने उन्हें झिड़क दिया और पादरी के गाल पर एक चाटा मार दिया। इस पर डान साहब आग बबूला हो गया और पादरी पहलें तो सन्न रह गया फिर तुरंत ही संभल कर वह भी क्रोध से जलने लगा। डान साहब ने अपनी पिस्तौल निकालने के लिए कोट मे हाथ डाला पर मार्ग्रेट ने उसे पकड़ कर अपने आस पास देखने का इशारा किया तो उसने चारो तरफ देखा और स्थिति को भांप कर मीठी चुपड़ी बातें करने लगा। क्योंकि चारो तरफ से मुखिया के आदमियों ने भाला, तलवार ,धनुष ,छुरियों इत्यादि से सभी अंग्रेजों को घेर रखा था और वे संख्या में उनसे ज्यादा थे।पादरी भी क्रोध मे आकर जोर जोर से कह रहा था -"टुम पापी आदमी ,टुम अपने पापों का दंड भुगतोगे। हम टुमको क्षमा करता है। "हालाँकि उसके हाव भाव से लग रहा था कि वह मुखिया से अपने थप्पड़ का बदला लेना चाहता है, पर डान साहब की तरह वह भी विवश था। डान साहब और पादरी के तमाम तरह से बहुत प्रयास करने के बाद भी उनकी एक नहीं चली। फिर थक हार कर वे लौट गए।रात होने लगी थी,अंधेरा छा रहा था और आज शांत शीतल हवा वातावरण को कुछ मनहूस व भयावना बना रही थी। यह मनहूसियत डान साहब और पादरी के अंदर से निकलकर वातावरण में छा रही थी। अपने डेरे पर पहुंचकर डान साहब और पादरी क्रोध से सब कुछ इधर उधर फेंक रहे थे। इससे पहले यही शीतल हवा वातावरण को अद्भुत मादकता से भर देती थी पर आज कुछ अलग ही बात थी।अंधेरे में डूबते वृक्ष और लता झुरमुट जैसे खामोशी से होनेवाली किसी दुर्घटना की पूर्वसूचना दे रहे थे। सियार और कुत्तों के रोने की आवाजों से वातावरण और भयावना हो रहा था। झरने की कल कल की आवाज और रात्रिचर पक्षियों की आवाजें तथा फड़फड़ाहट वातावरण को कुछ अजीब सा भयानक बना रही थीं। प्रकृति यह सब संकेत अनायास ही नहीं दे रही थी। अंग्रेजों के खेमें में लालटेनों और गैस की रोशनी में डान साहब, पादरी और डान की बीबी तथा आए हुए उच्चाधिकारी कुछ चर्चा कर रहे थे। डान साहब बेहद परेशान था,पादरी भी चिंतित था।आए हुए दल के उच्चाधिकारी डान साहब को धमका रहे थे और उसकी नाकामयाबियों पर कोस रहे थे। फिर उच्चाधिकारी दल घोड़े बग्घियों मे सवार होकर वापस चल दिया। साथ में कुछ सैनिक भी थे। डान साहब की बीबी मार्ग्रेट ने डान साहब के साथ कैंप पर ही रुकने का फ़ैसला किया।उच्चाधिकारियों के दल के जाने के बाद चिंतित और परेशान डान साहब व पादरी कुछ चर्चा करने लगे। काफी देर विचारविमर्श करके उन्होंने यह जान लिया कि गांव वाले अपने पुजारी और देवी मां शक्ति के कारण ही इसाई नही बन रहे हैं। फिर उन्होंने कुटिल योजना बनाई और अपने अपने टेंटों मे सोने चले गए। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट के पास अपने निजी टेंट में चला गया। डान साहब का टेंट बाकी के चार टेंटों के बीच में बना था।
अगले दिन सुबह डान साहब पादरी और अपनी बीबी को लेकर गांव में घुमने निकले।उन्होंने देखा कि गांव के लोग प्रातः उठकर अपने खेतों में काम करने जाते हैं। कुछ लोग अपने गाय ,भैंस आदि पशुओं को चराने ले जाते हैं। अंग्रेजों के टेंटों के आसपास भी कुछ लोग जानवर चराने आए थे। गांव में घर बांस,घास फूस व मिट्टी खपरैल आदि से बने थे लेकिन देवी मां का मंदिर पत्थरों को काटकर और पत्थरों से बहुत अच्छे ढंग से बना था।डान साहब और पादरी कोइसपर बहुत आश्चर्य हुआ। अपनी बीबी और पादरी के साथ डान साहब दिन भर गांव की गलियों, पतले रास्तों ,कुटीर उद्योग कर्मियों के घरों के आस पास और खेतों की मेड़ों पर दिन भर घूमता रहा। इस तरह शाम तक अपनी योजनाओं के लिए जानकारी लेकर वे सब टेंट पर वापस आ गए। दिन भर गांव में घूमते समय पादरी और डान साहब ने अपने पिछली रात के कुटिल विचार को योजनाबद्ध कर लिया था। योजना के लिए डान साहब ने और सैनिकों की मांग पिछली रात को वापस जाने वाले दल से पहले ही कर लिया था। दल में डान साहब और पादरी ने खा पीकर सबको तैयार रहने को कह रखा था। डान साहब की पत्नी कुछ भयभीत और सशंकित लग रही थी। पर डान साहब ने उसे समझा बुझाकर सोने को भेज दिया। रात के दस बजते-बजते लगभग 100 सैनिक एक जीप और कुछ घुड़सवारों के साथ डेरे पर आ गए।सब लोग चुपचाप खाने पीने और आराम करने में लग गए।
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रात को 12 बजे के करीब डान साहब अपने साथ 100 सैनिकों को लेकर पादरी के साथ डेरे से बाहर निकला। मार्ग्रेट ने डान साहब को मंदिर से छेड़छाड़ करने से मना किया पर उसने उसे टेंट में आराम करने को कहा और बाकी के लगभग 30 सैनिकों को वहाँ छोडकर चल दिया। सबके हाथों में बंदूकें, तलवारें और बत्तियां (टार्च) थीं। अंधेरी रात थी।ठंडी हवा से सिहरन और रोमांच हो रहा था। सब टार्च की रोशनी मे चुपचाप चलते हुए गांव के बाहर से मंदिर की तरफ बढ़े।डान साहब और पादरी ने दिन मे ही भ्रमण के दौरान यह मार्ग देखा था जो गांव के बाहर बाहर झरने और पहाड़ीके बीच पतले रास्ते के रूप में मंदिर तक जाता था। इस रास्ते से वे सब गांव वालों से बचकर चुपचाप बेहद सतर्कता और तेजी से आखे जा रहे थे। लगभग 30 मिनट चलनेके बाद वे सब मंदिर के बगल मे पहुंच गए। वह रास्ता मंदिर के पीछे से निकलकर बगल से होते हुए मंदिर के सामने नीचे मैदान में उतरता था।जहाँ दिन मे उन्होंने गांव वालों का धार्मिक उत्सव देखा था। वे सब अब मंदिर के बगल में ऊंचाई पर खड़े थे। बगल में एक ओर पहाड़ी और दूसरी ओर मंदिर के पीछे नदी के बीच में यह पतला रास्ता था। नदी झरने से होकर रास्ते के साथ साथ मंदिर के पीछे आकर दूसरी ओर चली जाती थी। डान साहब के इशारे पर सब चुपचाप नीचे उतरने लगे।उतरने वाला रास्ता ऊबड़ खाबड़ और पथरीला था।आधे सैनिक (50) नीचे उतर गए और आधे ऊपर रह गए। डान साहब उन लोगों के साथ नीचे उतरा और सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के मुख्य दरवाजे पर जा पहुंचा। वहाँ पहुँच कर उसे कुछ अलौकिक अहसास हुआ और जी में श्रद्धा से सिर झुकाने का विचार आया। पर उसे आज यह करना ही था। अन्यथा उसके उच्चाधिकारी उसकी अच्छी खबर लेंगे और हो सकता है नौकरी से भी निकाल दें। अतः उसने अपने दिमाग और ह्दय को झटककर, मजबूत करके मंदिर के दरवाजे को खटखटाया। कई बार खटखटाने पर पुजारी थांगल की आवाज आयी-"कौन है? " "मैं हूँ! डान साहब।" डान साहब ने कहा। पुजारी ने दरवाजा खोला और क्या बात है? पर डान साहब कुछ नहीं बोला। उसकी आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था ।उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए प्रवेश कर गया। असावधान थांगल लड़खड़ाते हुए गेट से बाहर सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ नीचे जा गिरा और डान साहब को रोकने को कुछ कहकर बेहोश हो गया। तबतक पादरी भी सीढियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश कर गया। उसने टार्च की रोशनी में डान साहब को मंदिर में दौड़ते देखा। डान साहब अपने टार्च की रोशनी में चलते हुए मंदिर में एकदम अंदर चला गया। मंदिर बहुत भव्य और सुंदर था। डान साहब चलते चलते देवी मां की मूर्ति के सामने जा पहुंचा।.............................................. (सशेष)

पानी के लोग भाग 1 संसार का अंत

संसार का अंत परमाणु हथियारों या किसी परग्रही अंतरिक्षीय आपदा से नहीं बल्कि जनसंख्या विस्फोट से होगा ।- महान शुक्ला ।
एक शहर था वह पानी पर बसा था।
भारत सन 3033 ईस्वी ।
देश की जनसंख्या बेतहाशा बढ़ते हुए विस्फोटक हो गयी थी और देश की भरण पोषण की क्षमता से बाहर जा चुकी थी ।लोगों को रहने खाने और अन्य मलूभूत सुविधाओं का अकाल पड़ना शुरू हो गया था ।लोगों को पीने का पानी और खाने को भोजन मिलना कठिन हो गया। जनसंख्या बढ़ने से रहने के लिए और खेती योग्य जमीन की भी कमी पड़ने लगी ।धीरे-धीरे लोगों के रहने-खाने की स्थिति इतनी भयावह हो गई कि आपस मे मार काट मचने लगी। धर्म और संस्कृति का गुरू कहे जाने वाले देश में लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए एक दूसरे पर हमला करने लगे और जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिए एक दूसरे को मारने लगे। देश के कई भागों मे तो लोग भूख प्यास से व्याकुल होकर एक दूसरे को मार कर खाने लग गए थे। आज देश के नीति नियंता और बुद्धिजीवी लोग अपना सिर धुनते थे कि हमने समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस प्रयास क्यों नहीं किया? जनसंख्या तेज़ी से बढ़ते रहने से सरकार द्वारा किए जा रहे सारे प्रयास ,कल्याणकारी योजनाएँ ,सारी व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ सफल ही नहीं हो पाती थीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि सब लोगों तक सरकारी योजनाएँ पहुँचतीं ।अगर पाँच सौ लोगों के लिए कोई योजना बनती तो जब तक वह योजना धरातल पर उतरती तब तक लोगों की संख्या पाँच हज़ार हो चुकी होती ।इस तरह सदैव देश मे लोगों को मूलभूत सुविधाओं का अकाल पड़ा रहता। कुछ धर्म विशेष के लोग अपनी कुत्सित योजनाओं की पूर्ति के लिए जनसंख्या बढ़ाने मे लगे थे। धीरे धीरे देश में जनसंख्या अत्यधिक हो गई और हर चीज़ का अकाल हो गया।सारी व्यवस्था चरमरा गई।हर तरफ़ अराजकता फैल गई। पुलिस ,प्रशासन ,रेल,शिक्षा,चिकित्सा ,आवास ,भोजन ,पानी हर व्यवस्था जनसंख्या अत्यधिक होने के कारण और संसाधनों की कमी होने के कारण लोगों को मिलनी बंद हो गई,धराशायी हो गई।
आज मैं भी उसी जनसंख्या के अभिशाप से बचता भागता फिर रहा हूँ।मैंने देश के दक्षिणी तट पर कुछ प्रयोगों और संरक्षण द्वारा थोड़े से फल और सब्ज़ियों को उगाने मे सफलता प्राप्त किया था।यह मुख्य जनसंख्या से कटा हुआ एक गाँव था जो अब उजड़ चुका था।लोग इस गाँव को छोड़कर पानी और अन्य आवश्यकताओं के लिए अन्यत्र जा चुके थे।लोग बड़े बड़े शहरों और पाश कालोनियाँ मे मंहगी शानदार इमारतों को छोड़कर यहाँ वहाँ भटकने लगे थे और खानाबदोशों से भी बदतर एक दूसरे को मारते,लूटते हुए यहाँ वहाँ भटकते रहते थे।खाने के नाम पर किसी भी वनस्पति,अनाज या जीव जंतु और कमजोर मनुष्यों को खोजते हुए,एक बूँद पीने योग्य पानी के लिए । सारी सभ्यता,विकास उपहास जैसे लगते थे,इतिहास की बात हो गए थे ।आज उन बातों पर यक़ीन करना असंभव हो गया था। लोग कल्पना मे भी नहीं सोच पाते थे कि पहले कभी लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी घरों की टोंटियों और नलों मे आता था। लोग जी भरकर नहाते थे और शावर लेते थे। नदियों और तालाबों मे कभी पानी भरा रहता था यह आज कोई सोच भी नहीं सकता था।आज की लगभग सब नदियां सूख चुकी थीं। जो एक दो बची थीं उनका पानी पीने लायक़ नहीं था और उसके लिए लोगों मे मार काट मची थी लेकिन वह अब सरकार के नियंत्रण में थीं । कोई भी नदियों तक जाकर पानी छू भी नहीं सकता था ,उसे गोली मार दिया जाता था।सरकार और व्यवस्था बचे खुचे जलस्रोतों को अपने नियंत्रण मे लेकर जीवन को बचाने के लिए योजनाएँ बना रही थी।समुद्र था लेकिन एक तो उसका पानी नमकीन और सीधे पीने योग्य नहीं था दूसरे समुद्र मे जब तब भयंकर लहरें और तूफ़ान आते रहते थे। समुद्र से उठने वाले चक्रवाती तूफ़ानों के चलते लोग समुद्र तटों को छोड़कर भाग चुके थे। कुछ अफ़वाह थी कि समुद्र से उड़न तस्तरी या नौका निकलती है जो मैदानी क्षेत्रों मे उड़कर आती है और भयंकर चक्रवात आता है। फिर सब कुछ नष्ट हो जाता है और वहाँ की मिट्टी भी ग़ायब हो जाती है जैसे पूरे गाँव या क्षेत्र की मिट्टी खोदकर कोई उठा ले गया हो। मिट्टी तो ग़ायब हो रही थी और तूफ़ान समुद्र से चक्रवात की तरह उठता था लेकिन कोई भी ,समुद्र से उड़न तस्तरी निकलने या उड़ती नौका निकलकर मैदान मे चक्रवात फैलाने और तूफ़ान या तड़ित अथवा आग बरसाने की बात को वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध नहीं कर पाया था।यह सुनी सुनाई अफ़वाह ही थी लेकिन यह बात सही थी कि इधर कुछ सालों मे समुद्र के किनारे भी जो गया वह फिर जीवित नहीं देखा गया।बहुतों की तो लाशें ही नहीं मिली लेकिन कई लोग तट पर मृत पाए गए। यह भी सच था कि जगह जगह पर चक्रवाती तूफ़ान आते थे और उनके जाने के बाद वहाँ की मिट्टी ग़ायब हो जाती थी ,सब कुछ नष्ट हो जाता था और सब लोग मारे जाते थे। कुछ जगहों पर तूफान के दौरान आसमान से आग और अत्यधिक तड़ित आघात भी होते थे। इस तरह समुद्र के आतंक से भयभीत होकर लोग समुद्र के तटवर्ती इलाक़े छोड़कर मैदानों की ओर पलायन कर रहे थे। जिससे समुद्र किनारे के इलाक़े ,तटवर्ती क्षेत्र ,बंदरगाह ,शहर सब निर्जन और वीरान हो गए थे।समुद्र में नौका लेकर उतरना भी मौत को दावत देना था ।अब तो कभी-कभी सुरक्षा और लाव-लश्कर के साथ सरकार के लोग ही जहाज़ से समुद्र में उतरते थे। बाक़ी आम जन पूरी तरह से समुद्र से दूर भाग गए थे भयभीत होकर।वे सरकारी जहाज़ भी हमेशा दुर्घटना से सुरक्षित नहीं रहते थे। मछली पकड़ना और नौकायन तो अब कोई नहीं करता था। समुद्र मे या समुद्र के किनारे जाना आत्महत्या करने जैसा हो गया था।
इन्हीं सब घटनाओं के चलते समुद्र का यह तटवर्ती क्षेत्र वीरान हो गया था। मै यहीं पर लौकी, कद्दू, आलू, टमाटर जैसी सब्जियों को उगाने मे सफल रहा था। पठार की उंचाई पर पतली दरार मे मै पानी की कुछ स्वच्छ बूँदें खोज पाने मे सफल हो गया था। जिसके संरक्षण के बलबूते पर मैने वहां जीवन यापन करने के लिए भोजन पानी की व्यवस्था कर लिया था। अब मै लोगों के हिंसात्मक कोलाहल से दूर चुपचाप शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। पर समुद्री आपदा के दुःस्वप्न और आशंकाएं कभी-कभी भयभीत कर देती थीं। लेकिन मै यह सोचकर संतोष कर लेता था कि वह आपदा उन चलते फिरते, एक दूसरे को खाते मारते नर पिशाचों की भीड़ से ज्यादा खतरनाक नहीं होगी। फिर भी मै दोनों तरफ से आंखें मूंदकर निश्चिंत नहीं हो सकता था और धीरे-धीरे कुछ हथियारों, गाड़ियों और नौका की व्यवस्था कर लिया था। गाड़ियों को लोग यों ही छोड़कर भाग रहे थे। कुछ लोगों ने कुछ दिन लोभ वश अपनी गाड़ियां और बंगले संभालने चाहे लेकिन या तो वे भूख प्यास से व्याकुल भीड़ द्वारा मारे गए और उनका सबकुछ लूटपाट कर तोड़ फोड़ दिया गया या फिर वे स्वयं भूख प्यास से व्याकुल होकर भोजन पानी की तलाश में सब कुछ छोड़ भागे। इस तरह मै आराम से ऐसी कई गाड़ियाँ प्राप्त करने मे सफल हो गया।
लेकिन एक दिन मेरी निगाह कुछ लोगों पर पड़ी जो किसी को खा रहे थे। इंसानी मांस उनकी भूख मिटा रहा था और खून प्यास। वे छह लोग थे। मैने देखा कि वह अभागा कोई युवक था, उसका बालों युक्त सिर वहीं पड़ा था। मै कुछ ईंधन और हथियारों की खोज कर रहा था कि गलियारे से निकलते ही मुख्य सड़क पर मुझे यह भयंकर दृश्य दिखाई पड़ा। मैंने छुपकर उनसे बचने का प्रयास किया। मुझे लगा कि उन्होंने मुझे नहीं देखा है और मै तेजी से वापस मुड़कर अपने आवास की ओर बढ़ने लगा। लेकिन कुछ दूर चलने पर मैने मुड़कर पीछे देखा तो वे मेरे पीछे थे। सचमुच भूख प्यास ने मनुष्य को हैवान बना दिया था। वे चेहरे, हाथों पर खून लपेटे, होठों से रक्त मिश्रित लार टपकाते मेरे पीछे थे। भयंकर आवाजें कर रहे थे। लगता था कि भूख प्यास ने उनकी सभ्यता के सारे चिंह मिटा दिए थे, सभ्यता की सारी उपलब्धियों को छीन लिया था और वे इंसानों की तरह बोलने के बजाय भयानक आवाजें निकाल रहे थे। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओ से वंचित समस्त जनसंख्या का यही हाल था और जो मैने अभी उस सड़क पर चौराहे के पास देखा था वह पूरे देश की स्थिति का वर्णन था। अब वे नरपिशाच बन चुके लोग मुझे खाना चाहते थे और मुझे उनसे बचना था। मैने रूककर उन पर फायर किया। तीन गोलियां चलाकर तीन को मार गिराया और फिर तेजी से भागने लगा क्योंकि तीन लोगों के मरने से भी बाकियों की गति पर कोई भी अंतर नहीं पड़ा था और न ही उनमे भय का कोई चिंह था। मैने उनसे दूरी बढ़ाने के लिए अपनी गति तेज कर दिया और मुझे यह भी ख्याल रखना था कि वे मेरा निवास स्थान न देख सकें। मै एक पतली गली में घुस कर कुछ देर के लिए उनकी नजरों से ओझल हो गया और जब तक वे गली में आते मैं एक घर की खुली टूटी खिड़की मे कूद गया और अच्छी तरह छिपकर उनकी टोह लेने लगा। वे बचे हुए तीन पिशाच अंदर गली के मुहाने पर दिखाई पड़े तब तक किसी गाड़ी की आवाज आने लगी। वे उस आवाज से बेखबर गली में चल रहे थे कि एक सैनिक गाड़ी गली के मुहाने पर रुकी और उससे तीन फायर हुए। तीन लपटें निकलीं और उन तीनों पिशाचों को छू गईं। तत्काल तीनों मरकर गिर गए। अब गाड़ी से तीन ‘ऊपर से नीचे तक सैनिक वर्दी में ढके’ लोग निकले और राइफल जैसे हथियारों को तानते हुए सावधानी पूर्वक उन तीन मृत पिशाचों के पास आए। पैरों से उन्हें हिला डुला कर देखा। फिर कुछ इशारा किया तो गाड़ी से सफेद वस्त्रों मे कोई उतरा। हाथों में छोटा बक्सा और इंजेक्शन लेकर वह तेजी से उनके बीच आया और उन मृत पिशाचों पर झुक गया। मै देख नहीं सका कि उसने क्या किया। सारे सैनिक सावधानी पूर्वक झुककर उसे देख रहे थे। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। फिर वह सफेद वस्त्र वाला उठा और बोला - "इनमे संक्रमण फैल चुका है। इस पूरे इलाके के लोग संक्रमण का शिकार हो चुके लगते हैं। यह बहुत बड़े संकट की बात है।" फिर वे लोग वापस जाने के लिए मुड़े और कुछ बात करते हुए गाड़ी की ओर चल दिए। मुड़ते समय उस सफेद कपड़े वाले का चेहरा मैंने देखा वह सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन वैज्ञानिक डाक्टर शयनांक था। बेहद प्रतिभाशाली, महत्वाकांक्षी और खतरनाक व्यक्ति। शासन मे भी उसकी अच्छी ताकतपूर्ण स्थिति थी। बाकी सब सैनिकों के शरीर के साथ साथ चेहरे भी ढके थे। डाक्टर को मैने सरकार के लिए काम करते समय एक दो बार देखा था और समाचार पत्रों, चैनलों मे तथा इधर उधर लोगों की कानाफूसियों मे उसके बारे में पढ़ा, देखा व सुना था। अब सबकुछ खतरनाक होता जा रहा था। मैने उन्हें लोगों के किसी संक्रमण से ग्रस्त होने की बात करते सुना था और यह भी कहते हुए सुना था कि यह बेहद खतरनाक बात है। मै सशंकित होता हुआ तेजी से खिड़की से निकल कर भागा और आगे पीछे देखते हुए सावधानी पूर्वक दौड़ता हुआ अपने आवास पर पहुंच गया।

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रात का समय था। मै अपने इस निर्जन स्वर्ग में एकाकी जीवन व्यतीत करता हुआ ऊब रहा था। उस दिन संक्रमण के शिकार नरपिशाचों की घटना को एक सप्ताह बीत चुका था। चांदनी रात में मै चुपचाप ऊंघ रहा था। उजड़ा वीरान वातावरण चंद्रमा की रोशनी में नहाया हुआ भयंकर दिख रहा था। मुझे अब एहसास हुआ कि चंद्रमा की ज्योत्सना भी पशु पक्षियों, पेड़ पौधों, झरने नदी तालाबों को आलोकित करती हुई ही सुंदर लगती है। सुंदर वस्तुओं पर पड़कर उन्हें और मनमोहक सौंदर्य से भिगो देती है लेकिन भयंकर और कुरूप वस्तुओं की भयंकरता और कुरूपता को ही बढ़ाती है। मै अपने उधेड़बुन मे खोया हुआ था कि "आ गर्र" की आवाज सुनकर चौंक पड़ा। तत्काल भागकर अपना हथियार उठाया और गाड़ियों की स्थिति जांचा। मेरा अनुमान सही था। मुझपर उन रक्तपायियों ने हमला किया था। आख़िर कब तक मैं उन घूमते नरपिशाचों की नज़रों से या सरकार से बचा रह सकता था और उस दिन सड़क पर जो कुछ हुआ था उससे मैं ज्यादा ही सशंकित रहने लगा था कि ऐसा कभी भी हो सकता है या कभी भी समुद्र का कहर मुझपर टूट सकता है, मै समुद्र के बेहद करीब तटवर्ती क्षेत्र में था। इसलिए मै सदैव भागने के लिए गाड़ियों का काफिला पानी और उपयोगी खाद्य वनस्पतियों सहित तथा गाड़ी में ही ऊपर एक नौका बांधकर तैयार रखता था। भले ही समुद्र घातक था पर मैने उन पिशाचों या सरकार के हाथों कैद होने के बजाय भागने के लिए समुद्र को चुना था। शायद वहां बच सकूं, आखिर इतने दिनों तक तटवर्ती क्षेत्र में रहने के बावजूद मै अभी तक समुद्र से सुरक्षित था। मैंने ओट से उन पिशाचों पर फायर करना शुरू किया। पर वे बहुत सारे थे। मैने पेट्रोल बमों और ग्रेनेड से हमला करके बहुतों को जला दिया। फिर गोलियों से उन्हें भूनने लगा। लेकिन उनकी आवाज हर दिशा से आती लग रही थी। और फिर मैंने सामने दूसरी दिशा में फायरिंग और लपटें देखा। बिल्कुल वैसी ही लपटें जो उस दिन सड़क पर सरकारी वाहन से निकलते देखा था। अब मै भागने की तैयारी करने लगा। मै किसी भी हाल में सरकार की निगाह में नहीं आना चाहता था। सरकार भी पहले तो मुझे गिरफ्तार करेगी और फिर संक्रमण की जांच इत्यादि के बहाने भगवान ही जाने मेरा क्या हाल करेगी। साथ ही यह जगह और मेरा सबकुछ सरकारी नियंत्रण मे चला जाएगा या अधिकारियों का निवाला बन जाएगा। आज एक बार फिर मुझे मेरा स्वर्ग उजड़ता हुआ लग रहा था। मेरा छोटा सा स्वर्ग, जहाँ न कोई कानून था और न ही किसी दूसरे की दखलंदाजी। यह सब ऐसे ही था जैसे लगभग 2000 सालों पहले मेरे पूर्वजों को इस्लामिक आतंकवादियों और जेहादियों ने कश्मीर से 1990 मे भगाया था। हां मै एक कश्मीरी पंडित हूँ। अब तो कश्मीर कैसा है कहना कठिन है। क्योंकि मै लगभग 20 वर्षों से वहाँ नहीं गया। इन वर्षों में मैं इसी तरह यहां वहां भागता फिर रहा हूँ। बाद में मोदी, शाह और योगी जैसे राजनेताओं ने देश की तमाम समस्याओं के साथ कश्मीर समस्या हल करके कश्मीर को अपराधियों से मुक्त करके कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बसाया था। इस तरह कश्मीर दुबारा स्वर्ग बन गया था और वहाँ से सरकार को उत्पादन, निर्माण और पर्यटन से अपार राजस्व प्राप्त होने लगा था। आज फिर मुझे उसी तरह अपना यह छोटा मोटा स्वर्ग (आज की परिस्थितियों के लिए यह जगह स्वर्ग ही थी।) उजड़ता और छिनता महसूस हो रहा था। रक्तपायियों के कब्जे में आने के बाद तो कुछ भी बचने की उम्मीद करना व्यर्थ था। मैने जब देखा कि सरकारी वाहन आग उगलता हुआ काफी दूर चला गया तो मै अपनी आवश्यक वस्तुओं से भरी और एक दूसरे मे बंधी गाड़ियों के काफिले को लेकर समुद्र की ओर चल पड़ा। क्योंकि इतनी देर मे रक्तपायियों की भीड़ मेरे उस आवास तक पहुंच गयी थी। मैने सरकारी वाहन आकर्षित न हो इस लिए फायरिंग बंद कर दिया था जिसका लाभ उठाकर वे भूखे प्यासे या संक्रमित पिशाच बन चुके लोग मेरे आवास स्थल मे दाखिल हो गए और सबकुछ तहस नहस करने लगे थे। चांदनी में मैने देखा कि पानी और वनस्पतियों को देखते ही वे एकदम टूट पड़े और सबकुछ नष्ट करते हुए मारा-मारी करने लगे। मेरा 3 वाहनो का काफिला बढ़ने लगा लेकिन वे मेरे आवास मे उपलब्ध पानी और वनस्पतियों पर उलझे रहे। मैने फिर रुककर उनपर फायर करके उनको मारना शुरू किया। तभी ऊपर चट्टान से कूद कर एक भीमकाय आकृति आयी और उसने मुंह से नीला बैगनी धुंआ फूंककर आस पास के पिशाचों को मार दिया और खुद पानी व वनस्पतियों को खाने बरबाद करने लगा। पानी पीते ही वे सब मुंह ऊपर उठाकर ऐसी चैन की सांस ले रहे थे जैसे अमृत पा गए हों। मैने उस धुंए वाले पिशाच पर भी कई फायर किए लेकिन वह मरने या घायल होने की बजाय गुर्राकर मेरी तरफ घूमा, उसके मुंह से धुंआ निकल रहा था और जबड़े पर खून लगा था। उसने मुझपर धुंआ उगला तो मै बचाव करते हुए गाड़ी बढ़ाकर भागने लगा। शायद मेरा पिछला ट्रक उसके पानी की बौछार जैसे धुंए के चपेट में आ गया था लेकिन मै अंदाजा नहीं लगा सकता था और न ही मेरे पास रुककर देखने के लिए समय था कि उस ट्रक पर कोई दुष्प्रभाव या नुकसान हुआ था। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि यह क्या था और इसके धुंए की बौछार से किस तरह का नुकसान हो सकता था या हुआ था ? शायद यह उसी संक्रमण का शिकार था जिसके बारे में डाक्टर शयनांक बात कर रहा था। मैने अपने वाहनों को तेजी से भगाया क्योंकि वह पिशाच तेजी से आगे बढ़ रहा था और इन सब शोरगुल से आकर्षित होकर सरकारी वाहन फायर करता हुआ इधर ही आ रहा था। उस वाहन ने रोशनियों की बरसात करके सभी पिशाचों को समाप्त कर दिया और फिर मेरे वाहनों के काफिले के पीछे भागते धुंआ उगलते पिशाच का पीछा करते हुए मेरे पीछे आने लगा।

मेरे वाहनों के काफिले में सबसे आगे एक ट्रक था। जिसके ऊपर मैने नौका बांध रखी थी और पीछे पानी भरा एक टैंकर और फिर खाद्य पदार्थों और वनस्पतियों से भरा एक ट्रक था। वह अजीब आकृति दौड़ते हुए मेरे पिछले ट्रक के बेहद करीब आ गयी थी और जब मैने अगले मोड़ पर वाहनों को मोड़ा तो वह पिशाच उछलकर पिछले ट्रक पर चढ़ गया। अब मै तेजी से वाहन भगाते हुए उजड़ा शहर छोड़कर खुले समुद्री मैदान में आ गया था और मेरा वाहन बेहद तेजी से समुद्र की ओर बढ़ रहा था। सरकारी वाहन अब तक काफी तीव्र गति से बढ़ते हुए मेरे पिछले वाहन के बगल से होकर टैंकर के साथ चलते हुए उस पिशाच पर रोशनियों वाली फायरिंग कर रहा था। वह पिशाच कुछ देर तक बचते हुए ट्रक मे घुसने का प्रयास करता रहा लेकिन फिर सरकारी वाहन पर कूदा और उससे निकली रोशनियों की बरसात ने उसे नहला कर मार दिया। मैने देखा कि वह पिशाच सरकारी वाहन पर कूदने के लिए मेरे ट्रक से उछला और उसका शरीर फायरिंग की रोशनियों से मृत होकर हवा में ही धीरे धीरे तैरता हुआ सरकारी वाहन पर जा गिरा। उसने उछलते हुए सरकारी वाहन पर नीला बैगनी धुंआ उगला था।पानी की बौछार की तरह तेज गति से जाकर वह धुंआ सरकारी वाहन से टकराया था और वाहन का अगला हिस्सा पिघलने लगा था। वाहन क्षतिग्रस्त होकर उलट गया और आगे बैठे चार लोग चीखते हुए उतरकर भागे। वह मृत पिशाच उस पिघलते वाहन पर गिरकर शायद उन लोगो पर गिरा था। वाहन के उलटने से उन लोगों के सुरक्षित कपड़े फट गए थे और वे भी उस नीले धुंए मे नहाकर चीख रहे थे। उस धुंए के साथ उनका शरीर धुंआ बनकर उड़ रहा था। हाथ, चेहरा जो भी उस जहरीले धुंएं मे डूबा उनके शरीर के उस हिस्से का सारा मांस धुंए के साथ ही उड़ गया और वे चीखते हुए एंठकर मर गए। उनका अर्धकंकाल मे बदला शरीर अकड़ गया। मैंने यह सब देखकर अपने वाहन की गति और तेज कर दिया क्योंकि पकड़े जाने पर अब मै सरकार के निशाने पर आ सकता था। जिसपर उन पिशाचों को पालने का या समुद्र के आतंक से संबंधित होने का आरोप लगाकर कुछ भी किया जा सकता था। तब तक गाड़ी के पिछले हिस्से से टिड्डी दल की तरह निकलते सैनिकों ने उन मृत लोगों पर कोई पीला धुंआ छिड़कना शुरू कर दिया। मैने अनुमान लगाया कि यह उनको बचाने या निःसंक्रमित करने के लिए होगा। फिर उनमे से कुछ लोगों ने मेरे वाहनों पर फायर किया। जिससे मेरा पिछला ट्रक और टैंकर आग का गोला बन गए। पता नहीं किस तरह का फायर वे कर रहे थे। तब तक मेरा ट्रक समुद्र में घुसने लगा था। मैने ट्रक के छत पर पहुंच कर नौका को काटकर खोला और उसमे छुपकर बैठ गया। आग की लपटों सहित पिछले दोनों वाहनों के साथ मेरे तीनों वाहन पानी में घुसते जा रहे थे और मेरी नौका ट्रक से फिसलकर पानी में उतर गई थी। आग और धुंएं की आड़ में मै अपनी नौका तैराता हुआ उन वाहनों से काफी दूर बीच समुद्र में पहुंच गया। तभी जलता टैंकर फूटा और पानी तथा जलते वाहन के टुकड़े दूर तक उछले। फिर लगातार तीन धमाके और हुए। मैने देखा कि दूर किनारे पर वे सरकारी सैनिक खड़े होकर जलते डूबते वाहनों को देख रहे थे। धमाके के दबाव से उत्पन्न लहरें और हवा के थपेड़ों ने मेरी नौका डांवाडोल कर दिया था। चांदनी मे लहरों पर डगमगाती मेरी नौका मे बैठकर भी मै पानी में चंद्र ज्योत्स्ना के घुलते सौंदर्य पर मंत्रमुग्ध हो गया था। धरती पर अब ऐसा दृश्य अकल्पनीय हो गया था। मैने देखा कि किनारे से सैनिकों ने भी मुझे देखा और मुझपर फायर करने लगे। शायद वे टेलीस्कोप से देखकर फायर कर रहे थे क्योंकि बहुत दूर होने पर भी मैं उनके निशाने पर आ रहा था। वे मुझे अब बहुत छोटे दिख रहे थे लेकिन उन से निकलती रोशनी की लकीरें मुझे छूना चाहती थीं। तभी मुझे कुछ अजीब सा शोर सुनाई दिया और मैने देखा कि समुद्र के किनारे पानी बवंडर की तरह ऊपर उठ रहा था। फिर तेजी से तूफ़ान उठा। अब मै किनारे पर सैनिकों को देख नहीं सकता था लेकिन समझ सकता था कि उनके साथ क्या हो सकता है। फिर सभी सैनिक आसमान में पानी के बवंडर मे नाचते नजर आए। वे चीख रहे थे। उसके बाद पानी के बीच से कड़कती बिजली निकली और सभी सैनिक उसकी चपेट में आकर भुनने लगे। बिजली की कड़क मे उनकी चीखें गुम हो गईं और मेरे चारो तरफ उनके मृत शरीरों की बरसात होने लगी। मै भय से कांप रहा था। बवंडर का पानी तो कम होते हुए नीचे बैठ रहा था लेकिन मेरी नौका के चारो तरफ का पानी शायद उबल रहा था। उसमे उबाल आ रहा था, बुलबुले उठ रहे थे लेकिन भाप नहीं निकल रही थी। मेरी नौका उबलते बुलबुलेदार पानी में डांवाडोल हो रही थी और मै उसमे चारो ओर घूमता संतुलन बनाता हुआ भयभीत सा पानी में देख रहा था कि अब मेरा जाने क्या होगा। पानी गर्म तो नहीं है यह जानने के लिए मैने डरते डरते पानी को उंगली से छुआ। आश्चर्य जनक रूप से पानी ठंडा था पर मेरा हाथ पानी की लहरों में डूबा और मुझे लगा कि किसी ने मुझे पकड़ लिया है। पानी में मेरा हाथ खिंचने लगा और मै नौका मे जोर लगाकर उठने का प्रयास करने लगा। तभी तेज धमाके के साथ मेरी नौका कई टुकड़ों में टूट गई और मै पानी में औंधे मुंह जा गिरा। मुझे लगा कि कोई मेरा हाथ अभी भी पकड़े हुए है और मुझे खींचकर समुद्र के अंदर ले जा रहा है। कुछ देर बचने और छूटने के लिए संघर्ष के बाद मै बेहोश होने लगा और तभी मैने कुछ देखा। पर यह नहीं जान सका कि वह क्या है। फिर धीरे धीरे मै बेहोश हो गया। शायद यह मेरा अंत था, शायद मै मर रहा था। । मैने ईश्वर को मन ही मन प्रणाम किया और फिर मेरा मन निःचेतना के गहन अंधकार में डूब गया।