Monday, July 27, 2020

तुलसीदास



तुलसीदास का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन संवत 1554 मे सोरों गाँव मे हुआ था- इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था और माँ का हुलसी । जन्म के समय ही माँ की और उसके कुछ दिनों बाद पिता की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद दासी चुनिया ने उनको पाला लेकिन कुछ दिनों बाद वह भी साँप के डँसने से मृत्यु को प्राप्त हो गयी। बेचारा बालक अनाथों की तरह भटकता हुआ गाँव के मंदिर मे पहुँचा।जहाँ उनकी भेंट बाबा नरहरिदास जी से हुई। बाबा बालक को अपनी कुटिया मे ले गए और उसे भगवान राम की कथाएँ सुनाने लगे। बालक बड़े मनोरोग से सुनता रहा । बाबा ने उसका नाम रामबोला रख दिया। उच्च शिक्षा के लिए बाबा नरहरिदास रामबोला को वाराणसी के आचार्य शेष सनातन के पास ले गए। वहाँ उन्होंने समस्त साहित्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया। शिक्षा के बाद रामबोला गुरू की आज्ञा से सोरों लौट गए और रामकथा का गान करने लगे। इससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी और लोगों ने उन्हें तुलसीदास कहना शुरू कर दिया। फिर बद्री गाँव के दीनबंधु पाठक की सुंदरी पुत्री रत्नावली से उनका विवाह हो गया। तुलसीदास रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे और उसके बिना थोड़ी देर मे ही अधीर हो जाते थे।एक दिन उनकी अनुपस्थिति में रत्नावली के मायके से बुलावा आया तो उसने तुलसीदास के सूचना लिए भाई दूज के अवसर पर कुछ दिनों के लिए मायके जाने की बात एक पत्र मे लिखकर रख दिया और मायके चली गयी। तुलसीदास ने वापस लौटकर पत्र पढ़ा किंतु रत्नावली का वियोग सहन न कर सके और आँधी पानी के बीच अपनी ससुराल के लिए निकल पड़े। तूफ़ान मे एक शव को नौका समझकर उसपर सवार होकर उफनती नदी पार कियाऔर आधी रात को ससुराल जा पहुँचे। सबको सोता देख घर के पीछे गए और लटकते साँप को रस्सी समझकर उसकी सहायता से चढ़कर अनुमान से रत्नावली के कक्ष मे जा पहुँचे। रत्नावली को उन्हें उस हाल मे आया देखकर बडी ग्लानि हुई और उसने तुलसीदास को फटकारते हुए कहा-“ आपको जितना प्रेम मेरे हाड़ माँस के इस शरीर से है इसका एकांत भी प्रभु राम से होता तो आप भवसागर से मुक्त हो गए होते।” तुलसीदास ग्लानि से जैसे ज़मीन में धँस गए और जैसे आए थे उसी रास्ते से वापस लौट गए। इसके बाद वह प्रयागराज पहुंचे और सन्यास लेकर अवधी भाषा मे रामकथा कहने लगे।

गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीराम के जीवन वृत्तांत पर कालजयी महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की रचना की। यह अकबर का शासन काल था। देश और समाज में हिंदू धर्म का लोप हो रहा था। हिंदू राजा हार मानकर अकबर के अधीनस्थ राजकाज कर रहे थे। समाज में बड़ा विघटन हो रहा था। ऐसे समय में गोस्वामी जी ने इस ग्रंथ की रचना कर हिंदू धर्म को पुनर्जीवित कर दिया। 

उससे पहले तक बहुत से संतों और कवियों ने विभिन्न भाषाओं में रामकथा की रचना की थी। इनमे महर्षि वाल्मीकि विरचित रामायण नक्षत्रों के बीच पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह सुशोभित हो रहा था। बाकी सब कवियों की राम कथाएं रामायण के आगे तारिकाओं की तरह टिमटिमा रही थीं। फिर गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस रूपी सूर्य का उदय हुआ और इसके आगे पूर्व प्रचलित समस्त रामगाथाएं फीकी पड़ गईं। अब तो आज कल के ग्रामीण जनमानस से पूछने पर रामायण के रचनाकार के रूप में गोस्वामी जी को ही याद किया जाता है। गोस्वामी जी ने जनसाधारण की अवधी भाषा में इतने सुंदर और लालित्यपूर्ण ढंग से काव्य रचना की है कि वह भगवान श्रीराम के समान ही अमृतमयी बन गयी है। तुलसीदास जी ने विशेष समाधि मे भगवान शिव की प्रेरणा से लोकमानस की अवधी भाषा में श्रीराम चरित मानस की रचना की है। जिससे यह भक्ति पूर्वक पाठ करने से अत्यंत चमत्कारिक परिणाम देने वाली बन गयी है। सबसे पहले इसका पाठ करना शुरू करते ही कुछ ही दिनों में यह मन को विकारमुक्त करके निर्मल करना शुरू कर देती है। जो लोग बहुत जप तप और व्रत नियमों का पालन कर रहे हों और मन की दुर्बलता के कारण बार बार भटक कर असफल हो जा रहे हों उनके द्वारा इस ग्रंथ का पाठ करने पर मन की कलुषता मिट जाती है और साधना के वे परिणाम अनायास ही बहुत आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। 

भगवान श्री राम भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रमाणिक आधार हैं। वे धर्म के जीवंत रूप हैं। भारतीय आज भी भगवान राम को इस देश का राजा, अयोध्या को देश की राजधानी और स्वयं को उनकी प्रजा मानते हैं। भारत में समय समय पर बहुत से प्रज्ञापुरुष और ईश्वर के अवतार हुए हैं जिन्होंने असंख्य लोगों को तारा या मुक्त किया है। लेकिन उनमे भगवान श्रीराम ऐसे हैं जिन्होंने बिना किसी सचेष्ट प्रयास के ही अपने आस पास के और दूर के लोगों को तार कर मुक्त कर दिया है। आज तक लोग उनके नाम स्मरण के द्वारा ही भवबंधन काटकर मोक्ष की प्राप्ति कर रहे हैं। भगवान राम को जिसने देखा वह तर गया, जिसने सुना वह तर गया। जो उनके साथ उठा बैठा, उनके साथ चला, उनको रास्ते पर चलते देखा, उनका नाम स्मरण किया वे सब तर गए। हनुमानजी ने तो सिद्ध ही कर दिया है कि भगवान श्री राम का नाम स्वयं भगवान श्री राम से भी अधिक प्रभावशाली है। एक बार भगवान श्री राम के गुरू वशिष्ठ महर्षि किसी से नाराज हो गए और भगवान श्रीराम से उसका वध करने को कहा। भगवान राम गुरू की आज्ञा का पालन करने को तैयार हो गए । वह व्यक्ति भागकर हनुमानजी की मां अंजना के पास पहुंचा और शरणागत होकर उनसे अपनी प्राण रक्षा के लिए प्रार्थना किया। माता ने उसे प्राण रक्षा का वचन देकर हनुमान जी को बुलाया और उसे उनके सुपुर्द कर आदेश दिया -" यह मेरा शरणागत है। इसकी रक्षा करो। " 

हनुमान जी ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। बाद में जब उन्हें पता चला कि उसे भगवान श्रीराम गुरू वशिष्ठ के अपमान का दंड देना चाहते हैं तो भी वे विचलित नहीं हुए और उसे लेकर सरयू के तट पर पहुंच गए। भगवान श्री राम उसे दंड देने के लिए वहां आए। लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई कि देखें अब क्या होता है? क्या रामभक्त हनुमान अपने मां के वचन की रक्षा के लिए अपने आराध्य से युद्ध करेंगे? लेकिन हनुमान जी को बल बुद्धि की खान ऐसे ही नहीं कहा जाता। वे उस शरणागत को अपने पीछे करके भगवान का प्रहार रोकने के लिए उसके आगे खड़े हो गए। भगवान ने जब बाण छोड़ा तो हनुमानजी ने उसे प्रणाम कर जय श्री राम का उद्घोष किया और आश्चर्य! वह बाण निष्फल होकर लुप्त हो गया। भगवान ने अनेक अमोघ दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया पर सब निष्फल रहे। यह देखकर जनसमुदाय भगवान श्रीराम की जय और रामभक्त हनुमान की जय का जयघोष करने लगी। इससे प्रसन्न होकर गुरु बशिष्ठ ने अपना वचन वापस लेकर भगवान को उस व्यक्ति को छोड़ देने को कहा। क्योंकि उन्होंने उसे क्षमा कर दिया था। 
तुलसीदास ने जब घर बार त्याग दिया तो वे सन्यासियों का सा जीवन व्यतीत करते हुए भगवान श्रीराम की कथा कहने लगे। उनकी कथा इतनी मधुर होती थी कि दूर दूर से लोग उनको सुनने के लिए आने लगे। आने वाले श्रोताओं मे तुलसीदास जी ने देखा कि एक तेजस्वी वृद्ध सबसे पहले आता है और सबसे बाद में जाता है। उन्होंने पहचान लिया कि ये हनुमानजी हैं और एकदिन जब वे जाने के लिए उठे तो तुलसीदास उनके चरणों में गिर पड़े और उनकी स्तुति करने लगे। हनुमानजी जब प्रसन्न हुए और दर्शन दिया तो तुलसीदास जी ने उसने भगवान श्रीराम का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमानजी ने उन्हें चित्रकूट जाने को कहा और बताया कि वीं उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट मे जाकर कुटी बनाकर रहने लगे। एक दिन उन्होंने रास्ते में दो श्याम और गौर वर्ण के सुंदर राजकुमारों को घोड़ों पर सवार होकर जाते देखा। उन्हें देखकर वे अभिभूत हो उठे लेकिन पहचान नहीं सके। बाद में जब हनुमान जी ने आकर उन्हें बताया कि वे दोनो राजकुमार श्रीराम लक्ष्मण थे तो उन्होंने एकबार फिर दर्शन दिलाने के लिए प्रार्थना किया। कुछ दिनों के बाद तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर बैठे हुए थे कि दो सुंदर नवयुवक आए और उनसे चंदन लगाने के लिए कहने लगे। उनके सुंदर सांवले और गोरे रूप को देखकर तुलसीदास सुध बुध खो बैठे और उसी अवस्था में दोनों को तिलक लगाया। तभी हनुमानजी जो वहाँ तोते के रूप में विराजमान थे उन्होंने तुलसीदास जी को सचेत करने के लिए और भगवान की पहचान बताने के लिए एक दोहा कहा-

चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीड़। 

तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर।। 

यह सुनकर तुलसीदास जी को होश आया। जैसे वे समाधि से जगे हों लेकिन तब तक दोनों राजकुमार जा चुके थे। वे उनके पीछे रास्ते पर दौड़े पर वहाँ कोई नहीं था। लेकिन उन्होंने भगवान का दो बार दर्शन कर लिया था और एक बार तिलक लगाने के बहाने उनका स्पर्श भी किया था। भगवान राम के स्पर्श ने तुलसीदास मे जादुई परिवर्तन कर दिया और उनमे एक दिव्यता आ गई। उनकी वाणी मे सम्मोहन शक्ति सी आ गई और दिन दूनी रात चौगुनी गति से उनके श्रोताओं की संख्या बढ़ने लगी। फिर भगवान शिव की प्रेरणा से उन्होंने श्रीराम कथा की रचना आरंभ की। उनकी बढ़ती ख्याति और प्रभाव से चिंतित होकर कुछ लोगों ने सम्राट अकबर से उनकी शिकायत कर दी। अकबर ने सच्चाई का पता लगाने के लिए रहीम दास जी को भेजा और रहीम तुलसीदास जी से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने लौटकर अकबर को बताया कि तुलसीदास जी तो सिर्फ अपने प्रभु की कथा का प्रचार करते हैं बस। 
तुलसीदास जी महाराणा प्रताप के आध्यात्मिक गुरू भी थे। एकबार जब अकबर से हारकर जंगल मे भटकते हुए प्रताप और उनका परिवार घास की रोटी बना कर खाने जा रहे थे तो एक ऊदबिलाव उसे ले भागा। और लोग तो संतोष कर गए लेकिन छोटा बालक भूख से बिलख उठा। इससे राणा का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने परिवार की परेशानियों को देखते हुए अकबर से संधि करने का फैसला किया। उन्होंने अकबर के पास इस आशय का संदेशा भेजा। इसी दौरान एकदिन किसी से सुनकर वे तुलसीदास जी से मिलने गए। गोस्वामी जी ने उन्हें घबराने की बजाय अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहने को कहा और कहा कि प्रभु श्रीराम ने भी तो 14 वर्षों का वनवास झेला था। यह संकट शीघ्र दूर हो जाएगा और आपको आपका खोया हुआ राज्य और सम्मान पुनः प्राप्त होगा। नई सेना बनाओ और फिर से प्रयास करो। प्रताप वहाँ से एक नया बल लेकर लौटे। प्रभु की कृपा से उसी समय राणा प्रताप से भामाशाह मिलने गया और उन्हें नयी सेना के निर्माण के लिए अपना सारा धन अर्पित कर दिया। उसी समय अकबर के सेनापति जयसिंह तुलसीदास जी से मिलने आए तो उन्होंने उनसे राणा प्रताप के विरुध्द सेना न उतारने को कहा। गोस्वामी जी की बात मानकर जयसिंह ने अपनी सेना पीछे हटा ली। महाराणा प्रताप ने प्राप्त धन से नयी सेना बनाई और पुनः युद्ध लड़ने लगे। इस बार ईश्वर की कृपा से उन्हें सफलता मिलने लगी और धीरे-धीरे उन्होंने अपने सभी किले अकबर से वापस ले लिए। लेकिन पूरा जीवन संघर्षरत रहने और कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप के शरीर त्याग के समय तक केवल एक या दो किले ही अकबर के पास रह गए थे बाकी सब उन्होंने वापस जीत लिया था। 
तुलसीदास जी ने जब रामचरित मानस को पूरा कर लिया तो उनकी ख्याति दिन पर दिन बढ़ने लगी। साथ ही उनके विरोधियों की भी संख्या बढ़ने लगी। काशी के पंडितों ने संस्कृत के अलावा किसी भाषा में रामकथा लिखने के कारण उनका विरोध शुरू कर दिया और उनकी पांडुलिपि नष्ट करने के लिए दो चोर भेजे। चोर जब रात को रामचरित मानस की प्रति चुराने के लिए तुलसीदास की कुटिया पर पहुंचें तो उन्होंने वहां पर दो सुंदर युवकों को धनुष बाण लिए पहरा देते देखा। इसके बाद भगवान का दर्शन होने के परिणामस्वरूप चोरों की बुद्धि निर्मल हो गई, उन्होंने तुलसीदास जी से क्षमा मांगी और चोरी छोड़कर सन्यासी हो गए। 
इसपर भी तुलसीदास जी के विरोधियों को संतोष नहीं हुआ और उन्होंने भगवान विश्वनाथ से ही रामचरित मानस की परीक्षा कराने का निर्णय लिया। वेद, पुराणों और अन्य ग्रंथों के साथ सबसे नीचे रामचरित मानस को भगवान श्री विश्वनाथ के समक्ष रखकर  मंदिर मे ताला लगा दिया गया। जब सुबह ताला खोलकर देखा गया तो रामचरित मानस सबसे ऊपर रखा था और उसपर भगवान श्री विश्वनाथन का कृपा प्रसाद था। अब किसी को श्री रामचरितमानस और तुलसीदास जी पर कोई संदेह नहीं रह गया। काशी के विरोधी पंडितों ने भी अपनी गलती स्वीकार कर उनसे क्षमा मांगी। 
कहते हैं कि मीराबाई जब भगवान श्रीकृष्ण के उपासना मे मग्न होकर गीत गाकर नाचती थीं तो उनके परिवार के लोगों ने उनपर अत्याचार करने शुरू कर दिए। उनको विष दिया, सर्प से कटवाना चाहा पर ईश्वर की कृपा से वे मीराबाई का कुछ नहीं बिगाड़ सके। इसपर इन विघ्नों से परेशान होकर मीरा ने तुलसीदास जी को चिट्ठी लिखकर सलाह मांगी तो गोस्वामी जी ने उनको जवाब में यह दोहा लिखकर भेजा-

जिनके प्रिय न राम बैदेही, 

तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम स्नेही। 

और इसे पढ़कर मीराबाई ने अपना घर बार त्याग दिया और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 
तुलसीदास जी के समय मे हिंदू धर्म जगत अनावश्यक संकीर्णताओं मे बंटकर आपस में एक दूसरे से विवाद करता हुआ उलझा रहता था। कोई कृष्ण भक्ति की शाखा थी तो कोई रामभक्ति की। कहीं सगुण उपासना वाले लोग थे तो कहीं निर्गुण। तुलसीदास जी ने इन सबको एक सूत्र में पिरोने का काम किया और इनके वैचारिक वैमनस्य को दूर किया। एक बार गोस्वामी जी मथुरा श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गए। लोगों ने सोचा कि ये तो राम भक्त हैं क्या ये भगवान श्रीकृष्ण के आगे शीश झुकाएंगे और जब गोस्वामी जी ने मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे शीश झुकाया और पूजा आरती किया तो लोगो को कृष्ण की मूर्ति मे ही धनुष बाण लिए भगवान राम के भी दर्शन हुए। 
भगवान श्री राम की कथा लिखकर और उसका प्रचार प्रसार कर गोस्वामी तुलसीदास जी तर गए और आज भी लोग उनकी इस रचना का भक्तिपूर्वक पाठ कर बिना किसी अतिरिक्त श्रम या साधना के अपने मनुष्य होने की परम संभावना को प्राप्त हो रहे हैं। 
जय श्री राम, जय श्री हनुमान, जय गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज। 

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