संसार का अंत परमाणु हथियारों या किसी परग्रही अंतरिक्षीय आपदा से नहीं बल्कि जनसंख्या विस्फोट से होगा ।- महान शुक्ला ।
एक शहर था वह पानी पर बसा था।
भारत सन 3033 ईस्वी ।
देश की जनसंख्या बेतहाशा बढ़ते हुए विस्फोटक हो गयी थी और देश की भरण पोषण की क्षमता से बाहर जा चुकी थी ।लोगों को रहने खाने और अन्य मलूभूत सुविधाओं का अकाल पड़ना शुरू हो गया था ।लोगों को पीने का पानी और खाने को भोजन मिलना कठिन हो गया। जनसंख्या बढ़ने से रहने के लिए और खेती योग्य जमीन की भी कमी पड़ने लगी ।धीरे-धीरे लोगों के रहने-खाने की स्थिति इतनी भयावह हो गई कि आपस मे मार काट मचने लगी। धर्म और संस्कृति का गुरू कहे जाने वाले देश में लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए एक दूसरे पर हमला करने लगे और जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिए एक दूसरे को मारने लगे। देश के कई भागों मे तो लोग भूख प्यास से व्याकुल होकर एक दूसरे को मार कर खाने लग गए थे। आज देश के नीति नियंता और बुद्धिजीवी लोग अपना सिर धुनते थे कि हमने समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस प्रयास क्यों नहीं किया? जनसंख्या तेज़ी से बढ़ते रहने से सरकार द्वारा किए जा रहे सारे प्रयास ,कल्याणकारी योजनाएँ ,सारी व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ सफल ही नहीं हो पाती थीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि सब लोगों तक सरकारी योजनाएँ पहुँचतीं ।अगर पाँच सौ लोगों के लिए कोई योजना बनती तो जब तक वह योजना धरातल पर उतरती तब तक लोगों की संख्या पाँच हज़ार हो चुकी होती ।इस तरह सदैव देश मे लोगों को मूलभूत सुविधाओं का अकाल पड़ा रहता। कुछ धर्म विशेष के लोग अपनी कुत्सित योजनाओं की पूर्ति के लिए जनसंख्या बढ़ाने मे लगे थे। धीरे धीरे देश में जनसंख्या अत्यधिक हो गई और हर चीज़ का अकाल हो गया।सारी व्यवस्था चरमरा गई।हर तरफ़ अराजकता फैल गई। पुलिस ,प्रशासन ,रेल,शिक्षा,चिकित्सा ,आवास ,भोजन ,पानी हर व्यवस्था जनसंख्या अत्यधिक होने के कारण और संसाधनों की कमी होने के कारण लोगों को मिलनी बंद हो गई,धराशायी हो गई।
आज मैं भी उसी जनसंख्या के अभिशाप से बचता भागता फिर रहा हूँ।मैंने देश के दक्षिणी तट पर कुछ प्रयोगों और संरक्षण द्वारा थोड़े से फल और सब्ज़ियों को उगाने मे सफलता प्राप्त किया था।यह मुख्य जनसंख्या से कटा हुआ एक गाँव था जो अब उजड़ चुका था।लोग इस गाँव को छोड़कर पानी और अन्य आवश्यकताओं के लिए अन्यत्र जा चुके थे।लोग बड़े बड़े शहरों और पाश कालोनियाँ मे मंहगी शानदार इमारतों को छोड़कर यहाँ वहाँ भटकने लगे थे और खानाबदोशों से भी बदतर एक दूसरे को मारते,लूटते हुए यहाँ वहाँ भटकते रहते थे।खाने के नाम पर किसी भी वनस्पति,अनाज या जीव जंतु और कमजोर मनुष्यों को खोजते हुए,एक बूँद पीने योग्य पानी के लिए । सारी सभ्यता,विकास उपहास जैसे लगते थे,इतिहास की बात हो गए थे ।आज उन बातों पर यक़ीन करना असंभव हो गया था। लोग कल्पना मे भी नहीं सोच पाते थे कि पहले कभी लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी घरों की टोंटियों और नलों मे आता था। लोग जी भरकर नहाते थे और शावर लेते थे। नदियों और तालाबों मे कभी पानी भरा रहता था यह आज कोई सोच भी नहीं सकता था।आज की लगभग सब नदियां सूख चुकी थीं। जो एक दो बची थीं उनका पानी पीने लायक़ नहीं था और उसके लिए लोगों मे मार काट मची थी लेकिन वह अब सरकार के नियंत्रण में थीं । कोई भी नदियों तक जाकर पानी छू भी नहीं सकता था ,उसे गोली मार दिया जाता था।सरकार और व्यवस्था बचे खुचे जलस्रोतों को अपने नियंत्रण मे लेकर जीवन को बचाने के लिए योजनाएँ बना रही थी।समुद्र था लेकिन एक तो उसका पानी नमकीन और सीधे पीने योग्य नहीं था दूसरे समुद्र मे जब तब भयंकर लहरें और तूफ़ान आते रहते थे। समुद्र से उठने वाले चक्रवाती तूफ़ानों के चलते लोग समुद्र तटों को छोड़कर भाग चुके थे। कुछ अफ़वाह थी कि समुद्र से उड़न तस्तरी या नौका निकलती है जो मैदानी क्षेत्रों मे उड़कर आती है और भयंकर चक्रवात आता है। फिर सब कुछ नष्ट हो जाता है और वहाँ की मिट्टी भी ग़ायब हो जाती है जैसे पूरे गाँव या क्षेत्र की मिट्टी खोदकर कोई उठा ले गया हो। मिट्टी तो ग़ायब हो रही थी और तूफ़ान समुद्र से चक्रवात की तरह उठता था लेकिन कोई भी ,समुद्र से उड़न तस्तरी निकलने या उड़ती नौका निकलकर मैदान मे चक्रवात फैलाने और तूफ़ान या तड़ित अथवा आग बरसाने की बात को वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध नहीं कर पाया था।यह सुनी सुनाई अफ़वाह ही थी लेकिन यह बात सही थी कि इधर कुछ सालों मे समुद्र के किनारे भी जो गया वह फिर जीवित नहीं देखा गया।बहुतों की तो लाशें ही नहीं मिली लेकिन कई लोग तट पर मृत पाए गए। यह भी सच था कि जगह जगह पर चक्रवाती तूफ़ान आते थे और उनके जाने के बाद वहाँ की मिट्टी ग़ायब हो जाती थी ,सब कुछ नष्ट हो जाता था और सब लोग मारे जाते थे। कुछ जगहों पर तूफान के दौरान आसमान से आग और अत्यधिक तड़ित आघात भी होते थे। इस तरह समुद्र के आतंक से भयभीत होकर लोग समुद्र के तटवर्ती इलाक़े छोड़कर मैदानों की ओर पलायन कर रहे थे। जिससे समुद्र किनारे के इलाक़े ,तटवर्ती क्षेत्र ,बंदरगाह ,शहर सब निर्जन और वीरान हो गए थे।समुद्र में नौका लेकर उतरना भी मौत को दावत देना था ।अब तो कभी-कभी सुरक्षा और लाव-लश्कर के साथ सरकार के लोग ही जहाज़ से समुद्र में उतरते थे। बाक़ी आम जन पूरी तरह से समुद्र से दूर भाग गए थे भयभीत होकर।वे सरकारी जहाज़ भी हमेशा दुर्घटना से सुरक्षित नहीं रहते थे। मछली पकड़ना और नौकायन तो अब कोई नहीं करता था। समुद्र मे या समुद्र के किनारे जाना आत्महत्या करने जैसा हो गया था।
इन्हीं सब घटनाओं के चलते समुद्र का यह तटवर्ती क्षेत्र वीरान हो गया था। मै यहीं पर लौकी, कद्दू, आलू, टमाटर जैसी सब्जियों को उगाने मे सफल रहा था। पठार की उंचाई पर पतली दरार मे मै पानी की कुछ स्वच्छ बूँदें खोज पाने मे सफल हो गया था। जिसके संरक्षण के बलबूते पर मैने वहां जीवन यापन करने के लिए भोजन पानी की व्यवस्था कर लिया था। अब मै लोगों के हिंसात्मक कोलाहल से दूर चुपचाप शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। पर समुद्री आपदा के दुःस्वप्न और आशंकाएं कभी-कभी भयभीत कर देती थीं। लेकिन मै यह सोचकर संतोष कर लेता था कि वह आपदा उन चलते फिरते, एक दूसरे को खाते मारते नर पिशाचों की भीड़ से ज्यादा खतरनाक नहीं होगी। फिर भी मै दोनों तरफ से आंखें मूंदकर निश्चिंत नहीं हो सकता था और धीरे-धीरे कुछ हथियारों, गाड़ियों और नौका की व्यवस्था कर लिया था। गाड़ियों को लोग यों ही छोड़कर भाग रहे थे। कुछ लोगों ने कुछ दिन लोभ वश अपनी गाड़ियां और बंगले संभालने चाहे लेकिन या तो वे भूख प्यास से व्याकुल भीड़ द्वारा मारे गए और उनका सबकुछ लूटपाट कर तोड़ फोड़ दिया गया या फिर वे स्वयं भूख प्यास से व्याकुल होकर भोजन पानी की तलाश में सब कुछ छोड़ भागे। इस तरह मै आराम से ऐसी कई गाड़ियाँ प्राप्त करने मे सफल हो गया।
लेकिन एक दिन मेरी निगाह कुछ लोगों पर पड़ी जो किसी को खा रहे थे। इंसानी मांस उनकी भूख मिटा रहा था और खून प्यास। वे छह लोग थे। मैने देखा कि वह अभागा कोई युवक था, उसका बालों युक्त सिर वहीं पड़ा था। मै कुछ ईंधन और हथियारों की खोज कर रहा था कि गलियारे से निकलते ही मुख्य सड़क पर मुझे यह भयंकर दृश्य दिखाई पड़ा। मैंने छुपकर उनसे बचने का प्रयास किया। मुझे लगा कि उन्होंने मुझे नहीं देखा है और मै तेजी से वापस मुड़कर अपने आवास की ओर बढ़ने लगा। लेकिन कुछ दूर चलने पर मैने मुड़कर पीछे देखा तो वे मेरे पीछे थे। सचमुच भूख प्यास ने मनुष्य को हैवान बना दिया था। वे चेहरे, हाथों पर खून लपेटे, होठों से रक्त मिश्रित लार टपकाते मेरे पीछे थे। भयंकर आवाजें कर रहे थे। लगता था कि भूख प्यास ने उनकी सभ्यता के सारे चिंह मिटा दिए थे, सभ्यता की सारी उपलब्धियों को छीन लिया था और वे इंसानों की तरह बोलने के बजाय भयानक आवाजें निकाल रहे थे। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओ से वंचित समस्त जनसंख्या का यही हाल था और जो मैने अभी उस सड़क पर चौराहे के पास देखा था वह पूरे देश की स्थिति का वर्णन था। अब वे नरपिशाच बन चुके लोग मुझे खाना चाहते थे और मुझे उनसे बचना था। मैने रूककर उन पर फायर किया। तीन गोलियां चलाकर तीन को मार गिराया और फिर तेजी से भागने लगा क्योंकि तीन लोगों के मरने से भी बाकियों की गति पर कोई भी अंतर नहीं पड़ा था और न ही उनमे भय का कोई चिंह था। मैने उनसे दूरी बढ़ाने के लिए अपनी गति तेज कर दिया और मुझे यह भी ख्याल रखना था कि वे मेरा निवास स्थान न देख सकें। मै एक पतली गली में घुस कर कुछ देर के लिए उनकी नजरों से ओझल हो गया और जब तक वे गली में आते मैं एक घर की खुली टूटी खिड़की मे कूद गया और अच्छी तरह छिपकर उनकी टोह लेने लगा। वे बचे हुए तीन पिशाच अंदर गली के मुहाने पर दिखाई पड़े तब तक किसी गाड़ी की आवाज आने लगी। वे उस आवाज से बेखबर गली में चल रहे थे कि एक सैनिक गाड़ी गली के मुहाने पर रुकी और उससे तीन फायर हुए। तीन लपटें निकलीं और उन तीनों पिशाचों को छू गईं। तत्काल तीनों मरकर गिर गए। अब गाड़ी से तीन ‘ऊपर से नीचे तक सैनिक वर्दी में ढके’ लोग निकले और राइफल जैसे हथियारों को तानते हुए सावधानी पूर्वक उन तीन मृत पिशाचों के पास आए। पैरों से उन्हें हिला डुला कर देखा। फिर कुछ इशारा किया तो गाड़ी से सफेद वस्त्रों मे कोई उतरा। हाथों में छोटा बक्सा और इंजेक्शन लेकर वह तेजी से उनके बीच आया और उन मृत पिशाचों पर झुक गया। मै देख नहीं सका कि उसने क्या किया। सारे सैनिक सावधानी पूर्वक झुककर उसे देख रहे थे। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। फिर वह सफेद वस्त्र वाला उठा और बोला - "इनमे संक्रमण फैल चुका है। इस पूरे इलाके के लोग संक्रमण का शिकार हो चुके लगते हैं। यह बहुत बड़े संकट की बात है।" फिर वे लोग वापस जाने के लिए मुड़े और कुछ बात करते हुए गाड़ी की ओर चल दिए। मुड़ते समय उस सफेद कपड़े वाले का चेहरा मैंने देखा वह सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन वैज्ञानिक डाक्टर शयनांक था। बेहद प्रतिभाशाली, महत्वाकांक्षी और खतरनाक व्यक्ति। शासन मे भी उसकी अच्छी ताकतपूर्ण स्थिति थी। बाकी सब सैनिकों के शरीर के साथ साथ चेहरे भी ढके थे। डाक्टर को मैने सरकार के लिए काम करते समय एक दो बार देखा था और समाचार पत्रों, चैनलों मे तथा इधर उधर लोगों की कानाफूसियों मे उसके बारे में पढ़ा, देखा व सुना था। अब सबकुछ खतरनाक होता जा रहा था। मैने उन्हें लोगों के किसी संक्रमण से ग्रस्त होने की बात करते सुना था और यह भी कहते हुए सुना था कि यह बेहद खतरनाक बात है। मै सशंकित होता हुआ तेजी से खिड़की से निकल कर भागा और आगे पीछे देखते हुए सावधानी पूर्वक दौड़ता हुआ अपने आवास पर पहुंच गया।
2
रात का समय था। मै अपने इस निर्जन स्वर्ग में एकाकी जीवन व्यतीत करता हुआ ऊब रहा था। उस दिन संक्रमण के शिकार नरपिशाचों की घटना को एक सप्ताह बीत चुका था। चांदनी रात में मै चुपचाप ऊंघ रहा था। उजड़ा वीरान वातावरण चंद्रमा की रोशनी में नहाया हुआ भयंकर दिख रहा था। मुझे अब एहसास हुआ कि चंद्रमा की ज्योत्सना भी पशु पक्षियों, पेड़ पौधों, झरने नदी तालाबों को आलोकित करती हुई ही सुंदर लगती है। सुंदर वस्तुओं पर पड़कर उन्हें और मनमोहक सौंदर्य से भिगो देती है लेकिन भयंकर और कुरूप वस्तुओं की भयंकरता और कुरूपता को ही बढ़ाती है। मै अपने उधेड़बुन मे खोया हुआ था कि "आ गर्र" की आवाज सुनकर चौंक पड़ा। तत्काल भागकर अपना हथियार उठाया और गाड़ियों की स्थिति जांचा। मेरा अनुमान सही था। मुझपर उन रक्तपायियों ने हमला किया था। आख़िर कब तक मैं उन घूमते नरपिशाचों की नज़रों से या सरकार से बचा रह सकता था और उस दिन सड़क पर जो कुछ हुआ था उससे मैं ज्यादा ही सशंकित रहने लगा था कि ऐसा कभी भी हो सकता है या कभी भी समुद्र का कहर मुझपर टूट सकता है, मै समुद्र के बेहद करीब तटवर्ती क्षेत्र में था। इसलिए मै सदैव भागने के लिए गाड़ियों का काफिला पानी और उपयोगी खाद्य वनस्पतियों सहित तथा गाड़ी में ही ऊपर एक नौका बांधकर तैयार रखता था। भले ही समुद्र घातक था पर मैने उन पिशाचों या सरकार के हाथों कैद होने के बजाय भागने के लिए समुद्र को चुना था। शायद वहां बच सकूं, आखिर इतने दिनों तक तटवर्ती क्षेत्र में रहने के बावजूद मै अभी तक समुद्र से सुरक्षित था। मैंने ओट से उन पिशाचों पर फायर करना शुरू किया। पर वे बहुत सारे थे। मैने पेट्रोल बमों और ग्रेनेड से हमला करके बहुतों को जला दिया। फिर गोलियों से उन्हें भूनने लगा। लेकिन उनकी आवाज हर दिशा से आती लग रही थी। और फिर मैंने सामने दूसरी दिशा में फायरिंग और लपटें देखा। बिल्कुल वैसी ही लपटें जो उस दिन सड़क पर सरकारी वाहन से निकलते देखा था। अब मै भागने की तैयारी करने लगा। मै किसी भी हाल में सरकार की निगाह में नहीं आना चाहता था। सरकार भी पहले तो मुझे गिरफ्तार करेगी और फिर संक्रमण की जांच इत्यादि के बहाने भगवान ही जाने मेरा क्या हाल करेगी। साथ ही यह जगह और मेरा सबकुछ सरकारी नियंत्रण मे चला जाएगा या अधिकारियों का निवाला बन जाएगा। आज एक बार फिर मुझे मेरा स्वर्ग उजड़ता हुआ लग रहा था। मेरा छोटा सा स्वर्ग, जहाँ न कोई कानून था और न ही किसी दूसरे की दखलंदाजी। यह सब ऐसे ही था जैसे लगभग 2000 सालों पहले मेरे पूर्वजों को इस्लामिक आतंकवादियों और जेहादियों ने कश्मीर से 1990 मे भगाया था। हां मै एक कश्मीरी पंडित हूँ। अब तो कश्मीर कैसा है कहना कठिन है। क्योंकि मै लगभग 20 वर्षों से वहाँ नहीं गया। इन वर्षों में मैं इसी तरह यहां वहां भागता फिर रहा हूँ। बाद में मोदी, शाह और योगी जैसे राजनेताओं ने देश की तमाम समस्याओं के साथ कश्मीर समस्या हल करके कश्मीर को अपराधियों से मुक्त करके कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बसाया था। इस तरह कश्मीर दुबारा स्वर्ग बन गया था और वहाँ से सरकार को उत्पादन, निर्माण और पर्यटन से अपार राजस्व प्राप्त होने लगा था। आज फिर मुझे उसी तरह अपना यह छोटा मोटा स्वर्ग (आज की परिस्थितियों के लिए यह जगह स्वर्ग ही थी।) उजड़ता और छिनता महसूस हो रहा था। रक्तपायियों के कब्जे में आने के बाद तो कुछ भी बचने की उम्मीद करना व्यर्थ था। मैने जब देखा कि सरकारी वाहन आग उगलता हुआ काफी दूर चला गया तो मै अपनी आवश्यक वस्तुओं से भरी और एक दूसरे मे बंधी गाड़ियों के काफिले को लेकर समुद्र की ओर चल पड़ा। क्योंकि इतनी देर मे रक्तपायियों की भीड़ मेरे उस आवास तक पहुंच गयी थी। मैने सरकारी वाहन आकर्षित न हो इस लिए फायरिंग बंद कर दिया था जिसका लाभ उठाकर वे भूखे प्यासे या संक्रमित पिशाच बन चुके लोग मेरे आवास स्थल मे दाखिल हो गए और सबकुछ तहस नहस करने लगे थे। चांदनी में मैने देखा कि पानी और वनस्पतियों को देखते ही वे एकदम टूट पड़े और सबकुछ नष्ट करते हुए मारा-मारी करने लगे। मेरा 3 वाहनो का काफिला बढ़ने लगा लेकिन वे मेरे आवास मे उपलब्ध पानी और वनस्पतियों पर उलझे रहे। मैने फिर रुककर उनपर फायर करके उनको मारना शुरू किया। तभी ऊपर चट्टान से कूद कर एक भीमकाय आकृति आयी और उसने मुंह से नीला बैगनी धुंआ फूंककर आस पास के पिशाचों को मार दिया और खुद पानी व वनस्पतियों को खाने बरबाद करने लगा। पानी पीते ही वे सब मुंह ऊपर उठाकर ऐसी चैन की सांस ले रहे थे जैसे अमृत पा गए हों। मैने उस धुंए वाले पिशाच पर भी कई फायर किए लेकिन वह मरने या घायल होने की बजाय गुर्राकर मेरी तरफ घूमा, उसके मुंह से धुंआ निकल रहा था और जबड़े पर खून लगा था। उसने मुझपर धुंआ उगला तो मै बचाव करते हुए गाड़ी बढ़ाकर भागने लगा। शायद मेरा पिछला ट्रक उसके पानी की बौछार जैसे धुंए के चपेट में आ गया था लेकिन मै अंदाजा नहीं लगा सकता था और न ही मेरे पास रुककर देखने के लिए समय था कि उस ट्रक पर कोई दुष्प्रभाव या नुकसान हुआ था। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि यह क्या था और इसके धुंए की बौछार से किस तरह का नुकसान हो सकता था या हुआ था ? शायद यह उसी संक्रमण का शिकार था जिसके बारे में डाक्टर शयनांक बात कर रहा था। मैने अपने वाहनों को तेजी से भगाया क्योंकि वह पिशाच तेजी से आगे बढ़ रहा था और इन सब शोरगुल से आकर्षित होकर सरकारी वाहन फायर करता हुआ इधर ही आ रहा था। उस वाहन ने रोशनियों की बरसात करके सभी पिशाचों को समाप्त कर दिया और फिर मेरे वाहनों के काफिले के पीछे भागते धुंआ उगलते पिशाच का पीछा करते हुए मेरे पीछे आने लगा।
मेरे वाहनों के काफिले में सबसे आगे एक ट्रक था। जिसके ऊपर मैने नौका बांध रखी थी और पीछे पानी भरा एक टैंकर और फिर खाद्य पदार्थों और वनस्पतियों से भरा एक ट्रक था। वह अजीब आकृति दौड़ते हुए मेरे पिछले ट्रक के बेहद करीब आ गयी थी और जब मैने अगले मोड़ पर वाहनों को मोड़ा तो वह पिशाच उछलकर पिछले ट्रक पर चढ़ गया। अब मै तेजी से वाहन भगाते हुए उजड़ा शहर छोड़कर खुले समुद्री मैदान में आ गया था और मेरा वाहन बेहद तेजी से समुद्र की ओर बढ़ रहा था। सरकारी वाहन अब तक काफी तीव्र गति से बढ़ते हुए मेरे पिछले वाहन के बगल से होकर टैंकर के साथ चलते हुए उस पिशाच पर रोशनियों वाली फायरिंग कर रहा था। वह पिशाच कुछ देर तक बचते हुए ट्रक मे घुसने का प्रयास करता रहा लेकिन फिर सरकारी वाहन पर कूदा और उससे निकली रोशनियों की बरसात ने उसे नहला कर मार दिया। मैने देखा कि वह पिशाच सरकारी वाहन पर कूदने के लिए मेरे ट्रक से उछला और उसका शरीर फायरिंग की रोशनियों से मृत होकर हवा में ही धीरे धीरे तैरता हुआ सरकारी वाहन पर जा गिरा। उसने उछलते हुए सरकारी वाहन पर नीला बैगनी धुंआ उगला था।पानी की बौछार की तरह तेज गति से जाकर वह धुंआ सरकारी वाहन से टकराया था और वाहन का अगला हिस्सा पिघलने लगा था। वाहन क्षतिग्रस्त होकर उलट गया और आगे बैठे चार लोग चीखते हुए उतरकर भागे। वह मृत पिशाच उस पिघलते वाहन पर गिरकर शायद उन लोगो पर गिरा था। वाहन के उलटने से उन लोगों के सुरक्षित कपड़े फट गए थे और वे भी उस नीले धुंए मे नहाकर चीख रहे थे। उस धुंए के साथ उनका शरीर धुंआ बनकर उड़ रहा था। हाथ, चेहरा जो भी उस जहरीले धुंएं मे डूबा उनके शरीर के उस हिस्से का सारा मांस धुंए के साथ ही उड़ गया और वे चीखते हुए एंठकर मर गए। उनका अर्धकंकाल मे बदला शरीर अकड़ गया। मैंने यह सब देखकर अपने वाहन की गति और तेज कर दिया क्योंकि पकड़े जाने पर अब मै सरकार के निशाने पर आ सकता था। जिसपर उन पिशाचों को पालने का या समुद्र के आतंक से संबंधित होने का आरोप लगाकर कुछ भी किया जा सकता था। तब तक गाड़ी के पिछले हिस्से से टिड्डी दल की तरह निकलते सैनिकों ने उन मृत लोगों पर कोई पीला धुंआ छिड़कना शुरू कर दिया। मैने अनुमान लगाया कि यह उनको बचाने या निःसंक्रमित करने के लिए होगा। फिर उनमे से कुछ लोगों ने मेरे वाहनों पर फायर किया। जिससे मेरा पिछला ट्रक और टैंकर आग का गोला बन गए। पता नहीं किस तरह का फायर वे कर रहे थे। तब तक मेरा ट्रक समुद्र में घुसने लगा था। मैने ट्रक के छत पर पहुंच कर नौका को काटकर खोला और उसमे छुपकर बैठ गया। आग की लपटों सहित पिछले दोनों वाहनों के साथ मेरे तीनों वाहन पानी में घुसते जा रहे थे और मेरी नौका ट्रक से फिसलकर पानी में उतर गई थी। आग और धुंएं की आड़ में मै अपनी नौका तैराता हुआ उन वाहनों से काफी दूर बीच समुद्र में पहुंच गया। तभी जलता टैंकर फूटा और पानी तथा जलते वाहन के टुकड़े दूर तक उछले। फिर लगातार तीन धमाके और हुए। मैने देखा कि दूर किनारे पर वे सरकारी सैनिक खड़े होकर जलते डूबते वाहनों को देख रहे थे। धमाके के दबाव से उत्पन्न लहरें और हवा के थपेड़ों ने मेरी नौका डांवाडोल कर दिया था। चांदनी मे लहरों पर डगमगाती मेरी नौका मे बैठकर भी मै पानी में चंद्र ज्योत्स्ना के घुलते सौंदर्य पर मंत्रमुग्ध हो गया था। धरती पर अब ऐसा दृश्य अकल्पनीय हो गया था। मैने देखा कि किनारे से सैनिकों ने भी मुझे देखा और मुझपर फायर करने लगे। शायद वे टेलीस्कोप से देखकर फायर कर रहे थे क्योंकि बहुत दूर होने पर भी मैं उनके निशाने पर आ रहा था। वे मुझे अब बहुत छोटे दिख रहे थे लेकिन उन से निकलती रोशनी की लकीरें मुझे छूना चाहती थीं। तभी मुझे कुछ अजीब सा शोर सुनाई दिया और मैने देखा कि समुद्र के किनारे पानी बवंडर की तरह ऊपर उठ रहा था। फिर तेजी से तूफ़ान उठा। अब मै किनारे पर सैनिकों को देख नहीं सकता था लेकिन समझ सकता था कि उनके साथ क्या हो सकता है। फिर सभी सैनिक आसमान में पानी के बवंडर मे नाचते नजर आए। वे चीख रहे थे। उसके बाद पानी के बीच से कड़कती बिजली निकली और सभी सैनिक उसकी चपेट में आकर भुनने लगे। बिजली की कड़क मे उनकी चीखें गुम हो गईं और मेरे चारो तरफ उनके मृत शरीरों की बरसात होने लगी। मै भय से कांप रहा था। बवंडर का पानी तो कम होते हुए नीचे बैठ रहा था लेकिन मेरी नौका के चारो तरफ का पानी शायद उबल रहा था। उसमे उबाल आ रहा था, बुलबुले उठ रहे थे लेकिन भाप नहीं निकल रही थी। मेरी नौका उबलते बुलबुलेदार पानी में डांवाडोल हो रही थी और मै उसमे चारो ओर घूमता संतुलन बनाता हुआ भयभीत सा पानी में देख रहा था कि अब मेरा जाने क्या होगा। पानी गर्म तो नहीं है यह जानने के लिए मैने डरते डरते पानी को उंगली से छुआ। आश्चर्य जनक रूप से पानी ठंडा था पर मेरा हाथ पानी की लहरों में डूबा और मुझे लगा कि किसी ने मुझे पकड़ लिया है। पानी में मेरा हाथ खिंचने लगा और मै नौका मे जोर लगाकर उठने का प्रयास करने लगा। तभी तेज धमाके के साथ मेरी नौका कई टुकड़ों में टूट गई और मै पानी में औंधे मुंह जा गिरा। मुझे लगा कि कोई मेरा हाथ अभी भी पकड़े हुए है और मुझे खींचकर समुद्र के अंदर ले जा रहा है। कुछ देर बचने और छूटने के लिए संघर्ष के बाद मै बेहोश होने लगा और तभी मैने कुछ देखा। पर यह नहीं जान सका कि वह क्या है। फिर धीरे धीरे मै बेहोश हो गया। शायद यह मेरा अंत था, शायद मै मर रहा था। । मैने ईश्वर को मन ही मन प्रणाम किया और फिर मेरा मन निःचेतना के गहन अंधकार में डूब गया।
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