Monday, July 27, 2020

चंद्रशेखर आजाद

 किसी अंग्रेज ने अपनी मां का इतना दूध नहीं पिया है कि मुझे गिरफ्तार कर सके- चंद्रशेखर आजाद। 
दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे। 
आजाद थे, आजाद हैं, आजाद रहेंगे।। - चंद्रशेखर आजाद 
आजादी मांगने से नहीं मिलती है। इसे अधिकारपूर्वक छीनना पड़ता है। - आजाद। 
आज़ाद का जन्म 1906 में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर भानवाड़ा गाँव मे हुआ था। बचपन से ही वे निडर और बहुत बहादुर थे। बचपन ले ही उन्हें तीरंदाजी का शौक़ था और वे अचूक निशाना लगाते थे। बचपन मे ही एक बार वे घर से भागकर एक व्यापारी के साथ मुंबई जा पहुँचे। वहाँ कुछ दिन इधर उधर काम करने के बाद वे वाराणसी जा पहुँचे और एक संस्कृत पाठशाला मे अध्ययन करने लगे। वहाँ एक दिन वे आज़ादी के लिए निकलने वाले जुलूस मे शामिल हुए और उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत ले जाया गया। जज ने उनसे नाम और पता पूछा तो उन्होंने अपना नाम आजाद,पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना घर बताया। जज ने उन्हें बेंतों से पिटाई की सदा सुनाई ,हर मार के साथ उनके मुँह से भारत माता की जय का नारा निकलता। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया।इससे क्रांतिकारियों मे उनकी ख्याति फैल गई और वे क्रांतिकारियों से जुड़ गए। एक सार्वजनिक सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि "अब कोई अंग्रेज़ मुझे पकड़ नहीं सकेगा , मैं आजाद हूँ और सदैव आजाद रहूँगा।" इसके बाद उनका नाम आजाद पड़ गया।
एक दिन उनके संगठन ने पुलिस कोतवाली में एक क्रांतिकारी पोस्टर चिपकाने की योजना बनाई पर इसे करने को कोई तैयार नहीं हुआ। तब आजाद ने यह करने का बीड़ा उठाया और पोस्टर को गोंद से अपनी पीठ पर चिपकाकर कोतवाली गए और सबके सामने दीवाल से पीठ टिकाकर पोस्टर चिपका दिया। फिर मौका देखकर चुपचाप चले गए। बाद में कोतवाली में हड़कंप मच गया पर कोई न जान सका कि यह कब और किसने किया? 
संगठन की गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता होने पर राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां और राजेंद्र लाहिड़ी आदि ने ट्रेन से सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई और काकोरी से पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए। स्टेशन से कुछ दूर बढ़ते ही जंजीर खींचकर रोका और उसमे जा रहा खजाना लूट लिया। 
इस घटना के महीने भर बाद आजाद के अलावा सभी पकड़े गए और सबको अंग्रेजी सरकार ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद आजाद झांसी के पास एक गांव धीमारपुर मे एक हनुमान मंदिर में सन्यासी के रूप में रहने लगे। गांव के मुखिया ने उनसे पाठशाला में बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। एक दिन मंदिर पर पुलिस का सिपाही उनसे आजाद के संदेह मे पूछताछ करने आया जिसे उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से भयभीत कर भगा दिया। उस गांव में रहते हुए आजाद अपने क्रांतिकारी साथियों को ओरछा के गहन जंगलों में फायरिंग का प्रशिक्षण भी देते रहे। फिर वह धीमारपुर से झांसी चले आए और वहां पर हरिशंकर के नाम से एक गाड़ी की दूकान मे गाडिय़ां बनाने और चलाने की नौकरी करने लगे। किसी को उन पर शक नहीं हुआ। कुछ समय बाद वहां से वे कानपुर गए और वहाँ पर सरदार भगत सिंह ने उनके संगठन की सदस्यता ग्रहण किया। 
उसी समय साइमन कमीशन इंग्लैंड से भारत आया और हिंदू मुसलमानों मे फूट डालने के लिए तमाम कार्य करने लगा। इसके चलते साइमन कमीशन का घनघोर विरोध होने लगा। लाहौर मे एक शांतिपूर्ण विरोध मार्च में अंग्रेजों ने लाला लाजपत राय नामक कांग्रेसी नेता को इतना पीटा कि उनकी मृत्यु हो गई। इससे क्रुद्ध होकर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल ने अंग्रेज अधिकारी स्काट जिसने लाजपत राय पर लाठी चार्ज का आदेश दिया था को मारने की योजना बनाई। वे कानपुर से लाहौर पहुंचे और स्काट को मारने की योजना बनाई। योजनानुसार जय गोपाल ने स्काट के थाने से बुलेट पर निकलने की सूचना भगत सिंह और राजगुरु को दिया। भगत सिंह और राजगुरु ने किसी अंग्रेज अधिकारी को बुलेट से आते देखा और गोलियों से भूनकर मार डाला। एक सिपाही ने दोनों को पकड़ने का प्रयास किया तो आजाद की पिस्तौल ने उस पर अपना मुंह खोल दिया। धमाके के साथ लपलपाती मौत निकली और उसे समाप्त कर दिया। इसके बाद तीनों अपनी साईकिलों पर सवार होकर भाग निकले। बाद में उन्हें पता चला कि उन्होंने स्काट के बजाय साण्डर्स को मार डाला है लेकिन उन्हें संतोष था क्योंकि लाजपत राय पर लाठी चार्ज करने वाली टीम मे वह भी शामिल था। इस घटना के बाद देशवासियों मे उत्साह की लहर दौड़ गई और सब लाला लाजपत राय का बदला लेने की खुशी मनाने लगे। इसके बाद जब वहां धरपकड़ तेज हो गई तो भगत सिंह और राजगुरु वहां से वेश बदलकर कलकत्ता चले गए। भगत सिंह वहां पर जतिन दास नामक क्रांतिकारी से मिले और उनकी मदद से आगरा में बम बनाने की फैक्ट्री संचालित करने लगे। 
इसके बाद भगत सिंह और राजगुरु ने अदालत में बम फेंककर साम्राज्यवाद का नाश हो और भारत माता की जय के नारे लगाए, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आजाद ने उनसे लाख कहा कि वे उन्हें सुरक्षित निकाल लेंगे पर भगत सिंह और राजगुरु ने आत्मबलिदान देने का निर्णय कर लिया था और कहा कि इससे बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी। इसके बाद आजाद ने वायसराय इरविन को मारने के लिए ट्रेन में बम रखा पर समय के हेरफेर के कारण वह बच गया।  इसके बाद आजाद कानपुर और दिल्ली में बम बनाने की फैक्ट्री का संचालन करते रहे। इसी बीच भगत सिंह को मृत्युदंड दिया गया। (23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी गई थी।) 
इसके बाद आजाद ने अपना मुख्यालय इलाहाबाद में स्थानांतरित कर लिया और वहाँ से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगे। लेकिन उनके दल मे से कुछ लोग अंग्रेजों से मिल गए। 27 फरवरी 1931 को जब आजाद अपने मित्र सुखदेवराज के साथ मूर कालेज से अल्फ्रेड पार्क से होकर जा रहे थे किसी भितरघाती गद्दार ने पुलिस को सूचना दे दी। तत्काल चार जीपों सहित लगभग 100 पुलिस वालों ने पार्क को घेर लिया और आजाद पर फायरिंग करने लगे। घंटाघर गोलीबारी होती रही आजाद ने अपने अचूक निशाने से बहुतों को नरक का रास्ता दिखाया ।लेकिन शीघ्र ही उनके पास गोलियां समाप्त हो गईं। उन्होंने सुखदेवराज को वहां से निकल जाने को कहा और स्वयं अंग्रेजों से लड़ते रहे। तभी उनके दाहिने हाथ में गोली लग गयी तब उन्होंने बांयें हाथ से दुश्मनों पर फायरिंग करके अंग्रेजों को भी अपनी प्रशंसा करने पर विवश कर दिया। जब उनके पास सिर्फ एक गोली बची तो उन्होंने कनपटी से पिस्तौल सटाकर भारत मां के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। उनके वीरगति के बाद भी भयभीत अंग्रेज घंटों उनके पास जाने से डरते रहे और उनके मृत शरीर पर हजारों गोलियां दाग कर यह सुनिश्चित किया कि वे वाकई मर चुके हैं। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 25 वर्ष थी। इस तरह से एक अध्याय का अंत हुआ। 
हां आजाद अंग्रेजों के लिए मर चुके थे पर वे हमारे हृदय मे सदैव जीवित रहेंगे। वे सदैव आजाद थे और आजाद ही रहे। इस घटना के लगभग 16 वर्षों बाद देश आजाद हुआ लेकिन भारत ने अपना सबसे तेजस्वी पुत्र को खो दिया था। 
जय हिंद। वंदे मातरम। 

No comments:

Post a Comment