Sunday, July 19, 2020

भारत और विश्व :पूरब या पश्चिम

जय श्री गणेश । अहं ब्रह्मास्मि, रसो वै सः ।
संसार में दो जीवन दर्शन हैं - पूरब और पश्चिम। यह प्रमुख विभाजन है। बाकी सभी विभाजन इन दोनो के अंतर्गत आते हैं। वैसे आजकल सारे संसार में पश्चिमी जीवन दर्शन या फिलासफी की ही प्रमुखता है। पूर्वी दर्शन सिकुड़ता जा रहा है और अब तो भारत में भी यह लुप्तप्राय हो रहा है। शिक्षा, रहन सहन, सोचने विचारने का तरीका, खान पान, तीज-त्यौहार, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में भारत मे भी पश्चिमी तौर तरीकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। 
भारत की जीवन पद्धति धार्मिक है जो समष्टि को अपने मे समाहित करते हुए चलती है जबकि पश्चिमी पद्धति तथाकथित विज्ञान पर आधारित है जो सबकुछ तोड़ने और विध्वंस पर आधारित है। भारत के अनुसार मूलतत्व पांच हैं और उनकी परिभाषा का आधार दूसरा है, गुणात्मक है जबकि पश्चिमी जीवन दृष्टि के अनुसार मूल तत्व 108 के लगभग हैं और उनकी मूलतत्वों की परिभाषा के आधार भारत से ठीक उल्टे हैं। 
भारतीय चिंतन के अनुसार जो पदार्थ या वस्तुएं जीवन को संभव बनाने के मूलभूत आधार हैं वे मूलतत्व हैं, जो शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं वे मूलतत्व हैं और उनकी संख्या पांच है-आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी। ये पांच मूलतत्व इस मर्त्य शरीर में जीवन को धारण करना संभव बनाते हैं। जबकि पश्चिमी दृष्टि के अनुसार वे पदार्थ जिन्हें और भी ज्यादा साधारण कणों मे (दो या दो से अधिक) तोड़ा नहीं जा सकता है मूलतत्व कहलाते हैं। फिर यहां से होते हुए अणु परमाणुओं की यात्रा प्रारंभ होती है। भारत में भी इन अणु और परमाणुओं की संरचना और संभावना का ज्ञान था लेकिन इसके विनाशकारी संभावनाओं के चलते इनसे संबंधित प्रयोगों को नष्ट कर दिया गया और छुपा दिया गया। परमाणु तक की जानकारी अभी भी भारतीय पुरा साहित्यों मे खोजा जा सकता है। परमाणु से संबंधित कुछ अध्ययन या विवरण महाभारत कालीन महर्षि कणाद के कार्य के रूप में उल्लिखित हुआ है। बाकी जानकारी जानबूझकर नष्ट कर दी गई या छिपा दी गई। 
भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन को ठीक से सार्थक तरीके से जीने के चार आधार हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें मनुष्य के चार पुरुषार्थ कहते हैं। इनका मतलब है कि जीवन में धर्म पूर्वक आचरण करते हुए अर्थोपार्जन करना चाहिए और फिर उससे भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए काम का सेवन करना चाहिए। तत्पश्चात जब जीवन के सुख दुखों का सम्यक अनुभव हो जाए तो फिर संसार से उदासीन होकर या त्याग कर चरम पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। 
अब धर्म क्या है और धर्मपूर्वक आचरण क्या है? इसके ज्ञान के लिए मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों मे बांटा गया था। जीवन को 100 साल का मानते हुए 25 - 25 वर्ष के चार विभाग किए गए थे - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। सबसे पहले जीवन की तैयारी के लिए व्यक्ति को ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश मिलता था। जहाँ वह भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करता था। सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों।इस आश्रम में रहकर व्यक्ति शिक्षा के साथ साथ आगे के आश्रमों के लिए शक्ति अर्जित करता था। और शिक्षा देने का कार्य चौथे आश्रम मे पहुंचा व्यक्ति करता था जो पिछले आश्रमों मे प्रतिभाशाली रहा हो और मोक्ष प्राप्त कर लिया हो या साधना में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया हो, जिसकी सांसारिक वासनाएं क्षीण हो चुकी हों। फिर प्राप्त शिक्षा के बल पर वह व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। 
गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों के लिए आधार था और उनको संभालने, उनके पोषण का काम करता था। गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति को धर्मपूर्वक आचरण करते हुए संसार के सुख दुखों का अनुभव लेना होता था। उसे समाज मे अपना योगदान देना होता था। अर्थोपार्जन,व्यवसाय से तथा दान धर्म के द्वारा ब्रह्मचर्य आश्रम में रह रहे लोगों को और उन आश्रमों को सहारा देना होता था। युद्ध, निर्माण, व्यापार और सेवाओं के द्वारा समाज और आर्थिक गतिविधियों मे अपना योगदान देना होता था और अपनी व परिवार की आवश्यकताओं और शौक पूरे करने होते थे। इसके बाद वह समयानुसार ब्रह्मचर्य आश्रम से शिक्षित होकर आयी नयी पीढ़ी को अपने अनुभव और उत्तराधिकार सौंपकर वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था। इस तरह प्राचीन काल मे समाज और व्यक्तिगत जीवन की गति थी। समाज समृद्ध था, प्राकृतिक संसाधन बहुतायत थे। वनस्पति, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, भौतिक तत्व और मनुष्य मे एक गहरी संगति थी, एक संगीतात्मक लयबद्धता थी। मनुष्य जीवन में धर्म केंद्रीय तत्व था। 
अब आधुनिक समाज के जीवन यापन के तौर तरीकों पर नजर डालते हैं। पश्चिमी सभ्यता के जीवन में सिर्फ दो स्तंभ हैं- अर्थ और काम। पहले और चौथे चरण को उन्होंने ओल्ड फैशन या व्यर्थ कहकर बाहर कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वे जीवन में धन के अर्जन और यौन सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनके द्वारा चोरी, बेईमानी, लोगों/समाज/देशों को गुलाम बनाना आदि उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। रही सही कसर उनके आधुनिक धार्मिक विश्वास पूरी कर देते हैं जिनके अनुसार बस एक ही जीवन है और इसके साथ ही सबकुछ समाप्त हो जाएगा। तो जितना ज्यादा सुख भोग सको और इसके लिए जितना धन और सुविधाएं जुटा सको जुटाओ, जायज नाजायज हर तरीके से। तभी तो आज तमाम बड़ी-बड़ी पश्चिमी कंपनियां और संगठन जो बड़े सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन के नाम पर बनती हैं और इसके लिए काम करने का दंभ भरती हैं वे भी बाद में कुछ और ही निकलती हैं और यह सब सिर्फ उनके धन कमाने का नया तरीका ही साबित होता है। 
अब हम आधुनिक समाज व्यवस्था के कुछ प्रभागों को देखते हैं जैसे शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार। आधुनिक पश्चिमी जीवन पद्धति के अनुसार इस मिले हुए इकलौते जीवन में ज्यादा से ज्यादा सुखों को भोगना चाहिए। अब इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धन बहुत सी सुविधाओं तक आसान पहुंच बनाता है जिनसे सुख पाने मे सहायता मिलती है। और संसार में सुख सिर्फ एक ही है यौन सुख। यह मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त इकलौता सुख है। इसके बाद मनुष्य को धर्म साधना के द्वारा यौन से उच्चतर सुखों की प्राप्ति करनी होती है। यौन सुख प्रकृति प्रदत है और बहुत से बंधनों के अधीन है इसलिए हर यौन सुख मनुष्य को रिक्तता और विषाद का अनुभव कराता है। यौन प्रकृति के लिए जीवन की निरंतरता का माध्यम भी है। इसलिए प्रकृति बलपूर्वक मनुष्य को इसमे ले जाती है। इसमे जाने या न जाने के अधिकार के रूप में मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। यह एक प्राकृतिक परतंत्रता है। इसलिए यह सदैव विषाद का कारण बनता रहता है और हर यौन कृत्य मे शक्ति क्षय होती है इसलिए इसकी बारंबारता सीमित है। हर यौन कृत्य के बाद अगले के लिए और अधिक समय चाहिए उतनी शक्ति एकत्र कर तैयार हो सकने के लिए। इसके लिए सुविधा पूर्ण जीवन और पौष्टिक आहार विहार चाहिए जिसके लिए धन की आवश्यकता होती है। कुछ जानकारियां भी चाहिए लेकिन जल्दी से ज्यादा से ज्यादा सुख पाने की आशा मे पागल मनुष्य इसे नजरअंदाज करता है। अब आधुनिक मनुष्य धन की आवश्यकता के लिए व्यापार करता है या नौकरी। समाज या देश मे समृद्धि का प्रमुख स्रोत व्यापार है। अब मनुष्य व्यापार करता है और उसके लिए एक व्यवस्था है। पहले मनुष्य व्यापार करता था ताकि धन प्राप्त कर भौतिक सुखो को पा सके। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार व्यवस्था बड़ी से बड़ी होती गई। इसको जीवित रहने के लिए अधिक लोगों और संसाधनो की आवश्यकता होती गई। पहले व्यापार व्यवस्था शुरू हुई थी कि एक दिन सभी की आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी और हम आराम से बैठकर जीवन के सुखो को भोगेंगे। लेकिन अब इस वृहत व्यवस्था को चलाने के लिए मनुष्य के सुख चैन,अवकाश के समय और जीवन की ही बलि चढ़ाई जा रही है। पहले जीवन यापन करने के लिए व्यापार व्यवस्था शुरू की गई थी लेकिन आज व्यापार को चलाने के लिए जीवन यापन किया जा रहा है। जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए जिस व्यापार की शुरुआत हुई थी उसी व्यापार व्यवस्था को चलाने और बचाए रखने के लिए मनुष्य का जीवन और स्वतंत्रता स्वाहा हुआ जा रहा है। यही हाल हर एक पश्चिमी व्यवस्था का है। लोगों के स्वास्थ्य रक्षा और रोग मुक्ति के लिए आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था की नीव पड़ी थी लेकिन आज इस स्वास्थ्य व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नए नए रोगों की खोज से लेकर जैविक हथियारों के निर्माण जैसे नित नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। मनुष्य के स्वास्थ्य का चाहे जो हो पर यह चिकित्सा व्यवस्था बनी और चलती रहनी चाहिए। यही हाल आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का है। भारत में तो यह मैकाले की कुशिक्षा व्यवस्था और समय की बर्बादी ही है। पहले वैश्विक चिंतकों ने सोचा था कि सबको शिक्षित कर दें तो लोग सुखी हो जाएंगे और उनके दुख दूर हो जाएंगे। लेकिन आज शिक्षित अपराधियों और समाज के दुश्मनों की भीड़ और उनके विनाशकारी कुकृत्यों को देखकर यह भ्रम भी दूर हो गया है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पढ़े लिखे मूर्खों की फौज तैयार कर रही है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति समाज की आवश्यकताओं /चुनौतियों और जीवन की समस्याओं को हल कर पाने में असहाय नजर आता है तभी तो उच्च पदस्थ और साधन सुविधा संपन्न लोगों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। शिक्षा व्यवस्था आज अप्रासंगिक हो चुकी है। यह व्यक्ति की रचनात्मकता, कल्पना, विचारशक्ति और सृजनशीलता को नष्ट करके सिर्फ उसके दिमाग में जानकारियां ठूंसने का काम करती है। 
इस तरह हम आधुनिक जीवन पद्धति के तीन विभागों व्यापार, चिकित्सा और शिक्षा की व्यर्थता को देख चुके हैं। 
अब हम इस आधुनिक जीवन पद्धति के परिणामों को देखते हैं। इस तौर तरीके से जो लोग आधुनिक जगत में किसी तरह सफल हो पाते हैं अर्थात धनअर्जन करने मे सफल हो जाते हैं;संसाधनों, सुविधाओं का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं वे उनका उपयोग करने मे असमर्थ हो जाते हैं। उल्टे वही धन या सुविधा, संसाधन ही उनका उपयोग करने लग जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह धन या संसाधन किस लिए है? इनका क्या करना है? या कैसे इनका उपयोग किया जा सकता है? यह भयंकर विषाद को जन्म देता है और फिर वे उस धन या सुविधा, संसाधनों से दूसरों को परेशान करने लगते हैं या लोगों का वस्तुओं की तरह उपयोग करने का प्रयास करने लगते हैं। 
आने वाले भागों में हम देखेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से कैसे जिया जा सकता है? जीवन मे समस्याएं क्यों हैं और उनसे कैसे निपटा जा सकता है? आज मै प्ले स्टोर या एप स्टोर पर देखता हूंँ तो अच्छी नींद दिलाने, ठीक से जीवन यापन के तरीके सिखाने का दावा करने वाली बहुत सी एप्लीकेशन मौजूद हैं। आने वाले दिनों में हम देखेंगे कि क्या वाकई हमे उनकी आवश्यकता है? क्योंकि पश्चिमी तरीके के अनुसार तो हर चीज सिर्फ व्यापार का एक अवसर है। अपने इस चैनल/ब्लॉग के माध्यम से हम आप लोगों से जीवन यापन, सफलता और प्राप्त संसाधनों का उपयोग करने की कला के बारे में बात करेंगे। मेरा ध्येय है कि सब सुखी हों और कहीं कष्ट का नाम न हो। मेरा आदर्श वाक्य है - जीवन एक कला है। और मेरा प्रयास रहेगा कि इसमे हम निष्णात कैसे हो सकते हैं आप सबको सिखा सकूं। आपसे बात करेंगे कि जीवन को उलझन रहित तरीके से और इसका अत्यधिक आनंद लेते हुए कैसे जिया जाय? 

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