Wednesday, January 29, 2020

देवी भाग 1

डान साहब की आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था। उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए घुस गया। थांगल उसे रोकने के लिए कहता हुआ सीढ़ियों पर लड़खड़ाया और नीचे गिर कर बेहोश हो गया। मंदिर में डान साहब पागलों की तरह भटकता हुआ देवी की प्रतिमा के समक्ष पहुंचा। अष्टधातु की प्रतिमा अत्यंत सुंदर व दिव्य थी। डान साहब को लगा जैसे कोई उसे पकड़ कर उस प्रतिमा के समक्ष सिर झुकाने को विवश कर रहा है। लेकिन उसने आंख मूदकर जी कड़ा करके हाथ बढ़ाया और प्रतिमा को उठाकर बाहर भागा। अंधेरी रात में तत्काल घनघोर विद्युत कड़की और सभी अंग्रेज भय से जड़ हो गए।बिजली की चमक मे उन्होने आसमान में बहुत विशाल पक्षी को उड़ते देखा जिसकी आंखें आग जैसी दहक रही थीं और चोंच मे विशाल सांप को पकड़ रखा था। जिसकी फुसकार से पूरा वातावरण भयावना हो रहा था। सब डर गए। डान साहब तेजी से मंदिर के बाहर निकला और सबको वापस चलने का इशारा करते हुए भागा। सब मंदिर के साथ बनी ऊबड़ खाबड़ सीढ़ी जैसे रास्ते से अपने कैंप की ओर दौड़ पड़े। तेज हवा चलने लगी थी और कोई पक्षी बार बार अपने पंख फड़फड़ाते हुए उनके ऊपर आसमान में उड़ रहा था जो थोड़ी थोड़ी देर मे बार बार बहुत तेज आवाज में बोल रहा था। जिसके साथ ही विषधर सांप की भयंकर फुसफुसाहट गूंज रही थी। टार्च की रोशनी मे अंग्रेज भागते हुए अपने डेरे पर पहुंचे तो देखा कि उनके कई टेंट जल रहे हैं। सब आतंकित हो गए। डान साहब तेजी से अपने निजी टेंट की ओर लपका जिसमे उसकी बीबी मार्ग्रेट सो रही थी। अचानक मार्ग्रेट की तेज चीख गूंज उठी और टेंट के दरवाजे से वही विशाल पक्षी उड़ा, डान साहब भय से चीखकर गिर पड़ा।जलते टेंटों की आग की रोशनी में डान साहब ने देखा कि उस पक्षी ने अपनी चोंच मे एक सांप को पकड़ रखा था, जिसने ऊपर उठते हुए अपने फन से आग उगल कर डान साहब के टेंट में भी आग लगा दिया। तब कुछ अंग्रेजों ने उस पक्षी को निशाना साधते हुए गोली चला दिया। लेकिन उसपर कुछ असर नहीं हुआ और वैसे ही भयानक आवाज में शोरमचाता हुआ फुफकारते सांप को लेकर अंधेरे में उड़ गया। 
डान साहब तेजी से मार्ग्रेट को पुकारता हुआ टेंट में दाखिल हुआ। उसने देखा कि जलते टेंट में अभी भी आग मार्ग्रेट के बिस्तर तक नहीं पहुंची है और वह बेसुध सो रही है। देवी की मूर्ति को एक तरफ फेंककर डान साहब ने मार्ग्रेट को उठाया और जलते टेंट से बाहर ले आया। तबतक सारे टेंट जलकर खाक हो चुके थे। बाहर आते ही पादरी भी पास आ गया और डान साहब की बाहों में मार्ग्रेट को ध्यान से देखते हुए बोला '' उफ यह तो मर चुकी है '' '' नो। '' डान साहब चीखा और उसने ध्यान से मार्ग्रेट को देखा। उसका शरीर नीला पड़ गया था। सर्पदंश। कहीं उसी सांप ने तो नहीं जिसे पक्षी अपने चोंच मे पकड़कर उड़ रहा था और जिसने टेंटों में आग लगाया था। 
तबतक शोरगुल और गोलियों की आवाज से जागकर ग्रामीण भी मशालें लिए हुए अपने मुखिया टेकेंद्रजीत के नेतृत्व में लाठी, भाले, तलवार, धनुष आदि लिए हुए वहाँ आ पहुंचे। तब तक केवल कुछ जलते टेंटों के अवशेष ही रह गए थे जो धीमे धीमे बुझते हुए जल रहे थे। 
"क्या हो रहा है यहाँ? इतना शोरगुल और लड़ाई झगड़ा कैसा?" मुखिया टेकेंद्रजीत ने डान साहब को वहां उसकी बाहों में थमी निर्जीव मार्ग्रेट को घूरते हुए पूछा। "कुछ नहीं! टुम सब यहाँ से भाग जाओ।" डान साहब गुर्राया। इसपर मुखिया के साथ आए सभी ग्रामीण योद्धाओं ने अंग्रेजों पर अपने अपने तीर धनुष, भाले - तलवार आदि तान लिए। तब पादरी ने डान साहब को आंखों से इशारा करता हुआ उसे मार्ग्रेट को जीप में रखने को कहा और खुद ग्रामीणों से बोला" हमपर मुसीबट आया है। हमारे साहब की बीबी को सांप ने काट लिया है और हमारे सारे टेंट आग में जल गए।" तब तक सिर पर कपड़ा बांधे पुजारी थांगल भी वहां आ गया और आते ही चीखकर कहा "तुम फिरंगियों ने हमारी देवी की प्रतिमा को चुराया है और अब तुम पर देवी का कहर टूटा है। तुम सब मारे जाओगे। कोई नहीं बचेगा। "
यह सुनते ही गांव वाले और मुखिया क्रोध से कांपने लगे और मुखिया सब अंग्रेजों को मारने का आदेश देने ही वाला था कि पुजारी उसे रोकते हुए बोला" मुखिया जी! इन्हें मारने की जरुरत नहीं, ये सब देवी के प्रकोप से स्वतः मारे जाएंगे। बस इनसे हमें हमारी देवी की प्रतिमा वापस चाहिए और ये तत्काल यहाँ से भाग जाएं। अन्यथा हम इन्हें मार देंगे।" तब तक डान साहब मार्ग्रेट के मृत शरीर को जीप में रखकर वापस आ गया। वह बहुत दुखी था क्योंकि उसके दल मे कोई डाक्टर नहीं था और अब तक तो उसकी पत्नी निःसंदेह मर चुकी थी। उसने आंसुओं से भीगे हुए स्वर मे कहा" हमने गलट किया। हम टुम्हारा अपराधी है। हम टुम्हारा देवी को वापस दे देगा और यहाँ से हमेशा के लिए चला जाएगा। पर हम लड़ाई झगड़ा नहीं चाहता। हमारा बीबी मर गया। उसे सांप ने काट लिया है। उसने हमे यह सब करने से रोका था, पर हम नही माना।" और डान साहब रोने लगा। 
यह सुनकर पुजारी थांगल बोला" हमारी देवी मां शक्ति की प्रतिमा को वापस दे दो गोरे फिरंगी। तुम पर देवी का कहर शुरू हो गया है। पर हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हारी मेम को जीवित कर देंगे। लेकिन उसके तुरंत बाद तुम यहाँ से भाग जाओगे। "
पादरी ने गुस्से से विरोध में कुछ कहना चाहा तो डान साहब ने उसे रोक कर पुजारी थांगल से सहमति मे सिर झुकाकर बोला" जैसा टुम कहो पुजारी जी"
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ब्रिटिश भारत। मणिपुर के हरे भरे प्रदेश में बसा एक गांव विष्णुपुर। अंग्रेज़ों ने मणिपुर को कब्जे में कर लिया था और धीरे धीरे अपना प्रशासन आदि फैला रहे थे, व्यवस्थित कर रहे थे। अपना प्रशासन फैलाने के साथ ही साथ अंग्रेज अपनी समझ से तुच्छ व पिछड़े हुए मणिपुरी लोगों मे इसाई धर्म का प्रचार भी करने का प्रयास कर रहे थे। 
इसी सिलसिले में विष्णुपुर गांव में भी इसाई धर्म का प्रचार करने के लिए डान साहब अपने लाव लश्कर के साथ आया। उसकी टीम में कुछ बग्घी गाड़ियां, घोड़े - खच्चर, 20 - 30 सैनिक, कुछ औरतें और पादरी थे। वे सब पूरे गांव में घूमते घामते गांव के बाहर मैदान में नदी और झरने के सुंदर दृश्यों के बीच डेरा डाला। पूरा गांव उन्हें अचरज, घृणा और क्रोध से देख रहा था। कुछ देर बाद डान साहब के निर्देश पर पादरी अपने कुछ साथियों और गोरी औरतों के साथ गांव वालों से मिलने गया। जब उसने गांव वालों से बात करना चाहा तो लोग उसे हिकारत से देखकर भाग खड़े हुए। लोगों ने उसकी बातों मे उत्सुकता दिखाने के बजाय घृणा और भय प्रकट किया और उससे दूर भाग गए। पादरी "टुम हमसे बाट करेगा टो यीशू टुमारा पाप माफ कर देगा" कहता हुआ पूरा दिन गांव भर मे घूमता रहा पर उसकी दाल नहीं गली। हां कुछ मनचले लोग उसकी गोरी औरतों मे जरूर दिलचस्पी लेते दिख रहे थे पर जब पादरी या उसके साथ की गोरी औरतें उनकों पुकारतीं तो वे भाग जाते थे। सब उन्हें अजीब सी निगाहों से देख रहे थे। 
अंत में डान साहब ने पादरी की असफलता से परेशान होकर गांव के मुखिया टेकेंद्रजीत से बात करने का निश्चय किया। अपने साथ दो सैनिकों, रेडियो और अन्य आकर्षक वस्तुओं कपड़ों को लेकर डान साहब उसी दिन शाम को मुखिया के घर गया। घर परंपरागत तरीके से बांस इत्यादि से बना था और बेहद सुंदर था। गांव के सभी घर ऐसे ही बांसों और लकड़ियों इत्यादि से बने थे। मुखिया ने डान साहब का स्वागत करते हुए सम्मान से उसे बैठने को आसन दिया और खुद उसके सामने ऊंचे आसन पर बैठकर उससे बातचीत करने लगा। डान साहब ने मुखिया को रेडियो प्रदान किया और बोला "हम टुमारे लोगों की भलाई चाहता है। हम तुम लोंगों को अच्छी चीज़ें और सुविधाएं देगा।" उसकी बात सुनकर मुखिया के घर के और आस-पड़ोस के बच्चे जो कौतूहल वश वहां इकट्ठे हो गए थे, हंसने लगे। मुखिया टेकेंद्रजीत ने बच्चों को डाँटकर चुप कराया हालाँकि वह भी बमुश्किल अपनी हंसी रोक पा रहा था। पर संस्कारवश उसने अपनी हंसीं दबा ली। डान साहब ने मुखिया से कहा " टुमारा गांव बहुत सुंदर है।टुम हमारी बाट मानेगा टो हम टुम लोगों को बहुत अच्छी चीज़ें देगा और ऐसा कहकर जान साहब ने मुखिया के हाथ से रेडियो ले लिया जिसे वह बहुत आश्चर्य से उलट पलट कर देख रहा था। फिर डान साहब ने एक बटन घुमाया और कुछ खरखराहट के साथ रेडियो से आवाज आने लगी।सब लोग डरकर पीछे हट गए सिवाय मुखिया के जो अब और आश्चर्य से डान साहब के हाथ में थमे उस डब्बे को देख रहा था जो बोल रहा था।डान साहब ने कहा "डरो मट!यह रेडियो है।इसमें गाने समाचार आदि सुन सकटे हो।" और उसने कई स्टेशन बदलकर गानें तथा तमाम कार्यक्रम सुनाए। फिर वह बाक़ी तमाम आकर्षक वस्तुएं, खिलौने इत्यादि और रेडियो मुखिया को देकर और उपयोग करने का तरीका बताकर बाद में आने का वादा करके चला गया। तबतक अंधेरा घिरने लगा था। 
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अगले दिन डान साहब को पादरी ने प्रातः ही जगाया। डान साहब भुनभुनाते हुए उठा और बोला "क्या बाट है? टुम हमको सुबह सुबह क्यों डिस्टर्ब कर रहा है? जबाब मे पादरी ने अपने कानों पर हाथ लगाकर डान साहब को गांव से आती वाद्य यंत्रों की ध्वनि को सुनने का इशारा किया और अपने साथ आने को कहा। डान साहब पलभर मे तैयार होकर अपने दो सहयोगियों को लेकर पादरी के साथ ध्वनि संगीत की दिशा में चल पड़ा। संगीत की आवाज गांव से आ रही थी। गांव में पहुंच कर देखा कि हर एक घर से युवक, बच्चे व औरतें परंपरागत वेशभूषा में निकलकर पूजा का थाल व सामग्री लिए कहीं जा रहेथे। डान साहब ने चुपचाप सबको अपने पीछे आने का इशारा किया और उस समूह के पीछे पीछे जाने लगा। उनके पीछे चलते हुए डान साहब और पादरी गांव के पीछे काफी दूर एक पहाड़ी झुरमुट में बने प्राचीन मंदिर तक जा पहुंचे। सब गांव वासी मंदिर के बाहर मैदान में इकट्ठे हो गए और पूजा प्रारंभ हो गई। मंदिर के अंदर से पुजारी का कंठस्वर गूंज उठा। वह मंत्रोच्चार कर रहा था और कुछ लोग वाद्य यंत्र बजा रहे थे। लगभग घंटेभर मंत्रों और वाद्य यंत्रों की आवाज से वातावरण गूंजता रहा। डान साहब को भी कुछ अलौकिक सा एहसास हो रहा था पर पादरी के कारण उसने अपनी अकड़ बनाए रखा। फिर मुख्य पूजा कार्यक्रम समाप्त हो गया और जनसमुदाय नृत्य करने लगा।परंपरागत मणिपुरी नृत्य ने उस सुरम्य घाटों में अलौकिक छटा उपस्थित कर दी।यह सब देखकर डान साहब अभिभूत हो गया। अंत में प्रसाद वितरण किया गया और सब धीरे-धीरे वापस जाने लगे।तभी मुखिया ने दूर खड़े डान साहब और उसके साथियों को देखा तथा एक व्यक्ति को इशारा किया तो उसने डान साहब व उसके साथियों को भी प्रसाद दिया। दिव्य सुगंधित और अत्यंत स्वादिष्ट प्रसाद खाकर वे फ़िरंगी अभिभूत हो उठे।फिर वे सब मुखिया के साथ साथ वापस लौटने लगे।जान साहब ने पूछा" यह टुम सब क्या करता?" मुखिया ने साथ चल रहे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए हंसते हुए कहा "यह देवी मां शक्ति का मंदिर है। हमलोग प्रत्येक शुक्रवार को इनकी आराधना करतें हैं। इनकी कृपा से हम सब गांववाले प्रसन्न और खुशहाल हैं।" जान साहब बोला "ओह आइ सी! टुम सब देवी मां की पूजा करटा है।" मुखिया-"हां" और फिर मुखिया ने रास्ते में खड़े माला तिलक लगाए,गेरूवा वस्त्र पहने चोटीधारी व्यक्ति की ओर इशारा करके, जो उन्हीं की ओर अजीब सी भेदती नजरों से देख रहा था, कहा"यह हैं मंदिर के पुजारी श्री थांगल।हमारे गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति। "उस व्यक्ति की ओर और उसकी दमकती आंखों को देखकर डान साहब को झुरझुरी और रोमांच हो आया। पुजारी उनसे कुछ नहीं बोला।मुखिया ने आगे बढ़कर उसका चरण स्पर्श किया तो वह उसे आशीर्वाद देकर तेजी से मंदिर की ओर चला गया। मुखिया अपने कुछ आदमियों जो लाठी, तलवार व भालों से लैस थे और डान साहब के साथ वापस गांव में अपने घर की ओर चला। डान साहब भी मुखिया से विदा लेकर अपने डेरे की ओर कूच किया। 
डेरे पर पहुंचा तो वहां अंग्रेजों का एक दल और आया था। उसमें डान साहब की गोरी बीबी और कुछ उच्च अधिकारी थे जो उच्च पादरी का संदेश लाए थे। संदेश में डान साहब की ड्यूटी अर्थात गांव वालों का ईसाई में धर्मांतरण के बारे में निर्देश और प्रगति के बारे मे पूछा गया था और उसे खूब खरी खोटी सुनाई गई थी। उसको पहले के कई अभियानों में मिली असफ़लता और उसके द्वारा ब्रिटिश सरकार के फूंके गए अपार धन के बारे में चेतावनी देते हुए कहा गया था कि अगर अबकी बार वह असफल होता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संदेश में बताया गया था कि यह काम अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस गांव के बाद उसे आस पास के सब गांवों का जल्द से जल्द धर्मांतरण करना है। इसके लिए चाहे जो करना पड़े और जो भी रुकावट हो उसे हटा दे।संदेश पढ़कर डान साहब पसीने पसीने हो उठा।उसने पादरी को भी संदेश पढ़ने को दिया। पादरी भी परेशान हो गया। 
यह दल इंफाल से ब्रिटिश प्रशासन और इंफाल के मुख्य चर्च की ओर से आया था। अब तक सुबह के 10 -11 बज चुके थे और सुनहरी धूप हर तरफ फैल रही थी। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट को चूमते लिपटाते अपने निजी टेंट में जाते हुए पादरी से बोला"आज शाम को हम मुखिया से बाट करेगा।पूरी तैयारी से चलना।"
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मणिपुर का नाम यों ही मणिपुर नहीं रखा गया था। यह प्रदेश अत्यंत हरा भरा, सुंदर और मनोरम है। यहाँ चार बेहद सुंदर डेल्टा हैं। और भी तमाम झरने, घाटियों व हरीतिमा से यह प्रदेश विभूषित है। अंग्रेज़ों की टोली यहाँ पर जैसे स्वर्ग में आ गई हो और वे पार्टी करने में व्यस्त हो गए। कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। पादरी तैयार होकर अपने साथ दो सुंदर गोरियों को भी ले चला जो नन थीं। उसे देखकर डान साहब ने पार्टी रोक दिया और तत्काल तैयार होकर अपनी गोरी बीबी मार्ग्रेट के साथ बग्घी गाड़ी में चल दिया। साथ में दो चार पैदल सैनिक और दो घुड़सवार भी थे। पादरी अलग घोड़े पर सवार था और दोनों नन भी एक अलग बग्घी में थीं। गोरों का काफिला पतले रास्ते पर घने जंगल जैसे बगीचे से दौड़ता हुआ मुखिया के घर के सामने जाकर रुका। उस दिन वहां ढेर सारे लोग पुजारी थांगल के साथ आए थे। पुजारी मुखिया टेकेंद्रजीत से कुछ बात कर रहा था और गोरों को देखते ही मुखिया से विदा लेकर अपने लोगों के साथ चला गया। पुजारी को चरण स्पर्श कर विदा करने के बाद मुखिया गोरों की ओर मुड़ा। जान साहब अपने लाव लश्कर को लेकर मुखिया के घर के सामने द्वार पर बैठ गया।गांव वाले कुछ दूर होकर कौतूहल से इन्हें देख रहे थे। गांव की स्त्रियाँ गोरी मेमों को देखकर नाक भौं सिकोड़ रही थीं-कैसे कपड़े पहनती हैं, कितनी बेशर्म हैं,हमारे मुखिया जी से कैसे नयन मटक्का कर रही हैं इत्यादि। फिर डान साहब मुखिया से बात करने लगा। बातों बातों में उसने अपने धर्म और ईसा मसीह के बारें में बताया। उसने कहा अगर मुखिया अपने लोगों के साथ इसाई धर्म अपनाता है तो उसे बहुत सुविधाएं दी जाएंगी और यीशू उनके सारे पाप क्षमा कर देंगे। मुखिया क्रोध से आग बबूला हो गया पर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला- "पहली बात तो हमने क़ोई पाप नहीं किया है गोरा साहब। दूसरी आप के धर्म के बारें में हम कुछ जानते नहीं हैं। " डान साहब और पादरी को मुखिया से धर्म परिवर्तन की बात पर भड़क उठने की उम्मीद थी ।उन्हें किसी जिज्ञासु प्रश्न की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। इस प्रश्न ने डान साहब और पादरी का उत्साह बढ़ा दिया।उन्हें लगा कि उनका काम हो जाएगा। पादरी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा " हमारा धर्म बहुत अच्छा है और हमारे यीशू सबके पापों को क्षमा कर देते हैं। वह टुमारे पापों को भी क्षमा कर देंगे। " मुखिया -"तुम्हारे यीशु क्या कहते हैं? तुम्हारे धर्म की क्या शिक्षाएं हैं?" पादरी-" हमारा इसाई धर्म चीज शिक्षाएं हैं -झूठ मत बोलो। व्यभिचार मत करो। पाप मत करो। हिंसा मत करो। कोई तुमको एक थप्पड़ मारे तो उसे क्षमा कर दो और अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो। यीशु उसका ह्रदय परिवर्तन कर देंगे।" यह सब सुनकर मुखिया मन ही मन हंस पड़ा। और उसने उनकी शिक्षाओं को तत्काल परखने का निर्णय लिया। " तो हमारे पुजारी जी की शंका सही थी। तुम्हारा यहां आने का प्रमुख उद्देश्य हमारा धर्म भ्रष्ट करना है। " मुखिया ने क्रोध से डान साहब और पादरी को देखते हुए कहा। पादरी और डान साहब को काटो तो जैसे खून ही नहीं। वे मुखिया की इस बात पर चौंक गए। डान साहब और पादरी ने सफाई देते हुए कुछ कहना चाहा पर मुखिया ने उन्हें झिड़क दिया और पादरी के गाल पर एक चाटा मार दिया। इस पर डान साहब आग बबूला हो गया और पादरी पहलें तो सन्न रह गया फिर तुरंत ही संभल कर वह भी क्रोध से जलने लगा। डान साहब ने अपनी पिस्तौल निकालने के लिए कोट मे हाथ डाला पर मार्ग्रेट ने उसे पकड़ कर अपने आस पास देखने का इशारा किया तो उसने चारो तरफ देखा और स्थिति को भांप कर मीठी चुपड़ी बातें करने लगा। क्योंकि चारो तरफ से मुखिया के आदमियों ने भाला, तलवार ,धनुष ,छुरियों इत्यादि से सभी अंग्रेजों को घेर रखा था और वे संख्या में उनसे ज्यादा थे।पादरी भी क्रोध मे आकर जोर जोर से कह रहा था -"टुम पापी आदमी ,टुम अपने पापों का दंड भुगतोगे। हम टुमको क्षमा करता है। "हालाँकि उसके हाव भाव से लग रहा था कि वह मुखिया से अपने थप्पड़ का बदला लेना चाहता है, पर डान साहब की तरह वह भी विवश था। डान साहब और पादरी के तमाम तरह से बहुत प्रयास करने के बाद भी उनकी एक नहीं चली। फिर थक हार कर वे लौट गए।रात होने लगी थी,अंधेरा छा रहा था और आज शांत शीतल हवा वातावरण को कुछ मनहूस व भयावना बना रही थी। यह मनहूसियत डान साहब और पादरी के अंदर से निकलकर वातावरण में छा रही थी। अपने डेरे पर पहुंचकर डान साहब और पादरी क्रोध से सब कुछ इधर उधर फेंक रहे थे। इससे पहले यही शीतल हवा वातावरण को अद्भुत मादकता से भर देती थी पर आज कुछ अलग ही बात थी।अंधेरे में डूबते वृक्ष और लता झुरमुट जैसे खामोशी से होनेवाली किसी दुर्घटना की पूर्वसूचना दे रहे थे। सियार और कुत्तों के रोने की आवाजों से वातावरण और भयावना हो रहा था। झरने की कल कल की आवाज और रात्रिचर पक्षियों की आवाजें तथा फड़फड़ाहट वातावरण को कुछ अजीब सा भयानक बना रही थीं। प्रकृति यह सब संकेत अनायास ही नहीं दे रही थी। अंग्रेजों के खेमें में लालटेनों और गैस की रोशनी में डान साहब, पादरी और डान की बीबी तथा आए हुए उच्चाधिकारी कुछ चर्चा कर रहे थे। डान साहब बेहद परेशान था,पादरी भी चिंतित था।आए हुए दल के उच्चाधिकारी डान साहब को धमका रहे थे और उसकी नाकामयाबियों पर कोस रहे थे। फिर उच्चाधिकारी दल घोड़े बग्घियों मे सवार होकर वापस चल दिया। साथ में कुछ सैनिक भी थे। डान साहब की बीबी मार्ग्रेट ने डान साहब के साथ कैंप पर ही रुकने का फ़ैसला किया।उच्चाधिकारियों के दल के जाने के बाद चिंतित और परेशान डान साहब व पादरी कुछ चर्चा करने लगे। काफी देर विचारविमर्श करके उन्होंने यह जान लिया कि गांव वाले अपने पुजारी और देवी मां शक्ति के कारण ही इसाई नही बन रहे हैं। फिर उन्होंने कुटिल योजना बनाई और अपने अपने टेंटों मे सोने चले गए। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट के पास अपने निजी टेंट में चला गया। डान साहब का टेंट बाकी के चार टेंटों के बीच में बना था।
अगले दिन सुबह डान साहब पादरी और अपनी बीबी को लेकर गांव में घुमने निकले।उन्होंने देखा कि गांव के लोग प्रातः उठकर अपने खेतों में काम करने जाते हैं। कुछ लोग अपने गाय ,भैंस आदि पशुओं को चराने ले जाते हैं। अंग्रेजों के टेंटों के आसपास भी कुछ लोग जानवर चराने आए थे। गांव में घर बांस,घास फूस व मिट्टी खपरैल आदि से बने थे लेकिन देवी मां का मंदिर पत्थरों को काटकर और पत्थरों से बहुत अच्छे ढंग से बना था।डान साहब और पादरी कोइसपर बहुत आश्चर्य हुआ। अपनी बीबी और पादरी के साथ डान साहब दिन भर गांव की गलियों, पतले रास्तों ,कुटीर उद्योग कर्मियों के घरों के आस पास और खेतों की मेड़ों पर दिन भर घूमता रहा। इस तरह शाम तक अपनी योजनाओं के लिए जानकारी लेकर वे सब टेंट पर वापस आ गए। दिन भर गांव में घूमते समय पादरी और डान साहब ने अपने पिछली रात के कुटिल विचार को योजनाबद्ध कर लिया था। योजना के लिए डान साहब ने और सैनिकों की मांग पिछली रात को वापस जाने वाले दल से पहले ही कर लिया था। दल में डान साहब और पादरी ने खा पीकर सबको तैयार रहने को कह रखा था। डान साहब की पत्नी कुछ भयभीत और सशंकित लग रही थी। पर डान साहब ने उसे समझा बुझाकर सोने को भेज दिया। रात के दस बजते-बजते लगभग 100 सैनिक एक जीप और कुछ घुड़सवारों के साथ डेरे पर आ गए।सब लोग चुपचाप खाने पीने और आराम करने में लग गए।
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रात को 12 बजे के करीब डान साहब अपने साथ 100 सैनिकों को लेकर पादरी के साथ डेरे से बाहर निकला। मार्ग्रेट ने डान साहब को मंदिर से छेड़छाड़ करने से मना किया पर उसने उसे टेंट में आराम करने को कहा और बाकी के लगभग 30 सैनिकों को वहाँ छोडकर चल दिया। सबके हाथों में बंदूकें, तलवारें और बत्तियां (टार्च) थीं। अंधेरी रात थी।ठंडी हवा से सिहरन और रोमांच हो रहा था। सब टार्च की रोशनी मे चुपचाप चलते हुए गांव के बाहर से मंदिर की तरफ बढ़े।डान साहब और पादरी ने दिन मे ही भ्रमण के दौरान यह मार्ग देखा था जो गांव के बाहर बाहर झरने और पहाड़ीके बीच पतले रास्ते के रूप में मंदिर तक जाता था। इस रास्ते से वे सब गांव वालों से बचकर चुपचाप बेहद सतर्कता और तेजी से आखे जा रहे थे। लगभग 30 मिनट चलनेके बाद वे सब मंदिर के बगल मे पहुंच गए। वह रास्ता मंदिर के पीछे से निकलकर बगल से होते हुए मंदिर के सामने नीचे मैदान में उतरता था।जहाँ दिन मे उन्होंने गांव वालों का धार्मिक उत्सव देखा था। वे सब अब मंदिर के बगल में ऊंचाई पर खड़े थे। बगल में एक ओर पहाड़ी और दूसरी ओर मंदिर के पीछे नदी के बीच में यह पतला रास्ता था। नदी झरने से होकर रास्ते के साथ साथ मंदिर के पीछे आकर दूसरी ओर चली जाती थी। डान साहब के इशारे पर सब चुपचाप नीचे उतरने लगे।उतरने वाला रास्ता ऊबड़ खाबड़ और पथरीला था।आधे सैनिक (50) नीचे उतर गए और आधे ऊपर रह गए। डान साहब उन लोगों के साथ नीचे उतरा और सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के मुख्य दरवाजे पर जा पहुंचा। वहाँ पहुँच कर उसे कुछ अलौकिक अहसास हुआ और जी में श्रद्धा से सिर झुकाने का विचार आया। पर उसे आज यह करना ही था। अन्यथा उसके उच्चाधिकारी उसकी अच्छी खबर लेंगे और हो सकता है नौकरी से भी निकाल दें। अतः उसने अपने दिमाग और ह्दय को झटककर, मजबूत करके मंदिर के दरवाजे को खटखटाया। कई बार खटखटाने पर पुजारी थांगल की आवाज आयी-"कौन है? " "मैं हूँ! डान साहब।" डान साहब ने कहा। पुजारी ने दरवाजा खोला और क्या बात है? पर डान साहब कुछ नहीं बोला। उसकी आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था ।उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए प्रवेश कर गया। असावधान थांगल लड़खड़ाते हुए गेट से बाहर सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ नीचे जा गिरा और डान साहब को रोकने को कुछ कहकर बेहोश हो गया। तबतक पादरी भी सीढियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश कर गया। उसने टार्च की रोशनी में डान साहब को मंदिर में दौड़ते देखा। डान साहब अपने टार्च की रोशनी में चलते हुए मंदिर में एकदम अंदर चला गया। मंदिर बहुत भव्य और सुंदर था। डान साहब चलते चलते देवी मां की मूर्ति के सामने जा पहुंचा।.............................................. (सशेष)

पानी के लोग भाग 1 संसार का अंत

संसार का अंत परमाणु हथियारों या किसी परग्रही अंतरिक्षीय आपदा से नहीं बल्कि जनसंख्या विस्फोट से होगा ।- महान शुक्ला ।
एक शहर था वह पानी पर बसा था।
भारत सन 3033 ईस्वी ।
देश की जनसंख्या बेतहाशा बढ़ते हुए विस्फोटक हो गयी थी और देश की भरण पोषण की क्षमता से बाहर जा चुकी थी ।लोगों को रहने खाने और अन्य मलूभूत सुविधाओं का अकाल पड़ना शुरू हो गया था ।लोगों को पीने का पानी और खाने को भोजन मिलना कठिन हो गया। जनसंख्या बढ़ने से रहने के लिए और खेती योग्य जमीन की भी कमी पड़ने लगी ।धीरे-धीरे लोगों के रहने-खाने की स्थिति इतनी भयावह हो गई कि आपस मे मार काट मचने लगी। धर्म और संस्कृति का गुरू कहे जाने वाले देश में लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए एक दूसरे पर हमला करने लगे और जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिए एक दूसरे को मारने लगे। देश के कई भागों मे तो लोग भूख प्यास से व्याकुल होकर एक दूसरे को मार कर खाने लग गए थे। आज देश के नीति नियंता और बुद्धिजीवी लोग अपना सिर धुनते थे कि हमने समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस प्रयास क्यों नहीं किया? जनसंख्या तेज़ी से बढ़ते रहने से सरकार द्वारा किए जा रहे सारे प्रयास ,कल्याणकारी योजनाएँ ,सारी व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ सफल ही नहीं हो पाती थीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि सब लोगों तक सरकारी योजनाएँ पहुँचतीं ।अगर पाँच सौ लोगों के लिए कोई योजना बनती तो जब तक वह योजना धरातल पर उतरती तब तक लोगों की संख्या पाँच हज़ार हो चुकी होती ।इस तरह सदैव देश मे लोगों को मूलभूत सुविधाओं का अकाल पड़ा रहता। कुछ धर्म विशेष के लोग अपनी कुत्सित योजनाओं की पूर्ति के लिए जनसंख्या बढ़ाने मे लगे थे। धीरे धीरे देश में जनसंख्या अत्यधिक हो गई और हर चीज़ का अकाल हो गया।सारी व्यवस्था चरमरा गई।हर तरफ़ अराजकता फैल गई। पुलिस ,प्रशासन ,रेल,शिक्षा,चिकित्सा ,आवास ,भोजन ,पानी हर व्यवस्था जनसंख्या अत्यधिक होने के कारण और संसाधनों की कमी होने के कारण लोगों को मिलनी बंद हो गई,धराशायी हो गई।
आज मैं भी उसी जनसंख्या के अभिशाप से बचता भागता फिर रहा हूँ।मैंने देश के दक्षिणी तट पर कुछ प्रयोगों और संरक्षण द्वारा थोड़े से फल और सब्ज़ियों को उगाने मे सफलता प्राप्त किया था।यह मुख्य जनसंख्या से कटा हुआ एक गाँव था जो अब उजड़ चुका था।लोग इस गाँव को छोड़कर पानी और अन्य आवश्यकताओं के लिए अन्यत्र जा चुके थे।लोग बड़े बड़े शहरों और पाश कालोनियाँ मे मंहगी शानदार इमारतों को छोड़कर यहाँ वहाँ भटकने लगे थे और खानाबदोशों से भी बदतर एक दूसरे को मारते,लूटते हुए यहाँ वहाँ भटकते रहते थे।खाने के नाम पर किसी भी वनस्पति,अनाज या जीव जंतु और कमजोर मनुष्यों को खोजते हुए,एक बूँद पीने योग्य पानी के लिए । सारी सभ्यता,विकास उपहास जैसे लगते थे,इतिहास की बात हो गए थे ।आज उन बातों पर यक़ीन करना असंभव हो गया था। लोग कल्पना मे भी नहीं सोच पाते थे कि पहले कभी लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी घरों की टोंटियों और नलों मे आता था। लोग जी भरकर नहाते थे और शावर लेते थे। नदियों और तालाबों मे कभी पानी भरा रहता था यह आज कोई सोच भी नहीं सकता था।आज की लगभग सब नदियां सूख चुकी थीं। जो एक दो बची थीं उनका पानी पीने लायक़ नहीं था और उसके लिए लोगों मे मार काट मची थी लेकिन वह अब सरकार के नियंत्रण में थीं । कोई भी नदियों तक जाकर पानी छू भी नहीं सकता था ,उसे गोली मार दिया जाता था।सरकार और व्यवस्था बचे खुचे जलस्रोतों को अपने नियंत्रण मे लेकर जीवन को बचाने के लिए योजनाएँ बना रही थी।समुद्र था लेकिन एक तो उसका पानी नमकीन और सीधे पीने योग्य नहीं था दूसरे समुद्र मे जब तब भयंकर लहरें और तूफ़ान आते रहते थे। समुद्र से उठने वाले चक्रवाती तूफ़ानों के चलते लोग समुद्र तटों को छोड़कर भाग चुके थे। कुछ अफ़वाह थी कि समुद्र से उड़न तस्तरी या नौका निकलती है जो मैदानी क्षेत्रों मे उड़कर आती है और भयंकर चक्रवात आता है। फिर सब कुछ नष्ट हो जाता है और वहाँ की मिट्टी भी ग़ायब हो जाती है जैसे पूरे गाँव या क्षेत्र की मिट्टी खोदकर कोई उठा ले गया हो। मिट्टी तो ग़ायब हो रही थी और तूफ़ान समुद्र से चक्रवात की तरह उठता था लेकिन कोई भी ,समुद्र से उड़न तस्तरी निकलने या उड़ती नौका निकलकर मैदान मे चक्रवात फैलाने और तूफ़ान या तड़ित अथवा आग बरसाने की बात को वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध नहीं कर पाया था।यह सुनी सुनाई अफ़वाह ही थी लेकिन यह बात सही थी कि इधर कुछ सालों मे समुद्र के किनारे भी जो गया वह फिर जीवित नहीं देखा गया।बहुतों की तो लाशें ही नहीं मिली लेकिन कई लोग तट पर मृत पाए गए। यह भी सच था कि जगह जगह पर चक्रवाती तूफ़ान आते थे और उनके जाने के बाद वहाँ की मिट्टी ग़ायब हो जाती थी ,सब कुछ नष्ट हो जाता था और सब लोग मारे जाते थे। कुछ जगहों पर तूफान के दौरान आसमान से आग और अत्यधिक तड़ित आघात भी होते थे। इस तरह समुद्र के आतंक से भयभीत होकर लोग समुद्र के तटवर्ती इलाक़े छोड़कर मैदानों की ओर पलायन कर रहे थे। जिससे समुद्र किनारे के इलाक़े ,तटवर्ती क्षेत्र ,बंदरगाह ,शहर सब निर्जन और वीरान हो गए थे।समुद्र में नौका लेकर उतरना भी मौत को दावत देना था ।अब तो कभी-कभी सुरक्षा और लाव-लश्कर के साथ सरकार के लोग ही जहाज़ से समुद्र में उतरते थे। बाक़ी आम जन पूरी तरह से समुद्र से दूर भाग गए थे भयभीत होकर।वे सरकारी जहाज़ भी हमेशा दुर्घटना से सुरक्षित नहीं रहते थे। मछली पकड़ना और नौकायन तो अब कोई नहीं करता था। समुद्र मे या समुद्र के किनारे जाना आत्महत्या करने जैसा हो गया था।
इन्हीं सब घटनाओं के चलते समुद्र का यह तटवर्ती क्षेत्र वीरान हो गया था। मै यहीं पर लौकी, कद्दू, आलू, टमाटर जैसी सब्जियों को उगाने मे सफल रहा था। पठार की उंचाई पर पतली दरार मे मै पानी की कुछ स्वच्छ बूँदें खोज पाने मे सफल हो गया था। जिसके संरक्षण के बलबूते पर मैने वहां जीवन यापन करने के लिए भोजन पानी की व्यवस्था कर लिया था। अब मै लोगों के हिंसात्मक कोलाहल से दूर चुपचाप शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। पर समुद्री आपदा के दुःस्वप्न और आशंकाएं कभी-कभी भयभीत कर देती थीं। लेकिन मै यह सोचकर संतोष कर लेता था कि वह आपदा उन चलते फिरते, एक दूसरे को खाते मारते नर पिशाचों की भीड़ से ज्यादा खतरनाक नहीं होगी। फिर भी मै दोनों तरफ से आंखें मूंदकर निश्चिंत नहीं हो सकता था और धीरे-धीरे कुछ हथियारों, गाड़ियों और नौका की व्यवस्था कर लिया था। गाड़ियों को लोग यों ही छोड़कर भाग रहे थे। कुछ लोगों ने कुछ दिन लोभ वश अपनी गाड़ियां और बंगले संभालने चाहे लेकिन या तो वे भूख प्यास से व्याकुल भीड़ द्वारा मारे गए और उनका सबकुछ लूटपाट कर तोड़ फोड़ दिया गया या फिर वे स्वयं भूख प्यास से व्याकुल होकर भोजन पानी की तलाश में सब कुछ छोड़ भागे। इस तरह मै आराम से ऐसी कई गाड़ियाँ प्राप्त करने मे सफल हो गया।
लेकिन एक दिन मेरी निगाह कुछ लोगों पर पड़ी जो किसी को खा रहे थे। इंसानी मांस उनकी भूख मिटा रहा था और खून प्यास। वे छह लोग थे। मैने देखा कि वह अभागा कोई युवक था, उसका बालों युक्त सिर वहीं पड़ा था। मै कुछ ईंधन और हथियारों की खोज कर रहा था कि गलियारे से निकलते ही मुख्य सड़क पर मुझे यह भयंकर दृश्य दिखाई पड़ा। मैंने छुपकर उनसे बचने का प्रयास किया। मुझे लगा कि उन्होंने मुझे नहीं देखा है और मै तेजी से वापस मुड़कर अपने आवास की ओर बढ़ने लगा। लेकिन कुछ दूर चलने पर मैने मुड़कर पीछे देखा तो वे मेरे पीछे थे। सचमुच भूख प्यास ने मनुष्य को हैवान बना दिया था। वे चेहरे, हाथों पर खून लपेटे, होठों से रक्त मिश्रित लार टपकाते मेरे पीछे थे। भयंकर आवाजें कर रहे थे। लगता था कि भूख प्यास ने उनकी सभ्यता के सारे चिंह मिटा दिए थे, सभ्यता की सारी उपलब्धियों को छीन लिया था और वे इंसानों की तरह बोलने के बजाय भयानक आवाजें निकाल रहे थे। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओ से वंचित समस्त जनसंख्या का यही हाल था और जो मैने अभी उस सड़क पर चौराहे के पास देखा था वह पूरे देश की स्थिति का वर्णन था। अब वे नरपिशाच बन चुके लोग मुझे खाना चाहते थे और मुझे उनसे बचना था। मैने रूककर उन पर फायर किया। तीन गोलियां चलाकर तीन को मार गिराया और फिर तेजी से भागने लगा क्योंकि तीन लोगों के मरने से भी बाकियों की गति पर कोई भी अंतर नहीं पड़ा था और न ही उनमे भय का कोई चिंह था। मैने उनसे दूरी बढ़ाने के लिए अपनी गति तेज कर दिया और मुझे यह भी ख्याल रखना था कि वे मेरा निवास स्थान न देख सकें। मै एक पतली गली में घुस कर कुछ देर के लिए उनकी नजरों से ओझल हो गया और जब तक वे गली में आते मैं एक घर की खुली टूटी खिड़की मे कूद गया और अच्छी तरह छिपकर उनकी टोह लेने लगा। वे बचे हुए तीन पिशाच अंदर गली के मुहाने पर दिखाई पड़े तब तक किसी गाड़ी की आवाज आने लगी। वे उस आवाज से बेखबर गली में चल रहे थे कि एक सैनिक गाड़ी गली के मुहाने पर रुकी और उससे तीन फायर हुए। तीन लपटें निकलीं और उन तीनों पिशाचों को छू गईं। तत्काल तीनों मरकर गिर गए। अब गाड़ी से तीन ‘ऊपर से नीचे तक सैनिक वर्दी में ढके’ लोग निकले और राइफल जैसे हथियारों को तानते हुए सावधानी पूर्वक उन तीन मृत पिशाचों के पास आए। पैरों से उन्हें हिला डुला कर देखा। फिर कुछ इशारा किया तो गाड़ी से सफेद वस्त्रों मे कोई उतरा। हाथों में छोटा बक्सा और इंजेक्शन लेकर वह तेजी से उनके बीच आया और उन मृत पिशाचों पर झुक गया। मै देख नहीं सका कि उसने क्या किया। सारे सैनिक सावधानी पूर्वक झुककर उसे देख रहे थे। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। फिर वह सफेद वस्त्र वाला उठा और बोला - "इनमे संक्रमण फैल चुका है। इस पूरे इलाके के लोग संक्रमण का शिकार हो चुके लगते हैं। यह बहुत बड़े संकट की बात है।" फिर वे लोग वापस जाने के लिए मुड़े और कुछ बात करते हुए गाड़ी की ओर चल दिए। मुड़ते समय उस सफेद कपड़े वाले का चेहरा मैंने देखा वह सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन वैज्ञानिक डाक्टर शयनांक था। बेहद प्रतिभाशाली, महत्वाकांक्षी और खतरनाक व्यक्ति। शासन मे भी उसकी अच्छी ताकतपूर्ण स्थिति थी। बाकी सब सैनिकों के शरीर के साथ साथ चेहरे भी ढके थे। डाक्टर को मैने सरकार के लिए काम करते समय एक दो बार देखा था और समाचार पत्रों, चैनलों मे तथा इधर उधर लोगों की कानाफूसियों मे उसके बारे में पढ़ा, देखा व सुना था। अब सबकुछ खतरनाक होता जा रहा था। मैने उन्हें लोगों के किसी संक्रमण से ग्रस्त होने की बात करते सुना था और यह भी कहते हुए सुना था कि यह बेहद खतरनाक बात है। मै सशंकित होता हुआ तेजी से खिड़की से निकल कर भागा और आगे पीछे देखते हुए सावधानी पूर्वक दौड़ता हुआ अपने आवास पर पहुंच गया।

2
रात का समय था। मै अपने इस निर्जन स्वर्ग में एकाकी जीवन व्यतीत करता हुआ ऊब रहा था। उस दिन संक्रमण के शिकार नरपिशाचों की घटना को एक सप्ताह बीत चुका था। चांदनी रात में मै चुपचाप ऊंघ रहा था। उजड़ा वीरान वातावरण चंद्रमा की रोशनी में नहाया हुआ भयंकर दिख रहा था। मुझे अब एहसास हुआ कि चंद्रमा की ज्योत्सना भी पशु पक्षियों, पेड़ पौधों, झरने नदी तालाबों को आलोकित करती हुई ही सुंदर लगती है। सुंदर वस्तुओं पर पड़कर उन्हें और मनमोहक सौंदर्य से भिगो देती है लेकिन भयंकर और कुरूप वस्तुओं की भयंकरता और कुरूपता को ही बढ़ाती है। मै अपने उधेड़बुन मे खोया हुआ था कि "आ गर्र" की आवाज सुनकर चौंक पड़ा। तत्काल भागकर अपना हथियार उठाया और गाड़ियों की स्थिति जांचा। मेरा अनुमान सही था। मुझपर उन रक्तपायियों ने हमला किया था। आख़िर कब तक मैं उन घूमते नरपिशाचों की नज़रों से या सरकार से बचा रह सकता था और उस दिन सड़क पर जो कुछ हुआ था उससे मैं ज्यादा ही सशंकित रहने लगा था कि ऐसा कभी भी हो सकता है या कभी भी समुद्र का कहर मुझपर टूट सकता है, मै समुद्र के बेहद करीब तटवर्ती क्षेत्र में था। इसलिए मै सदैव भागने के लिए गाड़ियों का काफिला पानी और उपयोगी खाद्य वनस्पतियों सहित तथा गाड़ी में ही ऊपर एक नौका बांधकर तैयार रखता था। भले ही समुद्र घातक था पर मैने उन पिशाचों या सरकार के हाथों कैद होने के बजाय भागने के लिए समुद्र को चुना था। शायद वहां बच सकूं, आखिर इतने दिनों तक तटवर्ती क्षेत्र में रहने के बावजूद मै अभी तक समुद्र से सुरक्षित था। मैंने ओट से उन पिशाचों पर फायर करना शुरू किया। पर वे बहुत सारे थे। मैने पेट्रोल बमों और ग्रेनेड से हमला करके बहुतों को जला दिया। फिर गोलियों से उन्हें भूनने लगा। लेकिन उनकी आवाज हर दिशा से आती लग रही थी। और फिर मैंने सामने दूसरी दिशा में फायरिंग और लपटें देखा। बिल्कुल वैसी ही लपटें जो उस दिन सड़क पर सरकारी वाहन से निकलते देखा था। अब मै भागने की तैयारी करने लगा। मै किसी भी हाल में सरकार की निगाह में नहीं आना चाहता था। सरकार भी पहले तो मुझे गिरफ्तार करेगी और फिर संक्रमण की जांच इत्यादि के बहाने भगवान ही जाने मेरा क्या हाल करेगी। साथ ही यह जगह और मेरा सबकुछ सरकारी नियंत्रण मे चला जाएगा या अधिकारियों का निवाला बन जाएगा। आज एक बार फिर मुझे मेरा स्वर्ग उजड़ता हुआ लग रहा था। मेरा छोटा सा स्वर्ग, जहाँ न कोई कानून था और न ही किसी दूसरे की दखलंदाजी। यह सब ऐसे ही था जैसे लगभग 2000 सालों पहले मेरे पूर्वजों को इस्लामिक आतंकवादियों और जेहादियों ने कश्मीर से 1990 मे भगाया था। हां मै एक कश्मीरी पंडित हूँ। अब तो कश्मीर कैसा है कहना कठिन है। क्योंकि मै लगभग 20 वर्षों से वहाँ नहीं गया। इन वर्षों में मैं इसी तरह यहां वहां भागता फिर रहा हूँ। बाद में मोदी, शाह और योगी जैसे राजनेताओं ने देश की तमाम समस्याओं के साथ कश्मीर समस्या हल करके कश्मीर को अपराधियों से मुक्त करके कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बसाया था। इस तरह कश्मीर दुबारा स्वर्ग बन गया था और वहाँ से सरकार को उत्पादन, निर्माण और पर्यटन से अपार राजस्व प्राप्त होने लगा था। आज फिर मुझे उसी तरह अपना यह छोटा मोटा स्वर्ग (आज की परिस्थितियों के लिए यह जगह स्वर्ग ही थी।) उजड़ता और छिनता महसूस हो रहा था। रक्तपायियों के कब्जे में आने के बाद तो कुछ भी बचने की उम्मीद करना व्यर्थ था। मैने जब देखा कि सरकारी वाहन आग उगलता हुआ काफी दूर चला गया तो मै अपनी आवश्यक वस्तुओं से भरी और एक दूसरे मे बंधी गाड़ियों के काफिले को लेकर समुद्र की ओर चल पड़ा। क्योंकि इतनी देर मे रक्तपायियों की भीड़ मेरे उस आवास तक पहुंच गयी थी। मैने सरकारी वाहन आकर्षित न हो इस लिए फायरिंग बंद कर दिया था जिसका लाभ उठाकर वे भूखे प्यासे या संक्रमित पिशाच बन चुके लोग मेरे आवास स्थल मे दाखिल हो गए और सबकुछ तहस नहस करने लगे थे। चांदनी में मैने देखा कि पानी और वनस्पतियों को देखते ही वे एकदम टूट पड़े और सबकुछ नष्ट करते हुए मारा-मारी करने लगे। मेरा 3 वाहनो का काफिला बढ़ने लगा लेकिन वे मेरे आवास मे उपलब्ध पानी और वनस्पतियों पर उलझे रहे। मैने फिर रुककर उनपर फायर करके उनको मारना शुरू किया। तभी ऊपर चट्टान से कूद कर एक भीमकाय आकृति आयी और उसने मुंह से नीला बैगनी धुंआ फूंककर आस पास के पिशाचों को मार दिया और खुद पानी व वनस्पतियों को खाने बरबाद करने लगा। पानी पीते ही वे सब मुंह ऊपर उठाकर ऐसी चैन की सांस ले रहे थे जैसे अमृत पा गए हों। मैने उस धुंए वाले पिशाच पर भी कई फायर किए लेकिन वह मरने या घायल होने की बजाय गुर्राकर मेरी तरफ घूमा, उसके मुंह से धुंआ निकल रहा था और जबड़े पर खून लगा था। उसने मुझपर धुंआ उगला तो मै बचाव करते हुए गाड़ी बढ़ाकर भागने लगा। शायद मेरा पिछला ट्रक उसके पानी की बौछार जैसे धुंए के चपेट में आ गया था लेकिन मै अंदाजा नहीं लगा सकता था और न ही मेरे पास रुककर देखने के लिए समय था कि उस ट्रक पर कोई दुष्प्रभाव या नुकसान हुआ था। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि यह क्या था और इसके धुंए की बौछार से किस तरह का नुकसान हो सकता था या हुआ था ? शायद यह उसी संक्रमण का शिकार था जिसके बारे में डाक्टर शयनांक बात कर रहा था। मैने अपने वाहनों को तेजी से भगाया क्योंकि वह पिशाच तेजी से आगे बढ़ रहा था और इन सब शोरगुल से आकर्षित होकर सरकारी वाहन फायर करता हुआ इधर ही आ रहा था। उस वाहन ने रोशनियों की बरसात करके सभी पिशाचों को समाप्त कर दिया और फिर मेरे वाहनों के काफिले के पीछे भागते धुंआ उगलते पिशाच का पीछा करते हुए मेरे पीछे आने लगा।

मेरे वाहनों के काफिले में सबसे आगे एक ट्रक था। जिसके ऊपर मैने नौका बांध रखी थी और पीछे पानी भरा एक टैंकर और फिर खाद्य पदार्थों और वनस्पतियों से भरा एक ट्रक था। वह अजीब आकृति दौड़ते हुए मेरे पिछले ट्रक के बेहद करीब आ गयी थी और जब मैने अगले मोड़ पर वाहनों को मोड़ा तो वह पिशाच उछलकर पिछले ट्रक पर चढ़ गया। अब मै तेजी से वाहन भगाते हुए उजड़ा शहर छोड़कर खुले समुद्री मैदान में आ गया था और मेरा वाहन बेहद तेजी से समुद्र की ओर बढ़ रहा था। सरकारी वाहन अब तक काफी तीव्र गति से बढ़ते हुए मेरे पिछले वाहन के बगल से होकर टैंकर के साथ चलते हुए उस पिशाच पर रोशनियों वाली फायरिंग कर रहा था। वह पिशाच कुछ देर तक बचते हुए ट्रक मे घुसने का प्रयास करता रहा लेकिन फिर सरकारी वाहन पर कूदा और उससे निकली रोशनियों की बरसात ने उसे नहला कर मार दिया। मैने देखा कि वह पिशाच सरकारी वाहन पर कूदने के लिए मेरे ट्रक से उछला और उसका शरीर फायरिंग की रोशनियों से मृत होकर हवा में ही धीरे धीरे तैरता हुआ सरकारी वाहन पर जा गिरा। उसने उछलते हुए सरकारी वाहन पर नीला बैगनी धुंआ उगला था।पानी की बौछार की तरह तेज गति से जाकर वह धुंआ सरकारी वाहन से टकराया था और वाहन का अगला हिस्सा पिघलने लगा था। वाहन क्षतिग्रस्त होकर उलट गया और आगे बैठे चार लोग चीखते हुए उतरकर भागे। वह मृत पिशाच उस पिघलते वाहन पर गिरकर शायद उन लोगो पर गिरा था। वाहन के उलटने से उन लोगों के सुरक्षित कपड़े फट गए थे और वे भी उस नीले धुंए मे नहाकर चीख रहे थे। उस धुंए के साथ उनका शरीर धुंआ बनकर उड़ रहा था। हाथ, चेहरा जो भी उस जहरीले धुंएं मे डूबा उनके शरीर के उस हिस्से का सारा मांस धुंए के साथ ही उड़ गया और वे चीखते हुए एंठकर मर गए। उनका अर्धकंकाल मे बदला शरीर अकड़ गया। मैंने यह सब देखकर अपने वाहन की गति और तेज कर दिया क्योंकि पकड़े जाने पर अब मै सरकार के निशाने पर आ सकता था। जिसपर उन पिशाचों को पालने का या समुद्र के आतंक से संबंधित होने का आरोप लगाकर कुछ भी किया जा सकता था। तब तक गाड़ी के पिछले हिस्से से टिड्डी दल की तरह निकलते सैनिकों ने उन मृत लोगों पर कोई पीला धुंआ छिड़कना शुरू कर दिया। मैने अनुमान लगाया कि यह उनको बचाने या निःसंक्रमित करने के लिए होगा। फिर उनमे से कुछ लोगों ने मेरे वाहनों पर फायर किया। जिससे मेरा पिछला ट्रक और टैंकर आग का गोला बन गए। पता नहीं किस तरह का फायर वे कर रहे थे। तब तक मेरा ट्रक समुद्र में घुसने लगा था। मैने ट्रक के छत पर पहुंच कर नौका को काटकर खोला और उसमे छुपकर बैठ गया। आग की लपटों सहित पिछले दोनों वाहनों के साथ मेरे तीनों वाहन पानी में घुसते जा रहे थे और मेरी नौका ट्रक से फिसलकर पानी में उतर गई थी। आग और धुंएं की आड़ में मै अपनी नौका तैराता हुआ उन वाहनों से काफी दूर बीच समुद्र में पहुंच गया। तभी जलता टैंकर फूटा और पानी तथा जलते वाहन के टुकड़े दूर तक उछले। फिर लगातार तीन धमाके और हुए। मैने देखा कि दूर किनारे पर वे सरकारी सैनिक खड़े होकर जलते डूबते वाहनों को देख रहे थे। धमाके के दबाव से उत्पन्न लहरें और हवा के थपेड़ों ने मेरी नौका डांवाडोल कर दिया था। चांदनी मे लहरों पर डगमगाती मेरी नौका मे बैठकर भी मै पानी में चंद्र ज्योत्स्ना के घुलते सौंदर्य पर मंत्रमुग्ध हो गया था। धरती पर अब ऐसा दृश्य अकल्पनीय हो गया था। मैने देखा कि किनारे से सैनिकों ने भी मुझे देखा और मुझपर फायर करने लगे। शायद वे टेलीस्कोप से देखकर फायर कर रहे थे क्योंकि बहुत दूर होने पर भी मैं उनके निशाने पर आ रहा था। वे मुझे अब बहुत छोटे दिख रहे थे लेकिन उन से निकलती रोशनी की लकीरें मुझे छूना चाहती थीं। तभी मुझे कुछ अजीब सा शोर सुनाई दिया और मैने देखा कि समुद्र के किनारे पानी बवंडर की तरह ऊपर उठ रहा था। फिर तेजी से तूफ़ान उठा। अब मै किनारे पर सैनिकों को देख नहीं सकता था लेकिन समझ सकता था कि उनके साथ क्या हो सकता है। फिर सभी सैनिक आसमान में पानी के बवंडर मे नाचते नजर आए। वे चीख रहे थे। उसके बाद पानी के बीच से कड़कती बिजली निकली और सभी सैनिक उसकी चपेट में आकर भुनने लगे। बिजली की कड़क मे उनकी चीखें गुम हो गईं और मेरे चारो तरफ उनके मृत शरीरों की बरसात होने लगी। मै भय से कांप रहा था। बवंडर का पानी तो कम होते हुए नीचे बैठ रहा था लेकिन मेरी नौका के चारो तरफ का पानी शायद उबल रहा था। उसमे उबाल आ रहा था, बुलबुले उठ रहे थे लेकिन भाप नहीं निकल रही थी। मेरी नौका उबलते बुलबुलेदार पानी में डांवाडोल हो रही थी और मै उसमे चारो ओर घूमता संतुलन बनाता हुआ भयभीत सा पानी में देख रहा था कि अब मेरा जाने क्या होगा। पानी गर्म तो नहीं है यह जानने के लिए मैने डरते डरते पानी को उंगली से छुआ। आश्चर्य जनक रूप से पानी ठंडा था पर मेरा हाथ पानी की लहरों में डूबा और मुझे लगा कि किसी ने मुझे पकड़ लिया है। पानी में मेरा हाथ खिंचने लगा और मै नौका मे जोर लगाकर उठने का प्रयास करने लगा। तभी तेज धमाके के साथ मेरी नौका कई टुकड़ों में टूट गई और मै पानी में औंधे मुंह जा गिरा। मुझे लगा कि कोई मेरा हाथ अभी भी पकड़े हुए है और मुझे खींचकर समुद्र के अंदर ले जा रहा है। कुछ देर बचने और छूटने के लिए संघर्ष के बाद मै बेहोश होने लगा और तभी मैने कुछ देखा। पर यह नहीं जान सका कि वह क्या है। फिर धीरे धीरे मै बेहोश हो गया। शायद यह मेरा अंत था, शायद मै मर रहा था। । मैने ईश्वर को मन ही मन प्रणाम किया और फिर मेरा मन निःचेतना के गहन अंधकार में डूब गया।