Wednesday, January 29, 2020

देवी भाग 1

डान साहब की आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था। उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए घुस गया। थांगल उसे रोकने के लिए कहता हुआ सीढ़ियों पर लड़खड़ाया और नीचे गिर कर बेहोश हो गया। मंदिर में डान साहब पागलों की तरह भटकता हुआ देवी की प्रतिमा के समक्ष पहुंचा। अष्टधातु की प्रतिमा अत्यंत सुंदर व दिव्य थी। डान साहब को लगा जैसे कोई उसे पकड़ कर उस प्रतिमा के समक्ष सिर झुकाने को विवश कर रहा है। लेकिन उसने आंख मूदकर जी कड़ा करके हाथ बढ़ाया और प्रतिमा को उठाकर बाहर भागा। अंधेरी रात में तत्काल घनघोर विद्युत कड़की और सभी अंग्रेज भय से जड़ हो गए।बिजली की चमक मे उन्होने आसमान में बहुत विशाल पक्षी को उड़ते देखा जिसकी आंखें आग जैसी दहक रही थीं और चोंच मे विशाल सांप को पकड़ रखा था। जिसकी फुसकार से पूरा वातावरण भयावना हो रहा था। सब डर गए। डान साहब तेजी से मंदिर के बाहर निकला और सबको वापस चलने का इशारा करते हुए भागा। सब मंदिर के साथ बनी ऊबड़ खाबड़ सीढ़ी जैसे रास्ते से अपने कैंप की ओर दौड़ पड़े। तेज हवा चलने लगी थी और कोई पक्षी बार बार अपने पंख फड़फड़ाते हुए उनके ऊपर आसमान में उड़ रहा था जो थोड़ी थोड़ी देर मे बार बार बहुत तेज आवाज में बोल रहा था। जिसके साथ ही विषधर सांप की भयंकर फुसफुसाहट गूंज रही थी। टार्च की रोशनी मे अंग्रेज भागते हुए अपने डेरे पर पहुंचे तो देखा कि उनके कई टेंट जल रहे हैं। सब आतंकित हो गए। डान साहब तेजी से अपने निजी टेंट की ओर लपका जिसमे उसकी बीबी मार्ग्रेट सो रही थी। अचानक मार्ग्रेट की तेज चीख गूंज उठी और टेंट के दरवाजे से वही विशाल पक्षी उड़ा, डान साहब भय से चीखकर गिर पड़ा।जलते टेंटों की आग की रोशनी में डान साहब ने देखा कि उस पक्षी ने अपनी चोंच मे एक सांप को पकड़ रखा था, जिसने ऊपर उठते हुए अपने फन से आग उगल कर डान साहब के टेंट में भी आग लगा दिया। तब कुछ अंग्रेजों ने उस पक्षी को निशाना साधते हुए गोली चला दिया। लेकिन उसपर कुछ असर नहीं हुआ और वैसे ही भयानक आवाज में शोरमचाता हुआ फुफकारते सांप को लेकर अंधेरे में उड़ गया। 
डान साहब तेजी से मार्ग्रेट को पुकारता हुआ टेंट में दाखिल हुआ। उसने देखा कि जलते टेंट में अभी भी आग मार्ग्रेट के बिस्तर तक नहीं पहुंची है और वह बेसुध सो रही है। देवी की मूर्ति को एक तरफ फेंककर डान साहब ने मार्ग्रेट को उठाया और जलते टेंट से बाहर ले आया। तबतक सारे टेंट जलकर खाक हो चुके थे। बाहर आते ही पादरी भी पास आ गया और डान साहब की बाहों में मार्ग्रेट को ध्यान से देखते हुए बोला '' उफ यह तो मर चुकी है '' '' नो। '' डान साहब चीखा और उसने ध्यान से मार्ग्रेट को देखा। उसका शरीर नीला पड़ गया था। सर्पदंश। कहीं उसी सांप ने तो नहीं जिसे पक्षी अपने चोंच मे पकड़कर उड़ रहा था और जिसने टेंटों में आग लगाया था। 
तबतक शोरगुल और गोलियों की आवाज से जागकर ग्रामीण भी मशालें लिए हुए अपने मुखिया टेकेंद्रजीत के नेतृत्व में लाठी, भाले, तलवार, धनुष आदि लिए हुए वहाँ आ पहुंचे। तब तक केवल कुछ जलते टेंटों के अवशेष ही रह गए थे जो धीमे धीमे बुझते हुए जल रहे थे। 
"क्या हो रहा है यहाँ? इतना शोरगुल और लड़ाई झगड़ा कैसा?" मुखिया टेकेंद्रजीत ने डान साहब को वहां उसकी बाहों में थमी निर्जीव मार्ग्रेट को घूरते हुए पूछा। "कुछ नहीं! टुम सब यहाँ से भाग जाओ।" डान साहब गुर्राया। इसपर मुखिया के साथ आए सभी ग्रामीण योद्धाओं ने अंग्रेजों पर अपने अपने तीर धनुष, भाले - तलवार आदि तान लिए। तब पादरी ने डान साहब को आंखों से इशारा करता हुआ उसे मार्ग्रेट को जीप में रखने को कहा और खुद ग्रामीणों से बोला" हमपर मुसीबट आया है। हमारे साहब की बीबी को सांप ने काट लिया है और हमारे सारे टेंट आग में जल गए।" तब तक सिर पर कपड़ा बांधे पुजारी थांगल भी वहां आ गया और आते ही चीखकर कहा "तुम फिरंगियों ने हमारी देवी की प्रतिमा को चुराया है और अब तुम पर देवी का कहर टूटा है। तुम सब मारे जाओगे। कोई नहीं बचेगा। "
यह सुनते ही गांव वाले और मुखिया क्रोध से कांपने लगे और मुखिया सब अंग्रेजों को मारने का आदेश देने ही वाला था कि पुजारी उसे रोकते हुए बोला" मुखिया जी! इन्हें मारने की जरुरत नहीं, ये सब देवी के प्रकोप से स्वतः मारे जाएंगे। बस इनसे हमें हमारी देवी की प्रतिमा वापस चाहिए और ये तत्काल यहाँ से भाग जाएं। अन्यथा हम इन्हें मार देंगे।" तब तक डान साहब मार्ग्रेट के मृत शरीर को जीप में रखकर वापस आ गया। वह बहुत दुखी था क्योंकि उसके दल मे कोई डाक्टर नहीं था और अब तक तो उसकी पत्नी निःसंदेह मर चुकी थी। उसने आंसुओं से भीगे हुए स्वर मे कहा" हमने गलट किया। हम टुम्हारा अपराधी है। हम टुम्हारा देवी को वापस दे देगा और यहाँ से हमेशा के लिए चला जाएगा। पर हम लड़ाई झगड़ा नहीं चाहता। हमारा बीबी मर गया। उसे सांप ने काट लिया है। उसने हमे यह सब करने से रोका था, पर हम नही माना।" और डान साहब रोने लगा। 
यह सुनकर पुजारी थांगल बोला" हमारी देवी मां शक्ति की प्रतिमा को वापस दे दो गोरे फिरंगी। तुम पर देवी का कहर शुरू हो गया है। पर हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हारी मेम को जीवित कर देंगे। लेकिन उसके तुरंत बाद तुम यहाँ से भाग जाओगे। "
पादरी ने गुस्से से विरोध में कुछ कहना चाहा तो डान साहब ने उसे रोक कर पुजारी थांगल से सहमति मे सिर झुकाकर बोला" जैसा टुम कहो पुजारी जी"
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ब्रिटिश भारत। मणिपुर के हरे भरे प्रदेश में बसा एक गांव विष्णुपुर। अंग्रेज़ों ने मणिपुर को कब्जे में कर लिया था और धीरे धीरे अपना प्रशासन आदि फैला रहे थे, व्यवस्थित कर रहे थे। अपना प्रशासन फैलाने के साथ ही साथ अंग्रेज अपनी समझ से तुच्छ व पिछड़े हुए मणिपुरी लोगों मे इसाई धर्म का प्रचार भी करने का प्रयास कर रहे थे। 
इसी सिलसिले में विष्णुपुर गांव में भी इसाई धर्म का प्रचार करने के लिए डान साहब अपने लाव लश्कर के साथ आया। उसकी टीम में कुछ बग्घी गाड़ियां, घोड़े - खच्चर, 20 - 30 सैनिक, कुछ औरतें और पादरी थे। वे सब पूरे गांव में घूमते घामते गांव के बाहर मैदान में नदी और झरने के सुंदर दृश्यों के बीच डेरा डाला। पूरा गांव उन्हें अचरज, घृणा और क्रोध से देख रहा था। कुछ देर बाद डान साहब के निर्देश पर पादरी अपने कुछ साथियों और गोरी औरतों के साथ गांव वालों से मिलने गया। जब उसने गांव वालों से बात करना चाहा तो लोग उसे हिकारत से देखकर भाग खड़े हुए। लोगों ने उसकी बातों मे उत्सुकता दिखाने के बजाय घृणा और भय प्रकट किया और उससे दूर भाग गए। पादरी "टुम हमसे बाट करेगा टो यीशू टुमारा पाप माफ कर देगा" कहता हुआ पूरा दिन गांव भर मे घूमता रहा पर उसकी दाल नहीं गली। हां कुछ मनचले लोग उसकी गोरी औरतों मे जरूर दिलचस्पी लेते दिख रहे थे पर जब पादरी या उसके साथ की गोरी औरतें उनकों पुकारतीं तो वे भाग जाते थे। सब उन्हें अजीब सी निगाहों से देख रहे थे। 
अंत में डान साहब ने पादरी की असफलता से परेशान होकर गांव के मुखिया टेकेंद्रजीत से बात करने का निश्चय किया। अपने साथ दो सैनिकों, रेडियो और अन्य आकर्षक वस्तुओं कपड़ों को लेकर डान साहब उसी दिन शाम को मुखिया के घर गया। घर परंपरागत तरीके से बांस इत्यादि से बना था और बेहद सुंदर था। गांव के सभी घर ऐसे ही बांसों और लकड़ियों इत्यादि से बने थे। मुखिया ने डान साहब का स्वागत करते हुए सम्मान से उसे बैठने को आसन दिया और खुद उसके सामने ऊंचे आसन पर बैठकर उससे बातचीत करने लगा। डान साहब ने मुखिया को रेडियो प्रदान किया और बोला "हम टुमारे लोगों की भलाई चाहता है। हम तुम लोंगों को अच्छी चीज़ें और सुविधाएं देगा।" उसकी बात सुनकर मुखिया के घर के और आस-पड़ोस के बच्चे जो कौतूहल वश वहां इकट्ठे हो गए थे, हंसने लगे। मुखिया टेकेंद्रजीत ने बच्चों को डाँटकर चुप कराया हालाँकि वह भी बमुश्किल अपनी हंसी रोक पा रहा था। पर संस्कारवश उसने अपनी हंसीं दबा ली। डान साहब ने मुखिया से कहा " टुमारा गांव बहुत सुंदर है।टुम हमारी बाट मानेगा टो हम टुम लोगों को बहुत अच्छी चीज़ें देगा और ऐसा कहकर जान साहब ने मुखिया के हाथ से रेडियो ले लिया जिसे वह बहुत आश्चर्य से उलट पलट कर देख रहा था। फिर डान साहब ने एक बटन घुमाया और कुछ खरखराहट के साथ रेडियो से आवाज आने लगी।सब लोग डरकर पीछे हट गए सिवाय मुखिया के जो अब और आश्चर्य से डान साहब के हाथ में थमे उस डब्बे को देख रहा था जो बोल रहा था।डान साहब ने कहा "डरो मट!यह रेडियो है।इसमें गाने समाचार आदि सुन सकटे हो।" और उसने कई स्टेशन बदलकर गानें तथा तमाम कार्यक्रम सुनाए। फिर वह बाक़ी तमाम आकर्षक वस्तुएं, खिलौने इत्यादि और रेडियो मुखिया को देकर और उपयोग करने का तरीका बताकर बाद में आने का वादा करके चला गया। तबतक अंधेरा घिरने लगा था। 
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अगले दिन डान साहब को पादरी ने प्रातः ही जगाया। डान साहब भुनभुनाते हुए उठा और बोला "क्या बाट है? टुम हमको सुबह सुबह क्यों डिस्टर्ब कर रहा है? जबाब मे पादरी ने अपने कानों पर हाथ लगाकर डान साहब को गांव से आती वाद्य यंत्रों की ध्वनि को सुनने का इशारा किया और अपने साथ आने को कहा। डान साहब पलभर मे तैयार होकर अपने दो सहयोगियों को लेकर पादरी के साथ ध्वनि संगीत की दिशा में चल पड़ा। संगीत की आवाज गांव से आ रही थी। गांव में पहुंच कर देखा कि हर एक घर से युवक, बच्चे व औरतें परंपरागत वेशभूषा में निकलकर पूजा का थाल व सामग्री लिए कहीं जा रहेथे। डान साहब ने चुपचाप सबको अपने पीछे आने का इशारा किया और उस समूह के पीछे पीछे जाने लगा। उनके पीछे चलते हुए डान साहब और पादरी गांव के पीछे काफी दूर एक पहाड़ी झुरमुट में बने प्राचीन मंदिर तक जा पहुंचे। सब गांव वासी मंदिर के बाहर मैदान में इकट्ठे हो गए और पूजा प्रारंभ हो गई। मंदिर के अंदर से पुजारी का कंठस्वर गूंज उठा। वह मंत्रोच्चार कर रहा था और कुछ लोग वाद्य यंत्र बजा रहे थे। लगभग घंटेभर मंत्रों और वाद्य यंत्रों की आवाज से वातावरण गूंजता रहा। डान साहब को भी कुछ अलौकिक सा एहसास हो रहा था पर पादरी के कारण उसने अपनी अकड़ बनाए रखा। फिर मुख्य पूजा कार्यक्रम समाप्त हो गया और जनसमुदाय नृत्य करने लगा।परंपरागत मणिपुरी नृत्य ने उस सुरम्य घाटों में अलौकिक छटा उपस्थित कर दी।यह सब देखकर डान साहब अभिभूत हो गया। अंत में प्रसाद वितरण किया गया और सब धीरे-धीरे वापस जाने लगे।तभी मुखिया ने दूर खड़े डान साहब और उसके साथियों को देखा तथा एक व्यक्ति को इशारा किया तो उसने डान साहब व उसके साथियों को भी प्रसाद दिया। दिव्य सुगंधित और अत्यंत स्वादिष्ट प्रसाद खाकर वे फ़िरंगी अभिभूत हो उठे।फिर वे सब मुखिया के साथ साथ वापस लौटने लगे।जान साहब ने पूछा" यह टुम सब क्या करता?" मुखिया ने साथ चल रहे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए हंसते हुए कहा "यह देवी मां शक्ति का मंदिर है। हमलोग प्रत्येक शुक्रवार को इनकी आराधना करतें हैं। इनकी कृपा से हम सब गांववाले प्रसन्न और खुशहाल हैं।" जान साहब बोला "ओह आइ सी! टुम सब देवी मां की पूजा करटा है।" मुखिया-"हां" और फिर मुखिया ने रास्ते में खड़े माला तिलक लगाए,गेरूवा वस्त्र पहने चोटीधारी व्यक्ति की ओर इशारा करके, जो उन्हीं की ओर अजीब सी भेदती नजरों से देख रहा था, कहा"यह हैं मंदिर के पुजारी श्री थांगल।हमारे गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति। "उस व्यक्ति की ओर और उसकी दमकती आंखों को देखकर डान साहब को झुरझुरी और रोमांच हो आया। पुजारी उनसे कुछ नहीं बोला।मुखिया ने आगे बढ़कर उसका चरण स्पर्श किया तो वह उसे आशीर्वाद देकर तेजी से मंदिर की ओर चला गया। मुखिया अपने कुछ आदमियों जो लाठी, तलवार व भालों से लैस थे और डान साहब के साथ वापस गांव में अपने घर की ओर चला। डान साहब भी मुखिया से विदा लेकर अपने डेरे की ओर कूच किया। 
डेरे पर पहुंचा तो वहां अंग्रेजों का एक दल और आया था। उसमें डान साहब की गोरी बीबी और कुछ उच्च अधिकारी थे जो उच्च पादरी का संदेश लाए थे। संदेश में डान साहब की ड्यूटी अर्थात गांव वालों का ईसाई में धर्मांतरण के बारे में निर्देश और प्रगति के बारे मे पूछा गया था और उसे खूब खरी खोटी सुनाई गई थी। उसको पहले के कई अभियानों में मिली असफ़लता और उसके द्वारा ब्रिटिश सरकार के फूंके गए अपार धन के बारे में चेतावनी देते हुए कहा गया था कि अगर अबकी बार वह असफल होता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संदेश में बताया गया था कि यह काम अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस गांव के बाद उसे आस पास के सब गांवों का जल्द से जल्द धर्मांतरण करना है। इसके लिए चाहे जो करना पड़े और जो भी रुकावट हो उसे हटा दे।संदेश पढ़कर डान साहब पसीने पसीने हो उठा।उसने पादरी को भी संदेश पढ़ने को दिया। पादरी भी परेशान हो गया। 
यह दल इंफाल से ब्रिटिश प्रशासन और इंफाल के मुख्य चर्च की ओर से आया था। अब तक सुबह के 10 -11 बज चुके थे और सुनहरी धूप हर तरफ फैल रही थी। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट को चूमते लिपटाते अपने निजी टेंट में जाते हुए पादरी से बोला"आज शाम को हम मुखिया से बाट करेगा।पूरी तैयारी से चलना।"
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मणिपुर का नाम यों ही मणिपुर नहीं रखा गया था। यह प्रदेश अत्यंत हरा भरा, सुंदर और मनोरम है। यहाँ चार बेहद सुंदर डेल्टा हैं। और भी तमाम झरने, घाटियों व हरीतिमा से यह प्रदेश विभूषित है। अंग्रेज़ों की टोली यहाँ पर जैसे स्वर्ग में आ गई हो और वे पार्टी करने में व्यस्त हो गए। कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। पादरी तैयार होकर अपने साथ दो सुंदर गोरियों को भी ले चला जो नन थीं। उसे देखकर डान साहब ने पार्टी रोक दिया और तत्काल तैयार होकर अपनी गोरी बीबी मार्ग्रेट के साथ बग्घी गाड़ी में चल दिया। साथ में दो चार पैदल सैनिक और दो घुड़सवार भी थे। पादरी अलग घोड़े पर सवार था और दोनों नन भी एक अलग बग्घी में थीं। गोरों का काफिला पतले रास्ते पर घने जंगल जैसे बगीचे से दौड़ता हुआ मुखिया के घर के सामने जाकर रुका। उस दिन वहां ढेर सारे लोग पुजारी थांगल के साथ आए थे। पुजारी मुखिया टेकेंद्रजीत से कुछ बात कर रहा था और गोरों को देखते ही मुखिया से विदा लेकर अपने लोगों के साथ चला गया। पुजारी को चरण स्पर्श कर विदा करने के बाद मुखिया गोरों की ओर मुड़ा। जान साहब अपने लाव लश्कर को लेकर मुखिया के घर के सामने द्वार पर बैठ गया।गांव वाले कुछ दूर होकर कौतूहल से इन्हें देख रहे थे। गांव की स्त्रियाँ गोरी मेमों को देखकर नाक भौं सिकोड़ रही थीं-कैसे कपड़े पहनती हैं, कितनी बेशर्म हैं,हमारे मुखिया जी से कैसे नयन मटक्का कर रही हैं इत्यादि। फिर डान साहब मुखिया से बात करने लगा। बातों बातों में उसने अपने धर्म और ईसा मसीह के बारें में बताया। उसने कहा अगर मुखिया अपने लोगों के साथ इसाई धर्म अपनाता है तो उसे बहुत सुविधाएं दी जाएंगी और यीशू उनके सारे पाप क्षमा कर देंगे। मुखिया क्रोध से आग बबूला हो गया पर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला- "पहली बात तो हमने क़ोई पाप नहीं किया है गोरा साहब। दूसरी आप के धर्म के बारें में हम कुछ जानते नहीं हैं। " डान साहब और पादरी को मुखिया से धर्म परिवर्तन की बात पर भड़क उठने की उम्मीद थी ।उन्हें किसी जिज्ञासु प्रश्न की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। इस प्रश्न ने डान साहब और पादरी का उत्साह बढ़ा दिया।उन्हें लगा कि उनका काम हो जाएगा। पादरी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा " हमारा धर्म बहुत अच्छा है और हमारे यीशू सबके पापों को क्षमा कर देते हैं। वह टुमारे पापों को भी क्षमा कर देंगे। " मुखिया -"तुम्हारे यीशु क्या कहते हैं? तुम्हारे धर्म की क्या शिक्षाएं हैं?" पादरी-" हमारा इसाई धर्म चीज शिक्षाएं हैं -झूठ मत बोलो। व्यभिचार मत करो। पाप मत करो। हिंसा मत करो। कोई तुमको एक थप्पड़ मारे तो उसे क्षमा कर दो और अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो। यीशु उसका ह्रदय परिवर्तन कर देंगे।" यह सब सुनकर मुखिया मन ही मन हंस पड़ा। और उसने उनकी शिक्षाओं को तत्काल परखने का निर्णय लिया। " तो हमारे पुजारी जी की शंका सही थी। तुम्हारा यहां आने का प्रमुख उद्देश्य हमारा धर्म भ्रष्ट करना है। " मुखिया ने क्रोध से डान साहब और पादरी को देखते हुए कहा। पादरी और डान साहब को काटो तो जैसे खून ही नहीं। वे मुखिया की इस बात पर चौंक गए। डान साहब और पादरी ने सफाई देते हुए कुछ कहना चाहा पर मुखिया ने उन्हें झिड़क दिया और पादरी के गाल पर एक चाटा मार दिया। इस पर डान साहब आग बबूला हो गया और पादरी पहलें तो सन्न रह गया फिर तुरंत ही संभल कर वह भी क्रोध से जलने लगा। डान साहब ने अपनी पिस्तौल निकालने के लिए कोट मे हाथ डाला पर मार्ग्रेट ने उसे पकड़ कर अपने आस पास देखने का इशारा किया तो उसने चारो तरफ देखा और स्थिति को भांप कर मीठी चुपड़ी बातें करने लगा। क्योंकि चारो तरफ से मुखिया के आदमियों ने भाला, तलवार ,धनुष ,छुरियों इत्यादि से सभी अंग्रेजों को घेर रखा था और वे संख्या में उनसे ज्यादा थे।पादरी भी क्रोध मे आकर जोर जोर से कह रहा था -"टुम पापी आदमी ,टुम अपने पापों का दंड भुगतोगे। हम टुमको क्षमा करता है। "हालाँकि उसके हाव भाव से लग रहा था कि वह मुखिया से अपने थप्पड़ का बदला लेना चाहता है, पर डान साहब की तरह वह भी विवश था। डान साहब और पादरी के तमाम तरह से बहुत प्रयास करने के बाद भी उनकी एक नहीं चली। फिर थक हार कर वे लौट गए।रात होने लगी थी,अंधेरा छा रहा था और आज शांत शीतल हवा वातावरण को कुछ मनहूस व भयावना बना रही थी। यह मनहूसियत डान साहब और पादरी के अंदर से निकलकर वातावरण में छा रही थी। अपने डेरे पर पहुंचकर डान साहब और पादरी क्रोध से सब कुछ इधर उधर फेंक रहे थे। इससे पहले यही शीतल हवा वातावरण को अद्भुत मादकता से भर देती थी पर आज कुछ अलग ही बात थी।अंधेरे में डूबते वृक्ष और लता झुरमुट जैसे खामोशी से होनेवाली किसी दुर्घटना की पूर्वसूचना दे रहे थे। सियार और कुत्तों के रोने की आवाजों से वातावरण और भयावना हो रहा था। झरने की कल कल की आवाज और रात्रिचर पक्षियों की आवाजें तथा फड़फड़ाहट वातावरण को कुछ अजीब सा भयानक बना रही थीं। प्रकृति यह सब संकेत अनायास ही नहीं दे रही थी। अंग्रेजों के खेमें में लालटेनों और गैस की रोशनी में डान साहब, पादरी और डान की बीबी तथा आए हुए उच्चाधिकारी कुछ चर्चा कर रहे थे। डान साहब बेहद परेशान था,पादरी भी चिंतित था।आए हुए दल के उच्चाधिकारी डान साहब को धमका रहे थे और उसकी नाकामयाबियों पर कोस रहे थे। फिर उच्चाधिकारी दल घोड़े बग्घियों मे सवार होकर वापस चल दिया। साथ में कुछ सैनिक भी थे। डान साहब की बीबी मार्ग्रेट ने डान साहब के साथ कैंप पर ही रुकने का फ़ैसला किया।उच्चाधिकारियों के दल के जाने के बाद चिंतित और परेशान डान साहब व पादरी कुछ चर्चा करने लगे। काफी देर विचारविमर्श करके उन्होंने यह जान लिया कि गांव वाले अपने पुजारी और देवी मां शक्ति के कारण ही इसाई नही बन रहे हैं। फिर उन्होंने कुटिल योजना बनाई और अपने अपने टेंटों मे सोने चले गए। डान साहब अपनी बीबी मार्ग्रेट के पास अपने निजी टेंट में चला गया। डान साहब का टेंट बाकी के चार टेंटों के बीच में बना था।
अगले दिन सुबह डान साहब पादरी और अपनी बीबी को लेकर गांव में घुमने निकले।उन्होंने देखा कि गांव के लोग प्रातः उठकर अपने खेतों में काम करने जाते हैं। कुछ लोग अपने गाय ,भैंस आदि पशुओं को चराने ले जाते हैं। अंग्रेजों के टेंटों के आसपास भी कुछ लोग जानवर चराने आए थे। गांव में घर बांस,घास फूस व मिट्टी खपरैल आदि से बने थे लेकिन देवी मां का मंदिर पत्थरों को काटकर और पत्थरों से बहुत अच्छे ढंग से बना था।डान साहब और पादरी कोइसपर बहुत आश्चर्य हुआ। अपनी बीबी और पादरी के साथ डान साहब दिन भर गांव की गलियों, पतले रास्तों ,कुटीर उद्योग कर्मियों के घरों के आस पास और खेतों की मेड़ों पर दिन भर घूमता रहा। इस तरह शाम तक अपनी योजनाओं के लिए जानकारी लेकर वे सब टेंट पर वापस आ गए। दिन भर गांव में घूमते समय पादरी और डान साहब ने अपने पिछली रात के कुटिल विचार को योजनाबद्ध कर लिया था। योजना के लिए डान साहब ने और सैनिकों की मांग पिछली रात को वापस जाने वाले दल से पहले ही कर लिया था। दल में डान साहब और पादरी ने खा पीकर सबको तैयार रहने को कह रखा था। डान साहब की पत्नी कुछ भयभीत और सशंकित लग रही थी। पर डान साहब ने उसे समझा बुझाकर सोने को भेज दिया। रात के दस बजते-बजते लगभग 100 सैनिक एक जीप और कुछ घुड़सवारों के साथ डेरे पर आ गए।सब लोग चुपचाप खाने पीने और आराम करने में लग गए।
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रात को 12 बजे के करीब डान साहब अपने साथ 100 सैनिकों को लेकर पादरी के साथ डेरे से बाहर निकला। मार्ग्रेट ने डान साहब को मंदिर से छेड़छाड़ करने से मना किया पर उसने उसे टेंट में आराम करने को कहा और बाकी के लगभग 30 सैनिकों को वहाँ छोडकर चल दिया। सबके हाथों में बंदूकें, तलवारें और बत्तियां (टार्च) थीं। अंधेरी रात थी।ठंडी हवा से सिहरन और रोमांच हो रहा था। सब टार्च की रोशनी मे चुपचाप चलते हुए गांव के बाहर से मंदिर की तरफ बढ़े।डान साहब और पादरी ने दिन मे ही भ्रमण के दौरान यह मार्ग देखा था जो गांव के बाहर बाहर झरने और पहाड़ीके बीच पतले रास्ते के रूप में मंदिर तक जाता था। इस रास्ते से वे सब गांव वालों से बचकर चुपचाप बेहद सतर्कता और तेजी से आखे जा रहे थे। लगभग 30 मिनट चलनेके बाद वे सब मंदिर के बगल मे पहुंच गए। वह रास्ता मंदिर के पीछे से निकलकर बगल से होते हुए मंदिर के सामने नीचे मैदान में उतरता था।जहाँ दिन मे उन्होंने गांव वालों का धार्मिक उत्सव देखा था। वे सब अब मंदिर के बगल में ऊंचाई पर खड़े थे। बगल में एक ओर पहाड़ी और दूसरी ओर मंदिर के पीछे नदी के बीच में यह पतला रास्ता था। नदी झरने से होकर रास्ते के साथ साथ मंदिर के पीछे आकर दूसरी ओर चली जाती थी। डान साहब के इशारे पर सब चुपचाप नीचे उतरने लगे।उतरने वाला रास्ता ऊबड़ खाबड़ और पथरीला था।आधे सैनिक (50) नीचे उतर गए और आधे ऊपर रह गए। डान साहब उन लोगों के साथ नीचे उतरा और सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के मुख्य दरवाजे पर जा पहुंचा। वहाँ पहुँच कर उसे कुछ अलौकिक अहसास हुआ और जी में श्रद्धा से सिर झुकाने का विचार आया। पर उसे आज यह करना ही था। अन्यथा उसके उच्चाधिकारी उसकी अच्छी खबर लेंगे और हो सकता है नौकरी से भी निकाल दें। अतः उसने अपने दिमाग और ह्दय को झटककर, मजबूत करके मंदिर के दरवाजे को खटखटाया। कई बार खटखटाने पर पुजारी थांगल की आवाज आयी-"कौन है? " "मैं हूँ! डान साहब।" डान साहब ने कहा। पुजारी ने दरवाजा खोला और क्या बात है? पर डान साहब कुछ नहीं बोला। उसकी आंखों में जैसे किसी दुष्ट पापात्मा का साया था ।उसने पुजारी थांगल को एक ओर धकेला और मंदिर में धड़धड़ाते हुए प्रवेश कर गया। असावधान थांगल लड़खड़ाते हुए गेट से बाहर सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ नीचे जा गिरा और डान साहब को रोकने को कुछ कहकर बेहोश हो गया। तबतक पादरी भी सीढियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश कर गया। उसने टार्च की रोशनी में डान साहब को मंदिर में दौड़ते देखा। डान साहब अपने टार्च की रोशनी में चलते हुए मंदिर में एकदम अंदर चला गया। मंदिर बहुत भव्य और सुंदर था। डान साहब चलते चलते देवी मां की मूर्ति के सामने जा पहुंचा।.............................................. (सशेष)

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